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Friday, December 6, 2019

मैं कच्‍ची मिट्टी.....सीमा सिंघल सदा


मैं उतरना चाहती हूं 
तेरे मन के आंगन में 
मां तेरी ही तरह 
बसना चाहती हूं सबके दिलों में 
यूं जैसे तेरी ममता 
बसती है ...दर्पण की तरह जिसमें 
जिसकी भी नजर पड़ती है 
उसे अपना ही 
अक्‍स नज़र आता है ... !!!

मैं कच्‍ची मिट्टी 

तुम उसकी सोंधी सी महक 
अंकुरित हुई तेरे 
प्‍यार भरे पावन मन में, 
तुलसी के चौरे की 
परिक्रमा करती जब तुम 
आंचल थामकर 
मैं चलती पीछे-पीछे 
संस्‍कार से सींचती 
तुम मेरा हर कदम 
मैं डगमगाती जब भी 
तुम उंगली पकड़ाती अपनी 
मैं मुस्‍करा के चलती 
संग तुम्‍हारे कदम से कदम मिलाकर ... !!!!

लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा


Friday, October 18, 2019

मेरी हथेलियां दायरे बनाती हैं.....सीमा सिंघल सदा


ये बिखराव कैसा है
जिसे समेटने के लिए
मेरी हथेलियां दायरे बनाती हैं
फिर कुछ समेट नहीं पाने का
खालीपन लिये
गुमसुम सी मन ही मन आहत हो जाती हैं
अनमना सा मन
ख्यालों के टुकड़ों को
उठाना रखना करीने से लगाना
सोचना आहत होना
फिर ठहर जाना
..........
मन का भारी होना जब भी
महसूस किया
तुम्हारा ही ख्याल सबसे पहले आया
तुम कैसे जीते हो हरपल
बस इतना ही सोचती तो
मन विचलित हो जाता
इक टूटे हुए ख्याल ने आकर
मुझसे ये पूछ लिया
इन टुकड़ों में तुम भी बंट गई हो
मैं मुस्करा दी जब आहत भाव से
वो बनकर आंसू
बिखर गया मेरी हथेलियों में !!


लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा 

Wednesday, August 7, 2019

माँ का तर्जुबा.....सीमा सिंघल सदा



मेरे चेहरे की उदासियों को पढ़ता 
फिक्र की करवटें बदलता कभी, 
फिर सवालों की बौछार भी करता 
पर मेरी खामोशियों का वाईपर, 
जाने कब उन्‍हें एक सिरे से 
साफ कर देता 
एक मुस्‍कान :) ही तो चाहती थी 
माँ मैं ले आती बनावटी हँसी 
खिलखिलाकर हँसती माँ बुझे मन से कहती 
चल जाने दे मैं तुझसे बात नहीं करती 
गलबहियाँ डाल मैं 
डालती सब्र की चादर भी उनकी पलकों पर 
सीखने दो मुझे भी उलझनों के पार जाकर 
कैसा लगता है समझने दो 
न तुम्‍हारी फिक्र है न मेरे साथ यकीन 
मानो वो दुआ का काम करेगी  ! 
.... कुछ सोच माँ निर्णय की स्थिति में आती 
मन की कसमसाहट पे 
थोड़ा अंकुश लगाती मेरी नादानियों पर 
गौर करना भी सिखलाती 
तो कोशिशों को जीतने का फ़न भी बताती 
मेरी हर मुश्किल पे हौसले की मुहर जब लगाती 
यकीं मानो उन पलों में 
मैं हारकर भी जीत जाती !!

लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा 



Tuesday, June 25, 2019

समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती...सीमा सिंघल सदा


तल्‍लीन चेहरों का सच 
कभी पढ़कर देखना 
कितने ही घुमावदार रास्‍तों पर 
होता हुआ यह 
सरपट दौड़ता है मन 
हैरान रह जाती हूँ कई बार 
इस रफ्त़ार से
 .... 

अच्‍छा लगता है शांत दिखना 
पर कितना मुश्किल होता है 
भीतर से शांत होना 
उतनी ही उथल-पुथल 
उतनी ही भागमभाग 
जितनी हम 
किसी व्‍यस्‍त ट्रैफि़क के 
बीच खुद को खड़ा पाते हैं . 
समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती 
फिर भी वे हल कर लेते 
हर मुश्किल को !!!
लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा