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Saturday, September 8, 2018

बीत गया सारा दिन ..सुरेन्द्र शेखावत


सूरज सवेरे से 
जैसे उगा ही नहीं 
बीत गया सारा दिन 
बैठे हुए यहीं कहीं 

टिपिर टिपिर टिप टिप 
आसमान चूता रहा
बादल सिसकते रहे 
जितना भी बूता रहा

सील रहे कमरे में 
भीगे हुए कपड़े 
चपके दीवारों पर 
झींगुर औ' चपड़े 

ये ही हैं साथी और 
ये ही सहभोक्ता 
मेरे हर चिन्तन के 
चिन्तित उपयोक्ता 

दोपहर जाने तक 
बादल सब छँट गये 
कहने को इतने थे 
कोने में अँट गये 

सूरज यों निकला ज्यों 
उतर आया ताक़ से 
धूप वह करारी, बोली 
खोपड़ी चटाक से 

ऐसी तच गयी जैसे 
बादल तो थे ही नहीं 
और अगर थे भी तो 
धूप को है शर्म कहीं?

भीगे या सीले हुए 
और लोग होते हैं 
सूरज की राशि वाले 
बादल को रोते हैं?

ओ मेरे निर्माता 
देते तुम मुझको भी 
हर उलझी गुत्थी का 
ऐसा ही समाधान 
या ऐसा दीदा ही
अपना सब किया कहा 
औरों पर थोपथाप
बन जाता दीप्तिवान ।
-सुरेन्द्र शेखावत