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Tuesday, October 3, 2017

प्रश्न तो है!....... अमित जैन 'मौलिक'

चरित्र और मर्यादा!
जिसने भी गढ़े होंगे ये शब्द,
बड़ा व्यापक हेतु रहा होगा।
शायद आचार का निर्धारण
और निष्ठा का पालन कहा होगा।
प्रतिपादित किये गये होंगे
सम्भवतः ‘सर्व गुण संपन्न’
मदांध-नियंताओं और 
सामंतो के लिये।
किन्तु थोप दिये गये,
पुरुषों के पैरोकारों द्वारा,
कुशलतापूर्वक स्त्रियों पर।
समर्थन मिलना ही था, मिला
और समय के साथ बन गया
यह एक अपरिहार्य संस्कार, 
नाम दे दिया गया संस्कृति का
परिप्रेक्ष्य विलुप्त है, क्यों भला ?
प्रश्न तो है, पर अनुत्तरित, 
सदा की तरह।

विषय संवेदनशील है 
और इतिहास भी, 
सिहरन उठती है
यदि पलट लें कभी 
पन्ने उन किताबों के
जिनमें भरे पड़े हैं 
किस्से अतिवाद के
उत्पीड़न के, विलासता के।
सन्धि का उपहार स्त्री
जुये में दाव स्त्री
सत्ता का विस्तार स्त्री
युद्ध का संहार स्त्री
संभवतः 
बहुमूल्य वस्तु की भांति 
प्रबंधन किया जाता होगा 
स्त्रियों का।
जैसे अन्य भौतिक मूल्यवान 
वस्तुओं का किया जाता था
स्वयं का मूल्य बढ़ाने हेतु
जिससे अहम की तुष्टि तो हो ही, 
समर्थता की भी पुष्टि हो
वस्तुतः सामर्थ्य ही तो सबलता 
को सत्यापित करता था
शायद शासन करना, 
नियंता बनना
यही अंतिम शगल है 
पुरुष जाति का, क्यों भला ?
प्रश्न तो है, पर अनुत्तरित, 
सदा की तरह।
-अमित जैन  'मौलिक'