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Thursday, February 28, 2019

बुलाता है मुझे वो पास अपने......महेशचंद्र गुप्त 'ख़लिश'


कहे दुनिया सनम से दूर रहना
मुझे तनहा नहीं मंजूर रहना


दिया है प्यार हमने प्यार ले कर
किसीका किसलिए मश्कूर रहना


लिखा क़िस्मत में है ये आशिक़ों की
ग़मों से ज़िंदगी भरपूर रहना 


शिकायत है मुझे दिलबर से ये ही
न आँखों में वफ़ा का नूर रहना


बुलाता है मुझे वो पास अपने
मगर कहता है मुझसे दूर रहना


ख़लिश ये ज़िंदगी क्या ज़िंदगी है
पहर आठों नशे में चूर रहना.

बहर --- १२२२  १२२२  १२२ 

-महेश चन्द्र गुप्ता

Saturday, January 26, 2019

सत्तर के ऊपर सात है.....महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

सत्तर ऊपर सात हैं, बाकी हैं कुछ एक
ईश्वर के दरबार में अब तो माथा टेक

बाजू में अब दम नहीं, धीरे उठते पाँव
यौवन मद का ही रहा था अब तक अतिरेक

क्यों है ढलती उम्र में तू माया से ग्रस्त
बिन ललचाए काम तू करता जा बस नेक

इस दुनिया में मिल सका कब तुझको है मान
होगा दूजे लोक में संतों सा अभिषेक

हासिल तुझको हैं सभी सुख के साधन आज
मत तू उनमें लिप्त हो, मत तज ख़लिश विवेक.

बहर --- २२२२  २१२२  //  २२२२  १

-महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

Friday, August 3, 2018

फन्दा............लक्ष्मीनारायण गुप्त


कुछ मुसीबतें, कुछ परेशानियाँ
ऐसी होती हैं जो फन्दे की तरह
गले पर पड़ जाती हैं
जितना प्रयत्न करो निकलने का
फन्दा उतना ही और कसता जाता है

ज़्यादा से ज़्यादा तुम यह कर सकते हो
कि फन्दे को स्वीकार कर लो
अंगीकार कर लो
शिव की तरह विष पान कर लो
फन्दा अब तुम्हारे जीवन की हक़ीकत है

जैसे तुम कारागार में सजा काट रहे हो
इस सजा की कोई अवधि नहीं है
या तो कोई चमत्कार होगा
जो तुम्हें मुक्त करेगा
या फिर यह काम यमराज करेंगे

दिक्कत यह है कि
फन्दा कभी स्वाभाविक नहीं हो पाता
बन्धन हमेशा बन्धन ही रहता है
इस लिए निकलने का व्यर्थ प्रयत्न
अविरल ज़ारी रहता है

फन्दा शाश्वत है
नियति है, प्रकृति है
तुम इससे पशु की तरह बँधे हो
मुक्त होने का प्रयास व्यर्थ है
बस आराम से चारा खाओ


-लक्ष्मीनारायण गुप्त
-१ अगस्त, २०१८

Friday, June 15, 2018

नश्तर मेरे सीने में गहराती चली गई.....महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'

उनकी जो आई याद तो आती चली गई
दिल में हज़ारों ख़्वाब वो लाती चली गई

मासूम आँखों में कोई तो राज़ था निहां
नग़मा कोई भूला सा दोहराती चली गई

जब भी मिलन उनसे हुआ तो आ गई ख़ुशी
उनकी जुदाई ग़म बहुत ढाती चली गई

जब -जब भी आई याद है रुख़्सत की वो घड़ी
नश्तर मेरे सीने में गहराती चली गई

रहते हैं मेरे साथ वो हर दम ख़लिश कि यूँ
रूह रास्ता सहरा में दिखलाती चली गई.

 बहर --- २२१२  २२१२  २२१२  १२

-महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'

Thursday, February 8, 2018

पागल मन....लक्ष्मीनारायण गुप्त


शराब है, मस्ती है, बेफ़िक्री है
मगर साकी नहीं पास है
बिन साकी के शराब पीने में
न मज़ा है, न हुलास है

साकी को देखा तो नीयत बदल गई
क्या कहूँ मेरी तक़दीर बिगड़ गई
साकी को यह बात बताऊँ कैसे
ना सुनने की हिम्मत मैं कर पाऊँ कैसे


पागल मन की बात बताऊं कैसे
नामुमकिन को मुमकिन कर पाऊँ कैसे
तू ही बता तुझे मैं पाऊँ कैसे
दीवाने दिल की प्यास बुझाऊँ कैसे

नहीं बताने की हिम्मत है मुझमें
पर नज़र मिलाना चाहूँगा मैं तुझसे
किस अदा से तू शराब ढालती प्याले में
मज़ा आगया तुझसे नज़र मिल जाने में

पागल मन को समझाता हूँ
पाने की उम्मीद छोड़, तू हारा
नज़र मिल गई, क़िस्मत अच्छी
क्या यह कम है यारा

-लक्ष्मीनारायण गुप्त

Thursday, November 17, 2016

औ’ सदा को गंध उस की सो गई............महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'


एक नन्हा फूल कल तक थी कली
आज चकित सी पवन में हिल रही
देख कर वो रंग भरी पांखुरी
मन ही मन निज रूप पर थी खिल रही

गंध मदमाती हॄदय को मोहती
छा रही उपवन में चारों ओर थी
पुष्प के रंगीन जीवन की यह
आज पहली -पहली किंचित भोर थी

तितलियों के संग वह मस्ती भरी
था अजब अठखेलियाँ सी कर रहा
कोई भंवरा गिर्द उस के घूम कर
था प्रणय का गान कर सुस्वर रहा

किन्तु उस के भाग्य में कुछ और था
एक घटना अप्रतिम सी हो गई
तोड़ कर कुचला नियति के हाथ ने
औ’ सदा को गंध उस की सो गई.

-महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

Tuesday, August 16, 2016

जिज्ञासा न होगी तिरोभूत....महेश चंद्र द्विवेदी


देखा? रात्रि-तिमिर का भूत
कृशकाय, कंकाल,  कुरूप;  
चिता की अग्नि से उठा सा
अग्निबेताल, अघोर, अवधूत.

प्रश्न पर तुम बने थे निःशब्द,
वह समझा विछोह ही प्रारब्ध;
हुआ ऐसा विचलित, विक्षिप्त,
जीवन कर लिया व्यर्थ, विद्रूप.

अब उसे देख काँपते अप्रयास
बढ़ा देते हो कदम अनायास;
ज्यूँ तम मेँ सामने आ जाये
महिषवाहन मारक कालदूत.

उसका प्रश्न था मात्र त्रिशब्द
शाश्वत, दिग-काल असम्बद्ध;
गूंजेगा, जब तक अनुत्तरित
जिज्ञासा न होगी तिरोभूत.

-महेश चंद्र द्विवेदी
ज्ञान प्रसार संस्थान
1/137, विवेक खण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ 

Wednesday, August 10, 2016

क्योंकि मेरा प्यार तुम्हें रास नहीं आता....लक्ष्मीनारायण गुप्त
















मैं तुमसे प्यार तो नहीं करता
लेकिन तुम्हारी मुस्कान
मुझे अच्छी लगती है।
तुम्हारी हँसी और भी
शानदार लगती है।

तुम्हारा लिबास, तुम्हारी स्टाइल
क्या बात है!
तुम्हारे चेहरे की चमक
जैसे हीरे जवाहरात हैं।

लेकिन मैं तुमसे क़तई
प्यार नहीं करता
क्योंकि मेरा प्यार तुम्हें 
रास नहीं आता
और मैं ऐसा कुछ नहीं
करना चाहता
जो तुम्हें नहीं भाता।

तुम्हारी खुशी से मुझे
चैन मिलता है
प्यार इस चैन में
ख़लल डाल सकता है
तुम्हें नाराज़ कर सकता है।
मैं यह ख़तरा
मोल नहीं ले सकता
इस लिए माफ़ करना
मैं तुमसे प्यार
नहीं कर सकता।

-लक्ष्मीनारायण गुप्त
९ अगस्त, २०१६

Tuesday, July 5, 2016

हमने उनको पास बुलाया लेकिन वो ही आ न सके....महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश



हमने उनको पास बुलाया लेकिन वो ही आ न सके
ख़त में सब कुछ लिख न सके, दिल भी अपना दिखला न सके

दिन, हफ़्ते, माह बीत गए अब तो , कितने ही साल हुए
ना आना था आ  न सके, संदेसा तक भिजवा न सके

बचपन बीता और जवानी भी अब तो लाचार हुई
पागल दिल में आस अभी है, इसको हम समझा न सके

लगता है चुपके से कभी आ जाएँ वो यूँ ही न कहीं
मिलने के वो ख़्वाब मेरी आँखों से अब तक जा न  सके

कुछ तो कर लो होश ख़लिश, दुनिया की सुन लो बात ज़रा
 दुनिया का दस्तूर यही जाने वाले फिर आ न सके.

बहर --- २२-२२  २११२  २२-२२  २२११  २ 


-महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

Friday, April 22, 2016

बड़े बावरे हिन्दी के मुहावरे......भावेश सोनी


         
 
हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे है,
खाने पीने की चीजों से भरे है....

कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें है ,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले है ,

फलों की ही बात ले लो....
आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,

कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,

कहीं दाल में काला है,
तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,

कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
तो कोई लोहे के चने चबाता है,

कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है, 

मुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,

सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चल, 

पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है,
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है, 

गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं, 

कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,

किसी के दांत दूध के हैं ,
तो कई दूध के धुले हैं,

कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है,
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है,

किसी को छटी का दूध याद आ जाता है ,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है ,

शादी बूरे के लड्डू हैं , जिसने खाए वो भी पछताए,
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं,
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है ,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं,

कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है...

कभी कोई चाय पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है

और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है,
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,

जितने मुंह है, उतनी बातें हैं, 
सब अपनी अपनी बीन बजाते है,

पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,

सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं ...

-भावेश सोनी

Sunday, March 20, 2016

गिन लेना हमको अपने दिलदारों में............महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’


वक़्त बिताया अब तक तो हमने रंगीं गुलज़ारों में
आज कहो तो जी लेंगे हम इन अंधे गलियारों में

कोई ख़ता तो होगी जो तुम नाराज़ी में बैठे हो
उफ़ न कभी लब से निकलेगी, चिनवा दें दीवारों में

जो न कभी तुमने चाहा वो दिल में ना लाए हरगिज़
लोग हमारी गिनती करते हैं दिल के लाचारों में

जान लिया नामुमकिन है दिल को पाना अहसासों से
पास न दौलत तो मत जाना उल्फ़त के बाज़ारों में

आज तलक मुँह ना मोड़ा है ख़लिश वफ़ा से तो हमने 
भूल न जाना, गिन लेना हमको अपने दिलदारों में.

बहर --- २११२  २२२२  २२२२  २२२२
 महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

Thursday, March 17, 2016

इक उम्र बीती आए तब मिलने के वास्ते......महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’




इक उम्र बीती आए तब मिलने के वास्ते
ज्यों आए दिल का चैन वो हरने के वास्ते

हो के नहीं रिश्ता हुआ दोनों के दरमियाँ
हम हुस्न, वो थे इश्क़, बस कहने के वास्ते

नज़रें मिलीं तो थीं मगर वो ही न मिल सके
मानिंदे-शम्मा हम रहे जलने के वास्ते

बेकार सब जीना रहा, हासिल न कुछ हुआ
हम कुछ नहीं क़ाबिल रहे करने के वास्ते

है अब नहीं उम्मीद या अरमान कुछ ख़लिश
हम जी रहे हैं सिर्फ़ अब मरने के वास्ते.

बहर --- २२१२  २२१२  २२१२  १२

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

गूगल ग्रुप एक मंच में प्रकाशित रचना

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