कल हारे, संमुदर किनारे,
सुरमई शाम में,
झंझोड़ उलझे आस्तित्व को,
बिखरा दीं मैनें अपनी जुल्फें,
बिछा दिये आतुर नैन,
मांगी, तेरे लिये इक दुआ,
फिर देर तक सन्नाटे में,
कुछ भी न था,
कहने को, करने को, सोचने को,
भीगी रेत पर, झुंझला के, ऐसे में,
जैसे लिखा था तूनें......
मैनें अपना नाम लिखा.......
-जै बांवरा
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