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Wednesday, March 27, 2019

अश्रु और मैं.....सपना पारीक 'स्वप्न'

मैं और अश्रु
इसके अलावा
ना था कोई और
हम दोनों थे
एकांत था
बहुत खुश थे
स्पर्श का अहसास था
गुफ्तगू की हमने
कहा हमने उनसे
क्यों चले आते हो हरदम
क्या करूं ?
तुम्हें महसूस करते हैं
लगता है जब तुम अकेले हो
हम दौड़े चले आते हैं
हमें तुम्हारी आदत-सी हो गई
हमारे आने के बाद
हल्केपन का अहसास होता है
दिल का भार अश्रु संग बहाते हैं
इसलिए हम चले आते हैं।
अश्रुओं की व्यथा...
है ना स्वप्न...!
- सपना पारीक 'स्वप्न'

Monday, January 2, 2017

लगाया दांव पर दिल को.........ठाकुर दास' सिद्ध'




लगाया दांव पर दिल को जुआरी है,
मगर हारा कि दिल क्या, जान हारी है।

पयामे-यार आना था नहीं आया,
कहें किससे कि कितनी बेकरारी है। 

झुकाकर सर खड़े होना जरूरी सा,
जहां सरकार की निकली सवारी है।

कभी इक पल नजर थी जाम पर डाली,
अभी तक, मुद्दतें गुजरीं, खुमारी है।  

तलाशें क्यों कहीं अब दूसरा दुश्मन,
हमारी जब हमीं से जंग जारी है।

कही इक नासमझ ने आज ये सबसे,
समझ में आ गई अब बात सारी है।  

मुखातिब है जमाने की हंसी से यूं,
कभी सहमी नहीं ईमानदारी है।

मेरी मौजूदगी में चुप खड़े थे सब,
चला आया कि फिर चर्चा हमारी है।  

लगे कैसे नहीं तीखी जमाने को,
अजी ये' सिद्ध' की नगमा निगारी है।  

- ठाकुर दास' सिद्ध'  

Sunday, January 1, 2017

कली का मसलना देखा..........शकुंतला सरुपरिया


रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा 
खि‍लने से पहले, कली का वो मसलना देखा

एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी 
सिर्फ गुनाह कि नहीं बेटा, वो थी इक बेटी
सोचे बाबुल कि जमाने में होगी हेटी   
बेटी आएगी पराए धन की एक पेटी   

सुबह-सांझ बाबा का बेटा-बेटा रटना देखा 
तन्हा मां के तब कलेजे का यूं फटना देखा   

दादी चाहे कि एक पोते की ही दादी वो बने 
दादा चाहे कि मेरे वंश में, बेटी न जने 
मां की मजबूरी, कि बिनती वो उल्टी ही गिने 
जां बचाने को कायरता में, हाथ खून ने सने   

खुद की लाचारी में एक मां का कलपना देखा 
आंखों से अश्क नहीं खून का टपकना देखा   

बेईमानी से उसे कोख में पहचाना गया 
फिर किसी जख़्म की मानिंद कुरेदा भी गया 
अनगढ़े हाथों को, पैरों को कुचल काटा गया 
नैनों को, होंठो को, गालों को नोंचा भी गया   

कितना आसान है, बेटी का यूं मरना देखा 
कोख में कत्ल हुई, बेटी का तड़पना देखा   

क्या मिला तुमको, बताओ ऐ जमाने वालों 
बेटे को बेटी से बेहतर बताने वालों 
किसी की मजबूर-सी मां को यूं दबाने वालों 
लम्हा-लम्हा किसी के प्राण मिटाने वालों   

किसी सीता का फिर अग्नि से, गुज़रना देखा 
द्रौपदी-सा किसी का दांव पे लगना देखा 
सबने खुदगर्जी में बस मतलब देखा 
कैसे बर्बाद, वतन होगा ये अपना देखा   

-शकुंतला सरुपरिया 


Friday, July 22, 2016

ऐ चांद !............फि‍रदौस खान













ऐ चांद !
मेरे महबूब से फकत इतना कहना...
अब नहीं उठते हाथ
दुआ के लिए
तुम्हें पाने की खातिर...

हमने
दिल की वीरानियों में
दफन कर दिया
उन सभी जज्बात को
जो मचलते थे
तुम्हें पाने के लिए...

तुम्हें बेपनाह चाहने की
अपनी हर ख्वाहिश को
फना कर डाला...

अब नहीं देखती
सहर के सूरज को
जो तुम्हारा ही अक्स लगता था...

अब नहीं बरसतीं
मेरी आंखें
फुरकत में तुम्हारी
क्योंकि
दर्द की आग ने
अश्कों के समंदर को
सहरा बना दिया...

अब कोई मंजि‍ल है
न कोई राह
और
न ही कोई हसरत रही
जीने की
लेकिन
तुमसे कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं...

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फकत इतना कहना...

-फि‍रदौस खान

Sunday, November 22, 2015

हम तुम एक नया जहां बना लें.......पुष्पा परजिया


चलो न मितरा कुछ सपने सजा लें, 
हम तुम एक नया जहां बना लें। 
आ जाओ न मितवा कभी डगर हमारी,  
तुमसे बतियाकर अपना मन बहला लें।

भर ले सांसो में महक खुशियों की, 
कुछ नाचे कुछ गाएं कुछ झूमें और खुशियां मना लें।  
मन की उमंगें संजोएं और एक अलख जगा लें।।

मिटा धरती से दुख-दर्द की पीड़ा,  
हर किसी के दामन को खुशियों से सजा लें।    
चलो न मितरा सोए को जगा लें,   
चलो न मितरा भूखों को खिला दें ।।

खा लें कसम कुछ ऐसी कि, 
हर आंख से दुख के आंसू मिटा दें। 
कर लें मन अपना सागर-सा 
जग की खाराश (क्षार) को खुद में समा लें।।

बुलंदियां हों हिमालय के जैसी हमारी,  
पर मानव के मन से रेगिस्तान को हटा दें। 
खुशियों के बीज बोकर इस,
नए वर्ष को और नया बना दें ।।

-पुष्पा परजिया 

Saturday, November 14, 2015

फिर से बचपन दे दे जरा.............. पुष्पा परजिया


निशब्द, निशांत, नीरव, अंधकार की निशा में
कुछ शब्द बनकर मन में आ जाए,
जब हृदय की इस सृष्टि पर 
एक विहंगम दृष्टि कर जाए 







भीगी पलकें लिए नैनों में रैना निकल जाए 
विचार-पुष्प पल्लवित हो 
मन को मगन कर जाए 

दूर गगन छाई तारों की लड़ी 
जो रह-रह कर मन को ललचाए
ललक उठे है एक मन में मेरे 
बचपन का भोलापन 
फिर से मिल जाए

मीठे सपने, मीठी बातें, 
था मीठा जीवन तबका 
क्लेश-कलुष, बर्बरता का 
न था कोई स्थान वहां 

थे निर्मल, निर्लि‍प्त द्वंदों से, 
छल का नामो निशां न था 
निस्तब्ध निशा कह रही मानो मुझसे ,
तू शांति के दीप जला, इंसा जूझ रहा 

जीवन से हर पल उसको 
तू ढांढस  बंधवा निर्मल कर्मी बनकर
इंसा के जीवन को 
फिर से बचपन दे दे जरा 

-पुष्पा परजिया 

Wednesday, July 22, 2015

नहीं जानती क्यों................फाल्गुनी











नहीं जानती क्यों
अचानक सरसराती धूल के साथ
हमारे बीच
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से
बस नम खड़े रह जाते हैं

नहीं जानती क्यों
अचानक बह आता है
हमारे बीच
दुखों का खारा पारदर्शी पानी
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते
पास-पास होकर
भीग नहीं पाते...

नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

--फाल्गुनी

Wednesday, July 1, 2015

नहीं जानती क्यों.....फाल्गुनी





नहीं जानती क्यों
अचानक सरसराती धूल के साथ
हमारे बीच
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से
बस नम खड़े रह जाते हैं

नहीं जानती क्यों
अचानक बह आता है
हमारे बीच
दुखों का खारा पारदर्शी पानी
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते
पास-पास होकर
भीग नहीं पाते...

नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

--फाल्गुनी

Saturday, June 27, 2015

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है...............अज्ञेय



जियो उस प्यार में
जो मैंने तुम्हें दिया है,
उस दु:ख में नहीं जिसे
बेझिझक मैंने पिया है।


उस गान में जियो
जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नहीं‍ जिसे
मैंने तुमसे छिपाया है।


उस द्वार से गुजरो
जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है,
उस अंधकार से नहीं
जिसकी गहराई को
बार-बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूं, बुनूंगा;
वे कांटे-गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूं, चुनूंगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूं, बनाता रहूंगा;

मैं जो रोड़ा हूं, उसे हथौड़े से तोड़-तोड़
मैं जो कारीगर हूं, करीने से
संवारता-सजाता हूं, सजाता रहूंगा।

सागर किनारे तक
तुम्हें पहुंचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो;

फिर वहां जो लहर हो, तारा हो,
सोन-परी हो, अरुण सवेरा हो,

वह सब, ओ मेरे वर्ग!
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

-अज्ञेय






Thursday, June 25, 2015

पहली बारिश, पहला प्यार............ज्योति जैन



आज बारिश,
लगती है नई।
नए अर्थ समझती है।

पहली बारिश पर,
मिटटी की सौंधी महक,
जैसे
प्रथम प्रेम से परिचय।

फि‍र बरसे
तो प्रेम-सी ही
शीतलता
कभी तेज बौछार
चुभती तन को,
मानो प्रेम की हो
आक्रामकता

और जब बदली
बरस जाए-
तो व्‍योम उतना ही
स्‍वच्‍छ और निर्मल,
जितना कि प्रेम।

स्‍पर्श बिना मन को
भिगोने का अहसास
देती है पहली बारिश।

-ज्योति जैन

Tuesday, November 18, 2014

भाषा..............सुधीर कुमार सोनी




 








मजबूरी
भाषा बदल देती है
अभिमान
बहुत सी परिभाषा बदल देते हैं.... 


-सुधीर कुमार सोनी

Saturday, September 20, 2014

पेड़............. सुधीर कुमार सोनी





 











मैंने
कागज पर लकीरें खिचीं
डाल बनाई
पत्ते बनाए
अब कागज पर
चित्र लिखित सा पेड़ खड़ा है

पेड़ ने कहा
यह मैं हूं
मुझ पर काले अक्षरों की दुनिया रचकर
किसे बदलना चाहते हो

मैंने
रंगों से कपड़ों में
कुछ लकीरें खींचीं
डाल बनाई
पत्ते बनाए
अब
कपड़े पर छपा पेड़ है
पेड़ ने कहा
यह मैं हूं
मुझे नंगा कर
किसे ढंकना चाहते हो

यह जो तुम हो
पेड़ ने कहा
यह भी मैं हूं
सांसों पर रोक लगाकर
किसे जीवित रखना चाहते हो। 


-सुधीर कुमार सोनी

प्राप्ति स्रोतः काव्य संसार, वेब दुनिया

Friday, September 19, 2014

सपने भी टूटे तो क्या...............शाश्वत




  स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या,
अभी शेष समंदर मन में,
आंसू भी सूखे तो क्या।

पत्ता-पत्ता डाली-डाली,
बरगद भी सूखा तो क्या,
जड़े शेष जमीं में बाकी,
गुलशन भी सूखा तो क्या,

स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या,

अपने रूठे, सपने झूठे,
जग भी छूट गया तो क्या,
जन्मों का ये संग है अपना,
छूट गया इक जिस्म तो क्या

स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या।

-शाश्वत

Thursday, September 18, 2014

नाम से जिसके मेरी पहचान होगी..........आलोक श्रीवास्तव




  ले गया दिल में दबाकर राज़ कोई,
पानियों पर लिख गया आवाज़ कोई.

बांधकर मेरे परों में मुश्किलों को,
हौसलों को दे गया परवाज़ कोई.

नाम से जिसके मेरी पहचान होगी,
मुझमें उस जैसा भी हो अंदाज़ कोई.

जिसका तारा था वो आंखें सो गई हैं,
अब कहां करता है मुझपे नाज़ कोई.

 रोज़ उसको ख़ुद के अंदर खोजना है,
रोज़ आना दिल से इक आवाज़ कोई.

-आलोक श्रीवास्तव 
प्राप्ति स्रोत : वेब दुनिया

Thursday, August 14, 2014

कैसे जिंदगी की बात करें............सुनीता घिल्डियाल





 













गुमनाम आवाज़ों के लश्कर में
खोई-खोई बहार है,
रुठा-रुठा मौसम है
कैसा उदास मंज़र है
इसमें
तुम और मैं
दीवानों की मानिंद मिलकर
कैसे जिंदगी की बात करें


शहरों की बौखलाई सड़कों पे
रफ़्तार में बंधा मौसम
धूल और आवाज़ों का समंदर
कितनी ऊब है यहां,
इसमें,
तुम और मैं
दीवानों की मानिंद मिलकर
कैसे जिंदगी की बात करें।

सवेरे की सोचते हैं रह-रह के
उदासियों के स्याह अंधेरे
कड़कती बिजलियों का साया
कोई हमसाया तो हो नहीं सकता,
ऐसे में
तुम और मैं
दीवानों की मानिंद मिलकर
कैसे जिंदगी की बात करें...


-सुनीता घिल्डियाल (देहरादून)

Saturday, August 9, 2014

बरसात की बूंदें.......अक्षय नेमा मेख








 







बरसात की बूंदें
बादलों से धरती के
बीच की दूरी को
मापती हुई बूंदें,
हरियाली की प्रचुरता
देती है धरती को।

एक-एक बूंद
गुब्बारे को जन्म देती है,
वो पानी का गुब्बारा
जिसकी क्षण भर भी
जिंदगी नहीं रहती,
जिसका अस्तित्व जन्म के
साथ नष्ट होता है।

न बातें होती हैं
न यादें शेष रहती हैं
वो गुब्बारा फिर भी
काम कर जाता है,
बारिश में अपना
नाम कर जाता है।

उसे जिंदगी की चिंता
ही कहां रहती है
अनंत से उत्पन्न
क्षणिक जीकर
अनंत में फिर खो जाता है।

जिन्दा रह जाती है
यादों में बस जाती हैं
तो बस बरसात की बूंदें।


- अक्षय नेमा मेख

Friday, July 25, 2014

औरतें...............श्रीमती रश्मि रमानी



 











हां
स्त्री ही है वह
सूर्यमुखी की तरह
जिसके सूर्य को निहारने भर से
झरता है भीतर के अंधेरों में
पीला प्रकाश।

जिस खुशमिजाज अजनबी के साथ
बड़ी आसानी से तय कर लिया जाता है
वीरानों का उदास सफर
यकीनन
हो सकती है वो कोई औरत ही
आसमान की तरह साधारण
हवी-सी मुक्त
और पानी जैसी पारदर्शी
संसार में कोई है
तो बेशक
वह स्त्री ही है।

दुनिया जहान के जंगल में
राह भूले मुसाफिर को मिल जाती है
किसी पगडंडी की तरह
और, आसानी से पहुंचा देती है सही मुकाम पर
कोई और नहीं वो औरत ही होती है


जिंदगी के सफर को आसान बनातीं
वे हथेलियां औरतों की ही होती हैं


जिन पर चलते नहीं थकते मर्दों के पांव
बहुत ज्यादा न सही
पर उनकी मौजूदगी
बचा सके मर्द के वजूद को झुलसने से
इतनी तो दे ही देती है छांव।



- श्रीमती रश्मि रमानी


स्रोतः वेब दुनिया

Friday, June 20, 2014

फिर मैंने सब कुछ हारा...............फाल्गुनी
















तुमने रखा मेरी गुलाबी हथेली पर
एक जलता हुआ शब्द-अंगारा
और कहा कि चीखना मत
बस यही सच है रिश्ता हमारा।

तुमने चाहा कि तुम्हारे शब्द की
जलती हुई चटकन को भूल
तुम्हें एक मुस्कान का शीतल छींटा दूँ
पर कैसे करती मैं वह,
जब हथेली में दर्द के हरे छाले
निकल आए।
और मेरे सुलगते सवालों के
तुम्हारे तीखे जवाब चलकर आए।

रिश्तों की दहलीज पर आज
फिर मैंने सब कुछ हारा,
बस, एक शब्द तुम्हारा
और खेल खत्म हुआ सारा। 


-फाल्गुनी

Wednesday, June 11, 2014

मन कहीं खोना चाहता है............फाल्गुनी














  

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,



महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,

बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,


और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,

मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,


मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना। 


-फाल्गुनी

Thursday, June 5, 2014

पर्यावरण का पाठ............लालबहादुर श्रीवास्तव

पांच जून पर्यावरण दिवस पर विशेष
 

आओ आंगन-आंगन अपने

चम्पा-जूही-गुलाब-पलास लगाएं

सौंधी-सौंधी खूशबू से अपना

चमन चंदन-सा चमकाएं

हरियाली फैलाकर

ऑक्सीजन बढ़ाएं

फैले प्रदूषित वातावरण को मिटाएं

आओ, हम सब नन्हे-मुन्नो

घर-घर अलख जगाएं

पर्यावरण का पाठ

जगभर को पढ़ाएं।

- लालबहादुर श्रीवास्तव 

स्रोतः वेब दुनिया