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Wednesday, August 26, 2020

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे.... रामधारी सिंह दिनकर


वैराग्य छोड़ बांहों की विभा सम्भालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो,
है रुकी जहां भी धार, शिलाएं तोड़ो,
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो।

चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे!
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है,
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है,
सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है,
ऊंचा उठकर कामार्त्त राग जलता है।

अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे!
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!

जिनकी बांहें बलमयी ललाट अरुण है,
भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है,
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है,
वारुणी धार में मिश्रित जहां गरल है।

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है,
तलवार प्रेम से और तेज होती है !

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए,
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है,
मरता है जो एक ही बार मरता है।

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे!
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे !

स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है,
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है !
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!

जब कभी अहम पर नियति चोट देती है,
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है,
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है,
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है ।

चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे!
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!

उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है,
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है,
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है,
जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है।

सबसे स्वतन्त्र रस जो भी अनघ पिएगा!
पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा!
-रामधारी सिंह दिनकर

Wednesday, August 28, 2019

विजयी के सदृश जियो रे... रामधारी सिंह दिनकर

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो 
चट्टानों की छाती से दूध निकालो 
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो 
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो 

चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे 
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे! 

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है 
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है 
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है 
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है 
अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे 
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे! 
-रामधारी सिंह दिनकर

Monday, April 23, 2018

कोई अर्थ नहीं......राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, 
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

मन कटुवाणी से आहत हो 
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
     फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
-राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर