Showing posts with label तरंग से. Show all posts
Showing posts with label तरंग से. Show all posts

Tuesday, January 31, 2017

छुपाता सर मैं कहां तुझ से....कृष्ण बिहारी नूर



नज़र न मिला सके उनसे उस निगाह के बाद
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता खुद को
किसी का चाह न थी दिल में तेरी चाह के बाद

ज़मीर कांप जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले, के हो गुनाह के बाद

कटी हुई थी तनाबे तमाम रिश्तों की
छुपाता सर मैं कहां तुझ से रस्म-ओ-राह के बाद

गवाह चाह रहे थे वो बेगुनाही का
ज़ुबां से कह न सका कुछ ख़ुदा-गवाह के बाद

खतूत कर दिए वापस मेरी नींदें
इन्हें भी छोड़ दो इक रहम के निगाह के बाद

-कृष्ण बिहारी नूर

Monday, January 23, 2017

लिखता नहीं तो.... राकेश रोहित
















लिखता नहीं तो मर जाता
आत्मा के अंधेरे में
उन्हीं शब्दों की रोशनी है

जो मैं तुम्हें यादकर
निर्जन में गाता !

कहता नहीं तो ढह जाता
जैसे ढह जाता है कोने का वीराल घर
जहां एकांत में बहे आंसुओं की सीलन है
और है किसी पुराने पन्ने में लिखा तुम्हारा नाम !

कही गई बात है फिर भी कहता हूँ
जैसे खिलता है खिला हुआ फूल
जैसे पुकारता हूँ तुमको सदियों पुराने नाम से
तो प्रथम स्पर्श से सिहरती है
धरती की सारी सुन्दरताएँ !

लिखता नहीं तो मैं मर जाता
कहते हुए मैं रोता हूँ  विकल, विह्वल
मैं जिस ईश्वर को याद करता हूँ
क्या वह तुम्हारी स्मृति से रचा गया है !

-राकेश रोहित

Thursday, July 2, 2015

भरथरी गायक.............केशव तिवारी
















जाने कहां-कहां से
भटकते-भटकते
आ जाते हैं ये भरथरी गायक

कांधे पर अघारी
हाथ में चिकारा थामे
हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये
देर तक नहीं टिकते

पर जितनी देर भी रुकते हैं
झांक जाते हैं
आत्मा की गहराइयों तक

घुमन्तु-फिरन्तु ये 
जब टेरते हैं चिकारे पर
रानी पिंगला का दुःख
सब काम छोड़
दीवारों की ओट से 
चिपक जाती हैं स्त्रियां

यह वही समय होता है
जब आप सुन सकते हैं
समूची सृष्टि का विलाप

-केशव तिवारी
....तरंग से,15 मार्च