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Sunday, May 10, 2020

तुम्हें बाँध पाती सपने में! ....... महादेवी वर्मा

तुम्हें बाँध पाती सपने में!
तो चिरजीवन-प्यास बुझा
लेती उस छोटे क्षण अपने में!

पावस-घन सी उमड़ बिखरती,
शरद-दिशा सी नीरव घिरती,
धो लेती जग का विषाद
ढुलते लघु आँसू-कण अपने में!

मधुर राग बन विश्व सुलाती
सौरभ बन कण कण बस जाती,
भरती मैं संसृति का क्रन्दन
हँस जर्जर जीवन अपने में!

सब की सीमा बन सागर सी,
हो असीम आलोक-लहर सी,
तारोंमय आकाश छिपा
रखती चंचल तारक अपने में!

शाप मुझे बन जाता वर सा,
पतझर मधु का मास अजर सा,
रचती कितने स्वर्ग एक
लघु प्राणों के स्पन्दन अपने में!
साँसें कहती अमर कहानी,
पल पल बनता अमिट निशानी,
प्रिय! मैं लेती बाँध मुक्ति
सौ सौ, लघुपत बन्धन अपने में!
तुम्हें बाँध पाती सपने में!
- स्मृतिशेष महादेवी वर्मा

Wednesday, April 1, 2020

अचानक उग आए थे अप्रैल में इतने सारे फूल ...घनश्याम कुमार 'देवांश'

सिर्फ़ तुम्हारी बदौलत
भर गया था अप्रैल
विराट उजाले से
हो रही थी बरसात
अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह में
चाँद के चेहरे पर नहीं थी थकावट
रातों के सिलसिले में
एक इन्द्रधनुष टँग गया था
अप्रैल की शाम में
एक सूखे दरख़्त की फुनगी में
मंदिर की घंटियाँ
गिरजे की कैंडल्स और
मस्जिद की अज़ान
घुल गई थी
अप्रैल की त्रिवेणी में...

सचमुच... सिर्फ़ तुम्हारी ही बदौलत
अचानक उग आए थे
अप्रैल में
इतने सारे फूल
पहली बार अच्छा लग रहा था
बनकर अप्रैल फूल...
-घनश्याम कुमार 'देवांश'

Sunday, February 9, 2020

गीतों के मधुमय आलाप. ....धनंजय सिंह

गीतों के मधुमय आलाप
यादों में जड़े रह गए
बहुत दूर डूबी पदचाप
चौराहे पड़े रह गए

देखभाल लाल-हरी बत्तियाँ
तुमने सब रास्ते चुने
झरने को झरी बहुत पत्तियाँ
मौसम आरोप क्यों सुने
वृक्ष देख डाल का विलाप
लज्जा से गड़े रह गए

तुमने दिनमानों के साथ-साथ
बदली हैं केवल तारीख़ें
पर बदली घड़ियों का व्याकरण
हम किस महाजन से सीखें
बिजली के खंभे से आप
एक जगह खड़े रह गए

वह देखो, नदियों ने बाँट दिया
पोखर के गड्ढों को जल
चमड़े के टुकड़े बिन प्यासा है
आँगन चौबारे का नल
नींदों के सिमट गए माप
सपने ही बड़े रह गए
-धनंजय सिंह

Wednesday, April 24, 2019

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा....पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
पत्थर, की निकलो फिर,
गंगा-जल-धारा!
गृह-गृह की पार्वती!

पुनः सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर की बनो आरती!--
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!--
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा!
- पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

Sunday, February 3, 2019

कुछ तो हवा सर्द थी.......परवीन शाकिर

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी 

दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी 


बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की 

चाँद भी ऐन चेत का उस पे तेरा जमाल भी 


सब से नज़र बचा के वो मुझ को ऐसे देखते 

एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी 


दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लो 

शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी 


उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था 

अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ मुहाल भी 


मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर 

हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी 


शाम की नासमझ हवा पूछ रही है इक पता 

मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी


उस के ही बाज़ूओं में और उस को ही सोचते रहे 

जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी 
-परवीन शाकिर

Thursday, December 6, 2018

शहनाई गूँज रही...जयकृष्ण राय तुषार

जाने क्या होता
इन प्यार भरी बातों में?
रिश्ते बन जाते हैं
चन्द मुलाकातों में ।

मौसम कोई हो
हम अनायास गाते हैं,
बंजारे होठ मधुर
बाँसुरी बजाते हैं,
मेंहदी के रंग उभर आते हैं
हाथों में ।

खुली-खुली आँखों में
स्वप्न सगुन होते हैं,
हम मन के क्षितिजों पर
इन्द्रधनुष बोते हैं,
चन्द्रमा उगाते हम
अँधियारी रातों में ।

सुधियों में हम तेरी
भूख प्यास भूले हैं
पतझर में भी जाने
क्यो पलाश फूले हैं
शहनाई गूँज रही
मंडपों कनातों में।
-जयकृष्ण राय तुषार

Wednesday, October 17, 2018

जीने की वजह ........रंजना भाटिया


दुःख ...
आतंक ...
पीड़ा ...
और सब तरफ़
फैले हैं .............
न जाने कितने अवसाद ,
कितने तनाव ...
जिनसे मुक्ति पाना
सहज नही हैं
पर ,यूँ ही ऐसे में
जब कोई...
नन्हीं ज़िन्दगी
खोलती है अपने आखें
लबों पर मीठी सी मुस्कान लिए
तो लगता है कि
अभी भी एक है उम्मीद
जो कहीं टूटी नहीं है
एक आशा ...
जो बनती है ..
जीने की वजह
वह हमसे अभी रूठी नही है !
-रंजना भाटिया

Tuesday, October 16, 2018

ये आँसू यूँ ही तो बहते नहीं हैं ......रंजना वर्मा

वजह बिन फ़ासला रखते नहीं हैं 
किसी से दुश्मनी करते नहीं हैं 

भरेंगे जल्द ही सब घाव तन के
जखम अब ये बहुत गहरे नहीं हैं 

समझ लेता सभी का दर्द है दिल
ये आँसू यूँ ही तो बहते नहीं हैं 

सहेजी अश्क़ की दौलत जिगर में
जवाहर ये अभी बिखरे नहीं हैं 

दुआ में माँगते खुशियाँ जहाँ की
किसी से हम कभी जलते नहीं हैं 

हैं हँसते लोग अक्सर दूसरों पे 
मगर खुद पे कभी हँसते नहीं हैं 

जमाना साथ आये या न आये
मगर हम राह से भटके नहीं हैं
-रंजना वर्मा

Thursday, October 4, 2018

हौसला उम्मीदों का .............भारती पंडित


दिखता न हो जब किनारा कोई,
मिलता न हो जब सहारा कोई
जला ले दीया खुद ही की रोशनी का,
कोई तुझसे बढ़कर सितारा नहीं

तूफां तो आए है आते रहेंगे,
ग़मों के अँधेरे भी छाते रहेंगे,
आगाज़ कर रोशनी का कि तुझको, 
अंधेरों की महफ़िल गंवारा नहीं.

माना कि ये इतना आसां नहीं है,
मगर सम्हले गिर के जो इन्सां वहीं है,
तारीके शब में उम्मीदों का परचम ,
कहीं इससे बेहतर नज़ारा नहीं .
-भारती पंडित


Thursday, September 27, 2018

मन के भी तो कितने हैं रंग....देवयानी


हरे के कितने तो रंग हैं
एक हरा जो पेड की सबसे ऊँची शाख से झाँकता है
एक जिसे छू सकते हैं आप
बढ़ाते ही अपना हाथ
एक दूर झुरमुटों के बीच से दिखाई देता है
एक नयी फूटती कोंपल का हरापन है
एक हरा बूढ़े पके हुए पेड़ का
एक हरा काई का होता है
और एक
पानी के रंग का हरा

कितने ही तो हैं आसमानी के रंग
रात का आसमान भी आसमानी है
सुबह के आसमान का भी नहीं है कोई दूसरा रंग
ढलती साँझ का हो
या हो भोर का आसमान
अपनी अलग रंगत के बावजूद
आसमानी ही होता है उसका रंग

मन के भी तो कितने हैं रंग
एक रंग जो डूबा है प्रेम में
एक जो टूटा और आहत है
एक पर छाई है घनघोर निराशा
फिर भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता
एक तलाशता है खुशी
छोटी छोटी बातों में
छाई रहती है एक पर उदासी फिर भी
एक मन वो भी है
जिसे कुछ भी समझ नहीं आता है
जो कहिं सुख और दुख के बीच में राह भटका है

-देवयानी

Wednesday, September 26, 2018

साजिश में शामिल नहीं हूँ......एकान्त श्रीवास्तव


इस रंग के बारे में
कोई भी कथन इस वक़्त
कितना दुस्‍साहसिक काम है
जब जी रहे हैं इस रंग को
गेंदे के इतने और इतने सारे फूल

जब हँस रहे हों
पृथ्‍वी पर अजस्र फूल
सरसों और सूरजमुखी के 
सूर्य भी जब चमक रहा हो
ठीक इसी रंग में
और यही रंग जब गिर रहा हो
सारी दुनिया की देह पर

यह रंग हल्‍दी की उस गाँठ का है
जो सिल पर लोढ़े के ठीक नीचे
पिसी जाने के इंतजार में है

यह एक बहुत नाजुक रंग है
जिससे रंगी है
लड़कियों की चुन्‍नी और नींद

सुनो! मुझे खुशी है 
कि मैं इस रंग से चीजों को जुदा करने की
साजिश में शामिल नहीं हूँ।

-एकान्त श्रीवास्तव

Wednesday, September 5, 2018

गीतुल मितवा........प्रेम शर्मा

भीगा-भीगा
रोया-रोया,
गीतुल मितवा
खोया-खोया,
कवन गुहारू
केहू अकुवारूँ ,
कण्ठ हलाहल
ताल कहरवा ।
           
सुर सम्वाद
सधे ना साधे,
मुखड़े-बोल
अधूरे-आधे,
नाद अनन्ता
सबद रमन्ता
न कोउ कन्ता
नाहि नहरवा ।
      
ओहि रे बचुआ
मानुष अँकुवा,
तुहिन तो
हमि इन्द्रधनुषवा,
जीवन जोगे
मरन अजोगे,
नदी-नाँव
यात्रा संजोगे,
समय जुझारू
काल बुहारू ,
निधनं श्रेयः
खेत सुरगवा ।
- प्रेम शर्मा

Monday, September 3, 2018

मितवा.........हरीश भादानी

कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
घाटी में आंगन है
आंगन में बांहें
बांहती दहरिया की
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
आंखों में झीलें हैं
झीलों में रंग
रंगवती हलचल की
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
माटी में सांसें हैं
सांसों के होठ
बोलती पखावज की
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
दूरी पर चौराहे
चौराहे खुभते हैं
चरवाहे पांवों की
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
रात एक पाटी है
पहर-पहर लिखता है
उजलती हक़ीक़त की
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
घाटी में आंगन है, आंगन में बाहें
-हरीश भादानी

Thursday, August 16, 2018

परिचय की वो गांठ....त्रिलोचन

1917-2007

यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला 
फूल उपेक्षित कोई फूला 
जाने कौन लहर ती उस दिन 
तुमने अपनी याद जगा दी। 


कभी कभी यूं हो जाता है 
गीत कहीं कोई गाता है 
गूंज किसी उर में उठती है 
तुमने वही धार उमगा दी। 


जड़ता है जीवन की पीड़ा 
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा 
छवि के शर से दूर भगा दी।
-त्रिलोचन

Wednesday, June 13, 2018

पा ही जाओगे कोई मोती....भारत भूषण


ये उर-सागर के सीप तुम्हें देता हूँ ।
ये उजले-उजले सीप तुम्हें देता हूँ ।

है दर्द-कीट ने 
युग-युग इन्हें बनाया
आँसू के 
खारी पानी से नहलाया

जब रह न सके ये मौन, 
स्वयं तिर आए
भव तट पर 
काल तरंगों ने बिखराए

है आँख किसी की खुली 
किसी की सोती
खोजो, 
पा ही जाओगे कोई मोती

ये उर सागर की सीप तुम्हें देता हूँ
ये उजले-उजले सीप तुम्हें देता हूँ

-भारत भूषण

Monday, May 21, 2018

छांह भी मांगती है पनाह....अश्वनी शर्मा

रेगिस्तान में जेठ की दोपहर 
किसी अमावस की रात से भी अधिक
भयावह, सुनसान और सम्मोहक होती है

आंतकवादी सूरज के समक्ष मौन है
आदमी, पेड़, चिड़िया, पशु
कोई प्रतिकार नहीं बस
 ढूंढते हैं मुट्ठीभर छांह
आवाज के नाम पर 
जीभ निकाले लगातार
हांफ रहे कुत्तों की आवाजें सुनाई देती हैं
सन्नाटा गूंजता है चारों ओर

गलती से बाहर निकले आदमी को
लू थप्पड़ मारकर बरज देती है
प्याज और राबड़ी खाकर भी
झेल नहीं पाता आदमी

छलकते पूर्ण यौवन के अल्हड़ उन्माद में स्वछंद दुपहरी
किसी भी राह चलते से खिलवाड़ करती है

धूप सूरज और लू की त्रिवेणी
करवाती है अग्नि स्नान 
रेत और उसके जायों को
इस नग्न आंतक से त्रस्त
छांह भी मांगती है पनाह।
-अश्वनी शर्मा

Thursday, March 8, 2018

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार....त्रिलोचन


खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार
अपरिचित पास आओ

आँखों में सशंक जिज्ञासा
मिक्ति कहाँ, है अभी कुहासा
जहाँ खड़े हैं, पाँव जड़े हैं
स्तम्भ शेष भय की परिभाषा
हिलो-मिलो फिर एक डाल के
खिलो फूल-से, मत अलगाओ

सबमें अपनेपन की माया
अपने पन में जीवन आया 
-त्रिलोचन

Wednesday, January 3, 2018

मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना....अनवर जलालपुरी

मशहूर शायर ज़नाब अनवर जलालपुरी का कल दिन को 10 दस बजे लखनऊ में इन्तेकाल हो गया
आज उनके शहर जलालपुर में सुपुर्देख़ाक किया जाएगा
06 जुलाई 1947 - 02 जनवरी 2018
मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना
मेरे लिये कभी भी दिल सोगवार मत करना

मेरी जुदाई तेरे दिल की आज़माइश है
इस आइने को कभी शर्मसार मत करना

फ़क़ीर बन के मिले इस अहद के रावण
मेरे ख़याल की रेखा को पार मत करना

ज़माने वाले बज़ाहिर तो सबके हैं हमदर्द
ज़माने वालों का तुम ऐतबार मत करना

ख़रीद देना खिलौने तमाम बच्चों को
तुम उन पे मेरा आश्कार मत करना

मैं एक रोज़ बहरहाल लौट आऊँगा
तुम उँगुलियों पे मगर दिन शुमार मत करना
-अनवर जलालपुरी

Sunday, December 24, 2017

"मैं तोड़ती पत्थर।"....पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"



वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन, 
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

Thursday, December 7, 2017

तेरी सदा पे मुझे लौटना पड़ा....आलोक यादव

आँखों की बारिशों से मेरा वास्ता पड़ा
जब भीगने लगा तो मुझे लौटना पड़ा 

क्यों मैं दिशा बदल न सका अपनी राह की 
क्यों मेरे रास्ते में तेरा रास्ता पड़ा 

दिल का छुपाऊँ दर्द कि तुझको सुनाऊँ मैं 
ये प्रश्न एक बोझ सा सीने पे आ पड़ा

खाई तो थी क़सम कि न आऊँगा फिर कभी 
लेकिन तेरी सदा पे मुझे लौटना पड़ा

किस - किस तरह से याद तुम्हारी सताए है 
दिल जब मचल उठा तो मुझे सोचना पड़ा

वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़ 
पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा 

अच्छा हुआ कि छलका नहीं उसके सामने 
‘आलोक’ था जो नीर नयन में भरा पड़ा
- आलोक यादव