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Wednesday, November 13, 2019

नर्म आहट खुशबुओं की ....कुमार रवीन्द्र

आज फिर
इन सीढियों पर
नर्म आहट खुशबुओं की

दबे पाँवों धूप लौटी
और कमरे में घुसी
उँगलियाँ पकड़े हवा की
चढ़ी छज्जे पर ख़ुशी

बात फिर
होने लगी है
फुसफुसाहट खुशबुओं की

एक नीली छाँव
दिन भर
खिड़कियाँ छूने लगी
आँख-मींचे देखती रितु
ढाई आखर की ठगी

तितलियाँ
दालान भर में
है बुलाहट खुशबुओं की
1940-2019

-कुमार रवीन्द्र



Tuesday, December 11, 2018

सिकुड़ गए दिन ....कुमार रवींद्र

ठंडक से
सिकुड़ गए दिन
हवा हुई शरारती - 
चुभो रही पिन

रंग सभी धूप के
हो गए धुआँ
मन के फैलाव सभी
हो गये कुआँ

कितनी हैं यात्राएँ
साँस रही गिन

सूनी पगडंडी पर
भाग रहे पाँव
क्षितिजों के पार बसे
सूरज के गाँव

आँखों में
सन्नाटों के हैं पल-छिन

बाँह में जमाव-बिंदु
पलकों में बर्फ
उँगलियाँ हैं बाँच रहीं
काँटों के हर्फ

धुंधों के खेत खड़ीं
किरणें कमसिन
-कुमार रवीन्द्र