
वो गाँव का पगडंडी,
वो पक्षियों का कलरव,
वो चहलकर करते घर के आँगन में नन्हें-से मेमने...
खुले आसमान में सितारों के बीच,
तन्हा चाँद आज भी उदास-सा है
जब से मैंनें द्खा है उसै गाँव में,
घर के चबूतरे पर खड़े होकर....
गाँव का सोंधी खुशबू का अहसास,
पता नहीं, कहां.. खो-सा गया है?
सब कुछ पीछे छूट सा गया है आज...
गाँव का अहसास दम तोड़ने लगा है अब,
गाँव की पक्की सड़कें...पक्के मकान,
मोबाईल के गगनचुम्बी टॉवर,
मोटरसाइकिलों के धओं से अब,
गांव का पहचान ही बदल-सी गई है आज....।
-डॉ. सुरेन्द्र मीणा (मधुमिता से)