दौड़ में अंधी दौड़ पड़े हो,
दूर देश में जा बसने,
पर कितने दिन रह पाओगे,
उखड़ के जड़ से तुम अपने,
कब तक ऊंचे उड़ोगे आख़िर,
कभी तो तुम थक जाओगे ,
तब ढूँढोगे एक छाँव पर,
कहीं न ढूंढे पाओगे,
देखा है चिड़िया को उड़ते,
लौट के वो घर आती है,
जब तक बंधी पतंग डोर से,
तभी तलक उड़ पाती है,
है अभी समय मुड़ कर देखो,
घर राह तुम्हारी तकता है,
हवा अभी भी है अपनी,
बंद किया तुम्हीं ने रस्ता है,
खोलो खिड़की पिछवाड़े की हवा
उधर से भी आने दो,
थाम के रखो नेह डोर,
पहचान न पथ की खो जाने दो।
-अलका प्रमोद
