देखा? रात्रि-तिमिर का भूत
कृशकाय, कंकाल, कुरूप;
चिता की अग्नि से उठा सा
अग्निबेताल, अघोर, अवधूत.
प्रश्न पर तुम बने थे निःशब्द,
वह समझा विछोह ही प्रारब्ध;
हुआ ऐसा विचलित, विक्षिप्त,
जीवन कर लिया व्यर्थ, विद्रूप.
अब उसे देख काँपते अप्रयास
बढ़ा देते हो कदम अनायास;
ज्यूँ तम मेँ सामने आ जाये
महिषवाहन मारक कालदूत.
उसका प्रश्न था मात्र त्रिशब्द
शाश्वत, दिग-काल असम्बद्ध;
गूंजेगा, जब तक अनुत्तरित
जिज्ञासा न होगी तिरोभूत.
-महेश चंद्र द्विवेदी
ज्ञान प्रसार संस्थान
1/137, विवेक खण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ
