Showing posts with label सुरुचि में हरकीरत हीर. Show all posts
Showing posts with label सुरुचि में हरकीरत हीर. Show all posts

Wednesday, October 15, 2014

उसकी लम्बी उम्र का दिया....हरकीरत हीर

 












वह फिर जलाती है
दिल के फ़ासलों के दरम्यां
उसकी लम्बी उम्र का दिया....

कुछ खूबसूरती के मीठे शब्द
निकालती है झोली से
टांक लेती है माथे पे,
कलाइयों पे, बदन पे...
घर के हर हिस्सों को
करीने से सजाती है
फिर.....गौर से देखती है
शायद कोई और जगह मिल जाए
जहाँ बीज सके कुछ मोहब्बत के
फूल
पर सोफे की गर्द में
सारे हर्फ बिखर जाते हैं
झनझना कर फेंके गए लफ़्जों में
दिया डगमगाने लगता है
हवा दर्द और अपमान से
काँपने लगती है
आसमां फिर
दो टुकड़ों में बंट जाता है...

वह जला देती है सारे ख़्वाब
रोटी के साथ जलते तवे पर
छौंक देती है सारे ज़ज़्बात
कढ़ाई के गर्म तेल में
मोहब्बत जब दरवाजे पे
दस्तक देती है
वह चढ़ा देती है सांकल...

दिन भर की कशमकश के बाद
रात जब कमरे में कदम रखती है
वह बिस्तर पर औंधी पड़ी
मन की तहों को
कुरेदने लगती है.....

बहुत गहरे में छिपी
इक पुरानी तस्वीर
उभर कर सामने आती है
वह उसे बड़े जतन से
झाड़ती है, पोंछती है
धीरे-धीरे नक्श उभरते हैं
रोमानियत के कई हंसी पल
बदन में सांस लेने लगते हैं...

वह धीमे से..
रख देती है अपने तप्त होंठ
उसके लबों पे और कहती है
आज करवा चौथ है जान
खिड़की से झांकता चौथ ता चाँद
हौले-हौले मुस्कुराने लगता है......!!
-हरकीरत हीर
......सुरुचि से