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Tuesday, August 16, 2016

जिज्ञासा न होगी तिरोभूत....महेश चंद्र द्विवेदी


देखा? रात्रि-तिमिर का भूत
कृशकाय, कंकाल,  कुरूप;  
चिता की अग्नि से उठा सा
अग्निबेताल, अघोर, अवधूत.

प्रश्न पर तुम बने थे निःशब्द,
वह समझा विछोह ही प्रारब्ध;
हुआ ऐसा विचलित, विक्षिप्त,
जीवन कर लिया व्यर्थ, विद्रूप.

अब उसे देख काँपते अप्रयास
बढ़ा देते हो कदम अनायास;
ज्यूँ तम मेँ सामने आ जाये
महिषवाहन मारक कालदूत.

उसका प्रश्न था मात्र त्रिशब्द
शाश्वत, दिग-काल असम्बद्ध;
गूंजेगा, जब तक अनुत्तरित
जिज्ञासा न होगी तिरोभूत.

-महेश चंद्र द्विवेदी
ज्ञान प्रसार संस्थान
1/137, विवेक खण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ