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Wednesday, September 30, 2020

अकेले खड़े हो ..सुजाता प्रिय

अकेले खड़े हो मुझे तुम बुला लो।

मायुस क्यों हो ,जरा मुस्कुरा लो।


रात है काली और अँधेरा घना है,

तम दूर होगा तू दीपक जला लो।


भरोसा न तोड़ो, मंजिल  मिलेगी,

जो मन में बुने हो सपने सजा लो।


देखो तो कितनी है रंगीन दुनियाँ,

इन रंगों को आ मन में बसा लो।


रूठा न करना कभी भी किसी से,

रूठे हुए को जरा तुम मना लो।


पराये को अपना बनाना  कला है,

अपनों को अपने दिल में बसालो।


बुराई किसी की तुम,मन में लाओ,

अच्छाईयों को भी अपना बना लो।


प्यार सिखाता जो,वह गीत गाओ,

झंकार करता , गजल गुनगुनाओ।

-सुजाता प्रिय 

Wednesday, December 25, 2019

अलाव के निकट......सुजाता प्रिय

निकट बगीचे से मंगली चाची,
सुखी लकड़ियाँ बीनकर
लायी।शाम ढली तो
वह घर के आगे,
उसे जोड़कर
अलाव
जलायी।
अलाव देखकर लक्ष्मी दादी,
लाठी टेक लपकती आई।
पारो काकी भी जब
देखी,झट से
आई फेक
रजाई।
चौका-पानी कर गौरी बूआ,
हाथ-पाँव फैला गरमाई।
टोले के बच्चों को
उसने,'पूस की
रात' कथा
सुनाई।
नेहा ,बबली ,चुन्नी , रानी,
गुड़िया लेकर दौड़ीआई।
पप्पु ,मुन्ना राजू चुन्नु ने,
चटपटे चुटकुले
खूब
सुनाई।
कल्लू चाचा बीरन दादा ने,
गाये रामायण की चौपाई।
बूआ, दादी, चाची
मिलकर,भजन
करी बड़ी
सुखदाई।
अलाव की यह सोंधी खुशबू,
हर पीढी के मन में भाई ।
ठिठुरन दूर किया
हम सबका,सर्दी
ने जब हमें
सताई।
एकता का प्रतीक अलाव,
एक सूत्र में सबको
बंधबाई।अलाव
ने सबको गर्मी
देकर,जग
हितकारी
संदेश
सिखाई !!