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Friday, March 22, 2019

मुझे पुकार लो...हरिवंशराय बच्चन

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो!

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की बसंत के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अंंगार से लगा चुका उमीद मै तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!
- हरिवंशराय बच्चन


Wednesday, October 24, 2018

ना दिवाली होती न पठाखे छूटते....हरिवंश राय बच्चन


अमृतसर में रावण पुतला दहन के दौरान हुए 
रेल दुर्घटना में सैकड़ों लोगों के मारे जाने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी यह कविता 
आज के दौर में प्रासंगिक लगी। आप सभी के 
लिए पेश है :......
ना दिवाली होती और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

....काश कोई धर्म ना होता....
....काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्ध देते, ना स्नान होता

ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती, नदियों का पानी पीते

पेड़ों की छाव होती, नदियों का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों का नाटक होता

ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का फाटक होता
ना कोई झुठा काजी होता, ना लफंगा साधु होता

ईन्सानीयत के दरबार मे, सबका भला होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

....काश कोई धर्म ना होता.....
....काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता

कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता

किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता
ना ही गीता होती, और ना कुरान होती,

ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.

ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
हरिवंशराय बच्चन

Thursday, March 15, 2018

प्रलय का सब समां बांधे....डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन जी



अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है? 

गगन में गर्व से उठउठ, गगन में गर्व से घिरघिर,
गरज कहती घटाएँ हैं, नहीं होगा उजाला फिर,
मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

प्रलय का सब समां बांधे, प्रलय की रात है छाई,
विनाशक शक्तियों की इस, तिमिर के बीच बन आई,
मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

प्रभंजन, मेघ दामिनी ने, न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच, कुछ साबित नहीं छोड़ा,
मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है 
-डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन जी
सौजन्यः सखी कुसुम कोठारी