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Wednesday, July 18, 2018

पुरवा............डॉ. दीप्ति गुप्ता

पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए
पेड़ों, लताओं, कलियों और फूलों को
चूमे सहलाए लाड़ लड़ाए !
पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए

पीढ़े पे बैठी फुलकारी गढ़ती
नानी के माथे पे झलके
पसीने को पोंछे सुखाए,
हवा झलती जाए !
पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए

कपड़े फैलाती भाभी के घूँघट को
फर - फर उड़ाए,
पीछे गिराए भाभी को
छेड़े और सताए
पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए 

खीझी सी भाभी,
जब घूँघट को कसके सिर पे जमाए
तो तीखे से झेकि से पल्लू झपटती
पूरा का पूरा गगन में उड़ाए
पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए

बन्टी न सोए, चीखे और रोए तो
फर - फर फहराती
उसको दुलराती
मीठी सी थपकी दे-दे सुलाए
पुरवा की जब-जब चुनरी लहराए

जब - जब शन्नो छुपती
ठिठकती पिया के खत को
हँस – हँस के पढ़ती
पीछे से आके, 
शैतान की नानी सी पन्ने बिखराए 
पुरवा की जब - जब चुनरी लहराए

जब - जब धरती भट्टी सी तपती 
चटकती गर्मी में ला के बौछारे, 
शीतल फुहारे तन मन को, 
सबके ठन्डक पहुँचाए !!

-डॉ. दीप्ति गुप्ता