Showing posts with label पूजा प्रियंवदा.पार्श्व स्वर. Show all posts
Showing posts with label पूजा प्रियंवदा.पार्श्व स्वर. Show all posts

Monday, August 31, 2020

डिस्कोर्स ...पूजा प्रियंवदा

खाली स्क्रीन तकते रहना
उस पर गुज़रते लफ़्ज़ों
और एक जैसे चेहरों को
पारदर्शी होते देखना

"रीडिंग बिटवीन द लाइन्स" का हुनर
अब काम आ रहा है
डिस्कोर्स की परख होना
वरदान भी है अभिशाप भी

कर्कश अट्टहासों के बाज़ार में
अंतर्मन का पार्श्वस्वर होना
दुश्वार है
बहिष्कृत रह कर
लोकप्रिय होने से
अपना एक संसार होना

सुनते हैं
सर्वव्यापी महामारी है
अकेले मरने की
फिर भी लाचारी है

ये पल पल एहसास
चाय में घोलती हूँ
धुएँ में फूंक देती हूँ
गोली में गटक लेती हूँ
और देखती हूँ
तुम्हें
अपनी स्क्रीन से गुज़रते हुए

-पूजा प्रियंवदा

Sunday, August 2, 2020

तुम एक टूटा हुआ काँटा हो ...पूजा प्रियंवदा

वक़्त को कितना भी बारीक़ गूँधो
कुछ पछ्तावों की किरचें रहती हैं
जैसे किसी गुम चोट का दर्द
जो है तो लेकिन कहाँ है
ऊँगली से छुआ नहीं जाता

इंसान क्या-क्या झेल जाता है
बाढ़ , चक्रवात, भूकंप , तूफ़ान
और किसी दिन कुनमुनी बारिश से ही
दिल के किले की दीवार
भरभरा कर गिर जाती है
सालों का मलबा बह निकलता है

होना और नहीं होना
निरंतर प्रक्रिया है
जैसे खोना पाना
कुछ और खोना कुछ और पाना
फिर खुद ही कोई गुम लम्हा हो जाना
जिसे कोई नहीं ढूंढ रहा

समंदर पाँव के तलवे चूमने के बाद

लौटता है, थोड़ा और धंसा जाता है
जैसे सुई से कुरेदने से
कोई टूटा काँटा
चमड़ी की एक और तह चीरता
दब जाता है और गहरा

तुम एक टूटा हुआ काँटा हो
मेरे दिल में
मैं एक ज़िंदा लाइलाज ज़ख्म हूँ

-पूजा प्रियंवदा
मूल रचना

https://wp.me/p3VurB-ju

Thursday, February 20, 2020

मेरा कुछ सामान ......पूजा प्रियंवदा

ईसा पूर्व और पश्चात जैसे
भावनाओं को बाँटने की सुविधा
देती नहीं हैं ज़िन्दगी

किसी पुरातत्त्व अवशेष जैसे
अचानक उभर आती हैं स्मृतियाँ
कुछ पाषाण हो चुकीं
कुछ अभी भी कंकाल

वो जो पहली बार दरका था विश्वास
अब भी किसी पर नहीं हो पाता
वो जो पेचीदा तरीकों से घुलनशील हैं यादें
उनका एक रंग हो चुका है
धूसर, मटमैला , काला

डॉक्टर कहते हैं "फैंटम लिंब "
कट जाने के बाद भी महसूसता है
टीसता है, रात भर जिसके दर्द ने
नींद की चोरी की है
तुम वो हिस्सा हो जो अब है ही नहीं

मेरा कुछ सामान ..
-पूजा प्रियंवदा

Wednesday, January 29, 2020

दायरा ...पूजा प्रियंवदा

रात भर नींद
हल्के पत्ते सी तैरती है
आँखों के पोखरों में
वक़्त कर्मठ श्रमिक
गहरे करता जा रहा है
काले घेरे

भोर भारी है
किसी अनमनी गर्भिणी सी
घसीटती खुद को
जानते हुए एक और दिन होगा
मृत प्रसव

दिन लावारिस लाश सा
मर कर भी नहीं मरता
शोर और भीड़
उठा नहीं पाते
मेरे अकेलेपन की चट्टान

शाम सुन्न
शीतक्षत उँगलियों से
कब तक लिखे जायेंगे
अंधेरों के गीत

रात लौट आयी है
इतना ही है मेरी

उम्र क़ैद का दायरा
- पूजा प्रियंवदा
मूल रचना

Saturday, January 25, 2020

आत्मा का शरणार्थी हो जाना ...पूजा प्रियंवदा

कैसा होता होगा
आत्मा का शरणार्थी
हो जाना
गुड़ में, साग में
हवा में
ढूंढना सरहद पार की खुश्बू
और घंटों हर-रोज़
आँखें बंद कर देखना
अपने बचपन का घर
ठिठुरते हाथों से
शालें स्वेटरें बेचते
उम्मीद की आखरी डोर को
हिमालय के उस पार
पोटाला के गुम्बदों से
बांधे रखना
टिमटिमाती नीली-पीली
बस्तियों में
सपने देखना
ब्रह्मपुत्र के पार के
हरे खेतों
की पहली फसल के
या बर्लिन की बर्फ़बारी में
कांगड़ी की कमी
महसूस करना
और पहन लेना
यादों का तार-तार पुराना फेरन
या फिर ऐसा होना
मेरी तरह
जड़ों से मुक्त
अनेक अजीब शहरों में
छोड़ आना
अपनी थोड़ी थोड़ी आत्मा
और बन जाना
एक निरंतर पथिक .
- पूजा प्रियंवदा

Monday, December 30, 2019

हल्की बर्फ़ में .....पूजा प्रियंवदा

हल्की बर्फ़ में

एक हाथ थामे रखता है

घुमावदार पगडंडियों पर

दिल फिसले तो फिसले

तुम न फिसलो !

****************

उसके होंठ चुनते हैं

मेरे होंठों से

बर्फ़ के ताज़ा फ़ाहे

बर्फ़ गर्म और मीठी

मैंने पहली बार चखी.




Tuesday, December 3, 2019

चमकौर...पूजा प्रियंवदा

1704 में 21, 22, और 23 दिसम्बर को गुरु गोविंद सिंह और मुगलों की सेना के बीच पंजाब के चमकौर में लड़ा गया था। गुरु गोबिंद सिंह जी 20 दिसम्बर की रात आनंद पुर साहिब छोड़ कर 21 दिसम्बर की शाम को चमकौर पहुंचे थे, और उनके पीछे मुगलों की एक विशाल सेना जिसका नेतृत्व वजीर खां कर रहा था, भी 22 दिसम्बर की सुबह तक चमकौर पहुँच गयी थी। वजीर खां गुरु गोबिंद सिंह को जीवित या मृत पकड़ना चाहता था। चमकौर के इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में केवल उनके दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह एवं जुझार सिंह और 40 अन्य सिंह थे। इन 43 लोगों ने मिलकर ही वजीर खां की आधी से ज्यादा सेना का विनाश कर दिया था।

-*-*-*-*-*-

मैं एक हारे हुए युद्ध की
सिपहसालार हूँ
रोज़ अपने चीथड़े संभाले
देखती हूँ अपलक
किसी नए फायरिंग स्क्वाड की
बर्फ आँखों में
उनकी मृत अंतरात्मा
मुझसे आख़िरी बोटी
मांगती है

चमकौर में सुना था
पुर्ज़ा- पुर्ज़ा कट मरे थे
कोई पुरखे
आन की लड़ाईयाँ
ऐसे ही होती हैं
जान तक

बीजी कहीं बुदबुदा रही हैं-
"जब आव की आउध निदान बनै
अति ही रण में तब जूझ मरौ"

लड़ते रहने का जज़्बा
सुनने में जितना सुन्दर लगता है
वीर रस की बातें
दूसरों से कहने में
जो स्वाद आता है
वो अपने ज़ख्म चाटने में
नहीं आता

मैं योद्धा हूँ
पर थक गयी हूँ
इंसान होते होते
रुक गयी हूँ
मैं फिर भी
रोज़ लड़ रही हूँ
चमकौर की दुखद लड़ाई
Image result for Woman warrior
-पूजा प्रियंवदा


Monday, August 19, 2019

बाकि है तन्हा सफ़र तेरा ...पूजा प्रियंवदा

कितनी अँधेरी रातों के बाद 
कितने अकेले सफ़र तमाम 
परिंदे ने कहीं फ़िर 
आसरे की उम्मीद कर ली थी


घर ने कहा तू लौट जा 

कोई और अब रहता है यहाँ 
बाकि है तन्हा सफ़र तेरा !


लौटा है सफ़र में 

अकेला परिंदा 
फ़कीर रूह न किसी की 
न कहीं इसका बसेरा
- पूजा प्रियंवदा

Friday, May 17, 2019

चारकोल....पूजा प्रियंवदा

याद चारकोल स्केच है 
धीरे-धीरे मन की पृष्ठभूमि में 
घुलने लगती है

तुम्हारा छूना 
एक स्थायी गोदना 
रूह के माथे पर 
धुंधलाने लगा है

आसमान 
काले और सफ़ेद के बीच 
नीला होना भुला चुका है

तुम्हारी मोहब्बत
दीमक बन ख़ोखला
कर रही है मेरे दिल को


Wednesday, May 8, 2019

बिछोह.....पूजा प्रियंवदा

मुझ तक आने से पहले ही 
खर्च चुके थे तुम 
अपने सारे उम्र भर के वादे

गर्मी की किसी दोपहर 
किसी नीम अँधेरे कमरे में 
जो होठों से मेरे माथे पर रखा था 
वो बिछोह था हमेशा का

अमृता को पढ़ती हूँ 
गला भर आता है 
तुमसे बेतरतीब बालों वाले 
किसी छोटे बच्चे को देखती हूँ 
फूट -फूट कर रोने लगती हूँ

दिल उस सूफी का मज़ार है 
जिसका कासा कभी न भरा 
हथेलियों में उठाये फिर रही हूँ 
गर्म दिन, लम्बी रातें 
मेरी रूह पर जलने के दाग 
पक्के होने लगे हैं

Tuesday, April 23, 2019

रोजनामचा.....पूजा प्रियंवदा

शाम को जब घरों में होती है रौशनी 
देखना मेरी उन आँखों से 
जिनका कभी घर न हुआ

बच्चों की हथेलियाँ थामना 
मेरे उन हाथों से 
जिन्होंने दफन किया कई अपने

अलविदा की घड़ी 
महसूस करना मेरे उस दिल से 
जो धड़कता रहा तुम्हारे जाने के बाद भी

फूल नहीं पसंद मुझे 
किताबें बहुत महंगी हैं 
समन्दर बहुत दूर है 
अकेलापन भारी है पूरी दुनिया से 
कंधे अब दुखते हैं हर वक़्त

बेचना मेरा दुःख 
जैसे कोई औरत बेचती है 
देह का एक-एक रोआं 
ताकि अपने बच्चे को सीने से लगा सके

एक जगह ढूँढना 
कहीं किसी पेड़ के पास 
पूछना उससे और मुझे इजाज़त दिलाना 
की रख सकूं अब अपना जनाज़ा 
उसकी छाँव में 
जैसे तुम्हारे सीने पर थक कर 
कभी सर रखा था
-पूजा प्रियंवदा


Thursday, February 7, 2019

प्रवासी पक्षियों के डेरे ...पूजा प्रियंवदा

किसी का होना 
बस होना भर ही 
काफी होता है 
हमें भरने के लिए

उस किसी का लौटना 
सज़ा होता है 
प्रवासी पक्षियों के डेरे 
रहते हैं साल भर उदास

बसने और उजड़ने के 
बीच कहीं 
एक भूमध्य रेखा है 
जो कांपती रहती है

उसके हाथ की नरमी से
पिघलने लगा था जो 
दिल का उत्तरी ध्रुव 
अब एक लुप्त ग्लेश्यिर है

वो जो चाहता है 
मैं हो जाऊँ उसकी धूरी 
नहीं जाता मैं एक 
टूटा हुआ उल्कापिंड हूँ

-पूजा प्रियंवदा


Monday, December 3, 2018

गृह लक्ष्मी....पूजा प्रियंवदा

Housewife
उद्यम से स्वादविहीन 
आखिरी रोटी खाती है 
उसकी रसोई के विश्लेषण 
में कहे सब कड़वे शब्द 
चिपके हैं तालू से

सुन्दर, महंगी साड़ी 
उसने बचा रखी है 
किसी विशेष अवसर के लिए 
जब कि मर चुके हैं 
उसके देह के सारे त्यौहार 
तुम्हारे बिस्तर में

बच्चों की ख्वाहिशों 
का हिसाब लगाती 
मुल्तवी कर चुकी है 
वो अपने सारे अल्हड़पन 
तुम्हारे असम्वेदन को 
रोज़ सींचती गूंगे आंसुओं से

तुम्हारी देवी, प्रिया 
गृहलक्ष्मी



Monday, October 22, 2018

नया घर...पूजा प्रियंवदा

shimla life
Picture courtesy : @Shimlalife Twitter with permission
वहाँ कहीं एक सेब के 
बगीचे से घिरा 
एक पुराना घर है 
वहां एक बचपन दफ़्न है

मेरी नानी का 
पहाड़ी गुनगुनाना गुम है 
मेरे नाना की कहानियाँ 
खो गयी हैं

वो पगडंडियां 
अब मुझे भूल गयीं हैं 
वो पक्की रस्सी के झूले 
वीरान हैं

एक भाषा, एक उम्र 
एक जीने का सलीका 
पुराने घरों का साथ 
मर चुका है

वो पुराना घर 
अब नया बन चुका है !
- पूजा प्रियंवदा
पार्श्व स्वर