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Thursday, April 5, 2018

उड़ान..........कुसुम कोठारी


उड़ान जान ले बड़ी कठिन है
कोई तेरे साथ नही है 
इन राहों में धूप गरम है
दूर तक कोई छांव नही है
सहारे की भी उम्मीद ना रखना 
निज हौसलों पर तू उड़ना
अपनी राह तुम स्वयं बनाना
अपने आप को पाना हो जो
बनी राह पर ना तू चलना 
कितनी भी कठिनाई हो 
बस तू हरदम आगे बढ़ना
तेरी राहें स्वयं बनेगी 
दरिया ,बाधा सब निपटेंगी
तूं अपना नूर जगाये रखना 
रोक ना पाये कोई तुझ को
यह निश्चय बस ठान के चलना
उड़ान जान ले......
कुसुम कोठारी 
(चित्र सौजन्य गूगल)
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Wednesday, April 4, 2018

उड़ान...........सुरिन्द्र कौर

मैं तो सोई थी ज़मीन पर,मुझे फलक ने आ जगाया,
सुनहरी पंख दे कर, इक ख़्वाब सा दिखाया।

उठ चल तू संग मेरे, जन्नत तुझे दिखाऊँ,
होती है कैसी खुशियाँ, आ में तुझे दिखाऊँ।

पंखों ने फिर मेरे, लम्बी एक भरी उड़ान,
छूने सपनों का आकाश, लेकर दिल में सो अरमान।

उड़ने को फिर ज्यों ही, मैंने अपने पंख पसारे,
भूल गई पल भर में, मैं अपने सुख-दुख सारे।

बंद आँखों से अपनी, फिर जब में मुस्कुराई,
चारों दिशाएँ मेरी, मुट्ठी में भर आईं।

परियों ने मेरे संग गुनगुनाया, 
चाँद- तारों ने मुझको गले से लगाया,
बादलों ने मेरे लिए मीठी लोरी गाई,
खुशियों की थी मानो बरसात हो आई।

हवाओं के बीच आशियाँ था मेरा, 
परियों के संग दोस्ताना था मेरा, 
पलभर में में आई स्वर्ग घूम कर,
ख़्वाबों की दुनिया में मस्ती में झूम कर।

बेगानी उस दुनिया में हर कोई लगा अपना,
फिर खट से अचानक टूटा वो मेरा सपना, 
कुछ पल कि थी वो जन्नत खुशियों का था बसेरा, 
ख़्वाब मेरा टूटा और मुझे याद आया ...
इस पापी दुनिया में ठिकाना था मेरा। 

मैं सोई थी ज़मीं पर  मैं जागी थी ज़मीं पर।
-सुरिन्द्र कौर

Tuesday, April 3, 2018

ऊँचा पहुँचोगे तुम.....मंजूषा "मन"

पंख फैलाओ अगर पास आसमान रहे।
ऊँचा पहुँचोगे तुम साथ गर उड़ान रहे।

मखौल मेरा बनाओ तो बना लो लेकिन,
तीर मुझपर चलाओ तो चला लो लेकिन।
कुछ तो ऐसा करो पास में ईमान रहे॥

हर एक पल उसे बस बात इक सताती है,
चैन की नींद भी तो एक पल न आती है।
घर में जब उसके बेटी कोई जवान रहे॥

अब जो गुज़रे तो फिर न लौट पायेंगे हम,
हमें यक़ीं है उस वक़्त याद आएँगे हम।
उम्र के दौर में जब आपके ढलान रहे॥

एक औरत सँवार देती है दुनिया सारी,
ज़िन्दगी लगने लगे जैसे बगिया प्यारी।
घर वो हो जाये जो पास इक मकान रहे॥

पंख फैलाओ अगर पास आसमान रहे।
ऊँचा पहुँचोगे तुम साथ गर उड़ान रहे॥
-मंजूषा "मन"

Monday, April 2, 2018

उड़ान.....वीणा पांडे

मैंने पूजा की
अचर्ना की, और 
भगवान प्रसन्न हुए।
बोले, 
वत्सला, कुछ माँगो।
अविलम्ब, मैंने माँग लिया
मुझे पंख चाहिए
भगवान तथास्तु बोल कर
तत्काल अन्तर्धान हो गए

मैने ख़ुशी से सब को
बातें अपनी बतलायी
सबने मुझे मूर्ख समझा
और मेरी खिल्ली उड़ायी।
नासमझ!
मुझे ही बुला लिया होता!
धन-वैभव का समान माँग लिया होता!
सब की सुन रही थी
और मन ही मन
इन प्रश्नों का जाल बुन रही थी।

कब करेगा ये समाज
मेरे आन्तरिक गुणों का मूल्यांकन?
नारी हूँ मैं।
आकाश दिख रहा है 
विस्तार देख लेंगें
अब पंख मिल गये हैं
उड़ान भर लेंगें !!!!!!!!

वीणा पांडे, जमशेदपुर
स्नातक (साहित्य अलंकार)
binu1247@gmail.com