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Tuesday, December 19, 2017

गया कैसे...??.....'तरुणा'

मुझको वो छोड़कर गया कैसे...
वो तो था हमसफ़र गया कैसे ;

दिल पे क़ाबिज़ रहा जो बरसों से....
आज दिल से उतर गया कैसे ;

मैंने जो उम्र भर समेटा था...
वो उजाला बिख़र गया कैसे ;

वो जो इक पल जुदा न रहता था..
वो गया तो मगर गया कैसे ;

ख्व़ाब में भी न था गुमां जिस पर…
दुश्मनों के वो घर गया कैसे ;

कोई ख़ूबी नज़र तो आई है...
वरना मुझ पर वो मर गया कैसे ;

सिर्फ़ उस पर ही तो ये ज़ाहिर था...
राज़ आख़िर बिखर गया कैसे ;

राब्ता गर नहीं था 'तरुणा' से....
मुझको छू कर गुज़र गया कैसे ..!!
-'तरुणा'...!!!

Thursday, November 23, 2017

ये दिलासा...तरुणा मिश्रा

मुझे आज इतना दिलासा बहुत है..
कि उसने कभी मुझको चाहा बहुत है ;

उसी की कहानी उसी की हैं नज़्में...
उसी को ग़ज़ल में उतारा बहुत है ;

बड़ी सादगी से किया नाम मेरे...
तभी दिल मुझे उसका प्यारा बहुत है ;

उठाओ न ख़ंजर मेरे क़त्ल को तुम...
मुझे तो नज़र का इशारा बहुत है ;

किसी और से कोई पहचान क्या हो...
सितमगर वही एक भाया बहुत है ;

सिवा उसके कोई नहीं आज मेरा....
वही दर वही इक ठिकाना बहुत है ;

गले तो मिले दिल मिलाते नहीं हैं...
ज़माने में यारों दिखावा बहुत है ;

निग़ाहें मिलाते अगर सिर्फ़ हम से...
यक़ीनन ये कहते भरोसा बहुत है ;

ज़माने का आख़िर भरोसा ही क्या है....
फ़क़त इक तुम्हारा सहारा बहुत है ;

लुटाए हुए आज बैठी हूँ ख़ुद को ..
मुहब्बत करो तो ख़सारा बहुत है ;

तुम्हें पा लिया है ज़माना गंवा कर..
मेरे वास्ते ये असासा बहुत है ;

कड़ी धूप का है ज़माना ये ‘तरुणा’...
मुझे उसकी पलकों का साया बहुत है...!!

Wednesday, November 22, 2017

एक ख़त ...!!!....तरुणा मिश्रा

ख़त तुमको दिलदार लिखूँगी..
पायल कंगन हार लिखूँगी ;

मैं कश्ती हूँ जीवन तूफां...
पर तुमको पतवार लिखूँगी ;

जो है उल्फ़त नए चलन की...
उसको कारोबार लिखूँगी ;

सीने से एक बार लगा लो...
तुमको अपना प्यार लिखूँगी ;

जब भी मयस्सर होगी फ़ुर्सत...
मिलना नदिया पार लिखूँगी ;

तुम हो मेरे , हाँ मेरे हो...
एक नहीं सौ बार लिखूँगी ;

तुम ही नहीं तो मैं काजल को...
इन पलकों पर भार लिखूँगी ;

तुम बिन जो बीतेगा 'तरुणा'...
उस पल को आज़ार लिखूँगी..!!
(आज़ार- दुःख )


Friday, November 10, 2017

प्यार का मौसम...!!!.....तरुणा मिश्रा ‘सदफ़’

प्यार का जब कोई भी मौसम नहीं..
मैं अगर बिखरी हूँ इसका ग़म नहीं ;

मेरी होकर भी सितम करती है ये..
कैसे कह दूँ ज़िंदगी बरहम नहीं ;

ज़िन्दगी के ज़ख्म जो भर देगा अब...
चारागर के पास वो मरहम नहीं ;

हर तरफ़ इक नूर की चादर बिछी...
ज़िंदगी सौगात तेरी कम नहीं ;

वो सुला कर जा चुका दिल का रबाब...
अब फिजां में प्यार की सरगम नहीं ;

रात भर रोती रही थी कहकशां ..
क्या वही आँसू तो ये शबनम नहीं..?

हर क़दम पर साथ ग़म के है ख़ुशी..
सूत है ये ज़िंदगी रेशम नहीं ;

देर से जीते मगर जीतेगा सच..
झूठ का ऊँचा कभी परचम नहीं ;

ज़िंदगी तू हार बैठी मुझसे क्यूँ...
आज़माने को बचा क्या दम नहीं ;

इस ग़ज़ल में ख़ूबियाँ भी हैं ‘सदफ़’...
गौर से देखो तो कमियाँ कम नहीं… !!

Wednesday, November 8, 2017

फ़ायदा क्या है.....तरुणा मिश्रा

ये बता मुझसे  चाहता क्या है...
तेरे लहज़े का फ़लसफ़ा क्या है ;

तुझको आख़िर बता हुआ क्या है..
सोचता है तो सोचता क्या है ;

दिल की बातें हैं तुम न समझोगे..
और समझ लो तो फ़ायदा क्या है ;

आ रहा है वो पास क्यूँ इतना..
जाने अब उसका फ़ैसला क्या है ;

जिसको ख़्वाहिश नहीं है मंज़िल की..
क्या पता उसको रास्ता क्या है ;

क्या ख़ता हो गई पता तो चले ..
तू ये टुक टुक के देखता क्या है ;

मिलना चाहो तो मिल भी सकते हैं..
फ़ासला है तो फ़ासला क्या है ;

जब बिछड़ने का मन बना ही लिया..
फिर तू मुड़ मुड़ के देखता क्या है ;

उसका ख़त पढ़ चुकी हूँ कितनी बार..
ख़त में उसने मगर लिखा क्या है..!!
-'तरुणा'

Thursday, October 26, 2017

अधूरे अल्फ़ाज़...........'तरुणा मिश्रा

अल्फ़ाज़ जाने कितने ... मुंह में अटक रहें हैं....
कितने ही किस्से रस्ते में ... मेरे भटक रहें हैं...  

बारिश..तूफ़ान इतने क्यूँ आए.. पता चला अब..
ज़ुल्फ़ें उन्होंने खोली... वो बादल झटक रहें हैं..

निगाहें मिली हैं जब से .. उस ज़ालिम से मेरी..
ग़ज़ले बहक रहीं हैं ...और शेर भटक रहें हैं...

चिलमन के पीछे जाके ... क्यूँ छुप गया है वो...
मुश्किल से जुदाई का .. हम गम गटक रहें हैं..

नज़रो से तेरी पहले ही ... बेहोश है ये दुनिया...
नींद आती नहीं है न ही..कोई ख्व़ाब फटक रहें हैं..

सुखन 'तरु' के अब तो .. उनको भी खटक रहें हैं..
क़ैद रखा जिसमे मुझको .. वो किलें चटक रहें है...