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Friday, July 27, 2018

यही मेरी मुहब्बत का सिला है.....मोहन जीत ’तन्हा’

यही मेरी मुहब्बत का सिला है 
मिला है दर्द दिल तोड़ा गया है 

हुआ जो कुछ भी मेरे साथ यारो
“ज़माने में यही होता रहा है”

उसे मालूम है मैं बेख़ता हूँ 
न जाने फिर भी क्यों मुझसे ख़फ़ा है

ये जिस अंदाज़ से झटका है दामन
बिना बोले ही सब कुछ कह दिया है

बहा जिस के सुरों से दर्द दिल का 
वो साज़ अब बेसुरा सा हो गया है

हुए बरसों में उन से रु-ब-रु हम 
कोई ज़ख्म-ए-कुहन फिर खिल गया है

ये मेरी खोखली सी ज़िंदगी है 
गले में ढोल जैसे बज रहा है

मैं "तन्हा" चल रहा हूँ कारवाँ में
नहीं कोई किसी से वास्ता है
-मोहन जीत ’तन्हा’

ज़ख्म-ए-कुहन = पुराना घाव