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Wednesday, January 6, 2016

सात शहीद...यशोदा



चले गए वो क्यों
क्या दुश्मनी थी उनसे
जो मार दिया छल से
जो चाहते हैं वो
वो होगा जरूर
पर उन्हे... 
देनी होगी तिलाजली
हथियार के रूप में
और सरकार से
विनम्र आग्रह
तलाशें..उन सफेदपोशों
और सरकारी अमले में से
विभीषणों और जयचंदों  को
जो इन आतंकवादियों को 
खबरें मुहैय्या  करवाते हैं
व पनाह भी देते हैं
और तभी..
भारत की जनता
मरते-मरते जीने के
भय से मुक्त होगी
मन की उपज

-यशोदा    
                                                                                                                                                                        
        

Sunday, August 16, 2015

लोग भी कमाल करते हैं…यशोदा












यूं तो
बेरंग हैं पानी 
फिर भी जिन्दगी 
कहलाती हैं,

ढेर सारे रंग हैं 
शराब के फिर भी 
गन्दगी कहलाती हैं।।

लोग भी कमाल करते हैं…

जिन्दगी के गम 
भुलाने के लिये, 
गन्दगी में जिन्दगी 
मिलाकर पीते हैं…

- मन की उपज

Sunday, September 28, 2014

अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा..........यशोदा



















विडम्बना
यही है की
स्वतंत्र भारत में
नारी का
बाजारीकरण किया जा रहा है,

प्रसाधन की गुलामी,
कामुक समप्रेषण
और विज्ञापनों के जरिये
उसका..........
व्यावसायिक उपयोग
किया जा रहा है.

कभी अंग भंगिमाओं से,
कभी स्पर्श से,
कभी योवन से तो
कभी सहवास से
कितने भयंकर परिणाम
विकृतियों के रूप में
सामने आए हैं,

यही नही
अनाचार के बाद
जिन्दा जला देने
जैसी निर्ममता से
किसी की रूह
तक नहीं कांपती

क्यों....क्यों..
आज भी
पुरुषों के लिये
खुले दरवाजे

और....और..
स्त्रियों के लिये
उफ.......
कोई रोशनदान तक नहीं?

मैं कहती हूँ....
स्त्री नारी होती नहीं
बनाई जाती है.

हम सबको
अब यह संकल्प लेना होगा
कि अब और नहीं..
कतई नहीं,
अब किसी इन्द्र के
पाप का दण्ड
अब किसी भी
अहिल्या को
नहीं भुगतना पड़ेगा

मन की उपज
-यशोदा

Thursday, September 25, 2014

कैसा-कैसा दर्द रिसता है..........यशोदा

 











विचित्र है..
और सत्य भी तो है,
कि हजारों वर्ष के
इतिहास नें कभी भी,
किसी ने भी
नारी की आर्थिक स्थिति की
ओर ध्यान ही नहीं दिया

और .......
इसी के चलते
देश की बेटियां,
बहनें और माताओं को
इसी अर्थव्यवस्था
के चलते समाज में
हीन भावनाओं और
दासत्व से ग्रषित ही रही.

दासप्रथा के मूल में
नारी के प्रति
असहिष्णुता ही है
और यह
सामाजिक सोच है
जो स्त्रियों और पुरुषों को
अलग अलग नियमों के
खाकों में जकड़ देती है
और पुरुष कभी
देख और सुन ही नहीं पाता

और..........
वहीं स्त्री भीतर
कितना और
कैसा-कैसा दर्द रिसता है,
इसकी भावनात्मक वेदना
तो दूर मानवता के नाते
गहरी संवेदना भी
नहीं उपजती
जो की.....
उपजनी चाहिये

मन की उपज
-यशोदा