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Sunday, March 25, 2018

बड़ी नादान हो तुम....रामबन्धु वत्स

"  कैनवास की उकेरी रेखाऐं,
   बड़ी नादान हो तुम,
   मुस्कुराती भी हो, मचलती भी हो,
   इंद्रधनुष के सतरंगी बुँदो की तरह ।

   तुम एक नज़रिया हो,
   किसी चित्रकार की.... बस,
   कोई नियती नहीं,
   सुनहरी धूप में खिली गुलाबी पात की तरह ।

   हम इत्तेफाक़ नहीं रखते किसी की आहट से,
   यूँ ही गली में झाक कर ....... ,
   थिड़कती भी हो, सँवरती भी हो,
   किसी आँखो के साकार हुए सपने की तरह ।"

   पता नहीं क्या आस बिछाय,
   अपनी चौखट से बार-बार,
   एकटक से क्षितिज निहार रहीं हो...,
   स्वाती बुँद की आस लगाये चातक की तरह ।

   पीली सरसों पे तितँली को मचलते देख,
   तुम भी मिलन की आस लगा लिये,
   तेज तुफाँ में भी दीये की लौ जला लिये,
   मृगतृष्णा में दौडती रेत की हिरण की तरह ।
   बड़ी नादान हो तुम ।

©रामबन्धु वत्स

Wednesday, March 14, 2018

ज़िन्दगी एक सफ़र है...........रामबन्धु वत्स


ज़िन्दगी एक सफ़र है,
कोई होड़ नहीं,
कुछ देर इस मोड़ पर ठहरते है...
पल-दो-पल जीने के लिए ।

मानते हो मंजिल जिसे,
वहाँ भी अधूरे ख्वाब है,
हर हथेली में यहाँ,
सिकुड़ा आँसमान है।

कब तलक दौड़ते रहोगे,
सड़क के सफ़र में,
वक़्त जीने में ही,
आदमी की शान है।

ज़िन्दगी एक सफ़र है,
कोई होड़ नहीं,
कुछ देर इस मोड़ पर ठहरते है..
पल-दो-पल जीने के लिए ।

©रामबन्धु वत्स