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Tuesday, January 12, 2021

सुख - दुःख ....अकिञ्चन धर्मेन्द्र

जीवन में
दुःख के विकल्प
इतने अनिर्णीत नहीं रहे..;
जितना
सुख की वस्तुनिष्ठता में
भयग्रस्त रहा-मन..!
एक अकेली वेदना
इतनी प्रभावी,
व्याकुल और आच्छादक हो सकती है..;
कभी सोचा नहीं था..!
इस बहते हुए जीवन में
खुलते रहे..
सुख के इतने स्रोत कि-
दिन-रात सहमा किया..;
अकेला दुःख..!
पहाड़ की
किसी निर्जन ऊँचाई पर बैठे
किसी अवधूत की साधना ढूँढ़ती रही..;
निर्द्वन्द्वता के जटिल सूत्र..!
इस विकट जंगल में
'गूलर का फूल'
यदि कहीं दिख जाए..;
तो वह आँखों का भ्रम है..!
वे पागल रहे होंगे-
"सुख 'हाथ का कपूर' है"-
जो रटते रहे-अभी तक..!
कभी नहीं होती-
पूर्णिमा..;इधर..!
इस ध्रुव पर
बारहों महीने
अँधेरी रात का नियम है..!
सुख
'ईद का चाँद' नहीं..;
अमावस का ताप है..!
मैंने
इस संसार से
कभी नहीं नहीं माँगा-सुख..!
फिर भी कभी
टस से मस नहीं हुआ-'काश'..!
काश!
सूख जाता-
पीर का अंकुर..;
माटी के बाहर झाँकने से पहले..!
काश!
मन मरु-थल ही बना रहता..!
काश!
दुःख के चुनाव के लिए
सब स्वतन्त्र रहते..!
काश!
सुख
सहज,तन्मय,एकाग्र और एकनिष्ठ रहता..!
कब तक
भरेंगे-
बाँसुरी में स्वर..;
जले हुए कण्ठ..?
सुधे!
गरल की उत्कण्ठा लिए
तृषित रखना-यह मन..;
जीवन-भर..!
दुःख!
अब यदि तुम भी नहीं रहे..;
कुछ भी नहीं बचेगा..!
©अकिञ्चन धर्मेन्द्र

Saturday, January 9, 2021

मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ ....अकिञ्चन धर्मेन्द्र

मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..;

इसलिए नहीं कि-
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..!
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..;
इसलिए कि-
मेरी साँसों में
घुलती रहती है-माटी की सोंधी गन्ध..!
मैं तुम्हें
इसलिए प्रेम करता हूँ..;
क्योंकि
मैं जंगल से प्रेम करता हूँ..!
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..;
इसलिए नहीं कि-
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..!
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..;
इसलिए कि
मुझे भाती है-
फुदकती हुई
नन्हें पंखों वाली गौरैया..!
उसकी मोहक,उन्मुक्त उड़ान..!
मैं तुम्हें
इसलिए प्रेम करता हूँ..;
क्योंकि
मुझे अच्छा लगता है-
हल्की चाँदनी रात में
किसी
सतत् प्रवाहिनी नदी के किनारे
बैठकर...
उसकी शान्त निश्छलता को निहारना..!
उसके चहकते हुए सौन्दर्य को
आत्मसात करना..!
मैं तुम्हें
इसलिए प्रेम नहीं करता हूँ कि-
मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ..!
मैं तुम्हें
इसलिए प्रेम करता हूँ..;
क्योंकि मुझे पता है-
कपास के उजलेपन का
सात्त्विक रहस्य..!
भ्रमरों एवं तितलियों की
रससिक्तता का
सुगन्धकामी मनोविज्ञान..!
मुझे पता है-
समर्पित प्रकृति का
अगाध,मोहक महत्त्व..!
सच कहूँ-
अब इतना औपचारिक हो गया है..;
यह कहना-
"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ..!"
कभी-कभी
एक गहन उदासी से
भर जाता है-कोरा मन..!
"मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ"-
यह कहने से बेहतर है..;
मैं तुम्हें प्रेम करता रहूँगा..!
©अकिञ्चन धर्मेन्द्र

Wednesday, December 30, 2020

कोई दुःख इतना बड़ा नहीं होता...अकिञ्चन धर्मेन्द्र

कोई दुःख
इतना बड़ा नहीं होता...
जितना
मन ने बढ़ा लिया धीरे-धीरे..;
पानी में पड़े
तेल की बूँद की तरह..!
न ही मन का ख़ालीपन
इतना विस्तृत..;
जिसमें समा जाए-पूरा पहाड़..!
कोई अनुभूति
इतनी गहरी नहीं होती कि
उसके मापन के लिए
असफल हो जाएँ-
सारे निर्धारित मात्रक..!
कोई रुदन
इतना द्रावक नहीं होता कि
बन जाए-
एक नया महासागर..!
कोई व्याकुलता
इतनी विवश नहीं होती कि
भरी दोपहरी भी
अमावस की
अँधेरी-आधी रात लगने लगे..!
न ही कोई सन्तोष
इतना फलदायी कि
बालू निचोड़कर
प्यास बुझायी जाए..!
पागलपन की
निर्मम भावुकता लिए
भटकते-भटकते...
अब तो केवल होंठ ही नहीं..;
जल जाती है-
आत्मा तक भी..!
काश!
हम दूध ही फूँक-फूँककर पिये होते..!
©अकिञ्चन धर्मेन्द्र

Sunday, December 27, 2020

जो जलने के अभ्यस्त हैं.. ...अकिञ्चन धर्मेन्द्र



अँजुरी-भर जल की आवश्यकता
उन्हें होती है..;
जिन्हें प्यास लगी हो..!
जो जलने के अभ्यस्त हैं..;
वे पानी से भी जल सकते हैं..!
कविताएँ उनके लिए हैं..;
जिन्हें प्रिय है-नीला रंग..!
रिक्तताएँ
जन्मदात्री होती हैं..;
कलाओं की..!
आसन्नप्रसवा वेदना से
हूकता है-मन..!
किसी भयावह,निर्जन जंगल में
भटकते-भटकते
जो पागल हो जाते हैं..;
वे भी जन्म लेते होंगे-
किसी अग्निधर्मा,उर्वर गर्भ से ही..!
अभागे
आकाश फाड़कर नहीं आते..!
इस धरती के
दहकते हुए मञ्च पर
तुम्हें करना ही होगा-
अपने हिस्से का कत्थक..!
चुटकी-भर वातास में
भुनी जा सकती है-आत्मा भी..!
तुम
जिन्हें पा नहीं सकते..;
उन्हें गा सकते हो..!
जब समय के सींखचे से
झाँकने लगें-शताब्दियाँ..;
हृदय के बहुत गहरे धँसीं
ज़हरबुझीं,नुकीली कीलों को छूना...
कोई सम्बन्ध
किसी दर्द से बड़ा नहीं होता..!

©अकिञ्चन धर्मेन्द्र