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Saturday, March 9, 2019

कौन साज़िश रच रहा है ....राज़िक़ अंसारी

मेरा किरदार कब से जंच रहा है 
मगर जो सच है वो तो सच रहा है

इज़ाफ़ा हो रहा है नफ़रतों में 
न जाने कौन साज़िश रच रहा है 

सफ़ेदी आ गयी बालों में लेकिन 
उसे कहना वो अब भी जच रहा है 

तुम्हारे हाथ की लाली तो देखो 
हमारा ख़ून कितना रच रहा है 

ग़रीबी छूत का है रोग शायद 
मेरा हर दोस्त मुझ से बच रहा है 

चलो चल कर परिंदों की ख़बर लें 
हवा में शोर कब से मच रहा है 

न होगा हज़्म तो फिर क्या करोगे 
अभी तो झूठ सब को पच रहा है 
- राज़िक़ अंसारी 


Wednesday, January 9, 2019

उसी लम्हे को तड़पना भी था ...जॉन एलिया

दिल जो दीवाना नहीं आखिर को दीवाना भी था 
भूलने पर उस को जब आया तो पहचाना भी था 

जानिया किस शौक में रिश्ते बिछड़ कर रह गए 
काम तो कोई नहीं था पर हमें जाना भी था 

अजनबी-सा एक मौसम एक बेमौसम-सी शाम 
जब उसे आना नहीं था जब उसे आना भी था 

जानिए क्यूँ दिल कि वहशत दरमियां में आ गयी 
बस यूँ ही हम को बहकना भी था बहकाना भी था 

इक महकता-सा वो लम्हा था कि जैसे इक ख्याल 
इक ज़माने तक उसी लम्हे को तड़पना भी था 

- जॉन एलिया