Showing posts with label जॉन एलिया. Show all posts
Showing posts with label जॉन एलिया. Show all posts

Friday, September 20, 2019

अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ ...जॉन एलिया

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम

खमोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम

ये काफी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम

वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत 
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम 

हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम 
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम 

किया था अहद जब लम्हों में हम ने 
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम 

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी 
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम 

ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती 
यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँ करें हम 
-जॉन एलिया

Wednesday, January 9, 2019

उसी लम्हे को तड़पना भी था ...जॉन एलिया

दिल जो दीवाना नहीं आखिर को दीवाना भी था 
भूलने पर उस को जब आया तो पहचाना भी था 

जानिया किस शौक में रिश्ते बिछड़ कर रह गए 
काम तो कोई नहीं था पर हमें जाना भी था 

अजनबी-सा एक मौसम एक बेमौसम-सी शाम 
जब उसे आना नहीं था जब उसे आना भी था 

जानिए क्यूँ दिल कि वहशत दरमियां में आ गयी 
बस यूँ ही हम को बहकना भी था बहकाना भी था 

इक महकता-सा वो लम्हा था कि जैसे इक ख्याल 
इक ज़माने तक उसी लम्हे को तड़पना भी था 

- जॉन एलिया