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Thursday, September 30, 2021

चढ़ती उम्र के साथ .....नीलम गुप्ता

 

चढ़ती उम्र के साथ
बुढ़ापे की तरफ
जब राह हो जाती
अपनी औलाद ही
जब आंखे दिखाती
तब पतियों को
बदलते देखा है
पत्नियों की कदर
करते देखा है।

सारी दुनिया घूम ली जब
कोई रिश्ता सगा ना दिखा
भाई बहन सब रुठ गएं
मां, बाप के हाथ छूट गएं
तब जीवनसाथी का हाथ
सड़क पे पकड़े देखा है।

जवानी जब बीत गई
कमाने की इच्छा भी ना रही
भागने का जब दम ना बचा
घुटनों का दर्द जब बढ़ गया
तब पत्नी के घुटनों में
बाम लगातें देखा हैं।

पार्क में जब
किसी का दर्द सुन लिया
साथी किसी का गुजर गया
उसकी आंख का आंसू देख
घर आकर,जीवन साथी को 

हिलते हाथों से
गजरा लगाते देखा है।
चढ़ती उम्र के साथ
प्यार को भी चढ़ते देखा है।

Thursday, February 11, 2021

मैं अदना नारी .....नीलम गुप्ता

मैं अदना नारी
सब कहते है कैसे लिख लेती हो
कितना हुनर है
मैं मुस्करा जाती हूं
और तुम्हें एक राज बताती हूं
लिखने को हुनर नही दिल चाहिए
शब्द नही समझ चाहिए
कोई कहानी नहीं
बस दर्द चाहिएं
कोई बनावट नही
असलियत चाहिएं

कौन क्या लिखता
कैसे लिखता
मैं नही जानती
बस दिल ने जो कहा
मैं बस वहीं  मानती 

कोई जादू नहीं है ये
ना कोई काबिलियत हैं ये
बस जज्बात से भरा दिल हैं
जिसे आपके समझ में उभारती
बिना जज्बात के बात नहीं बनती
बात बिन कायनात नही रचती

फिर मैं तो कलमकार हूं दोस्तों
जज्बात बिन मेरी
कलम भी ना हिलती
कुछ अनकहे ख्याब
कुछ सबके विचार
कुछ नादानियां
कुछ खामोशियां
कुछ अधूरा प्यार
कभी मां का दुलार
तो कभी हसीं की बौछार ले आती हूं
और अंदर तक भाव भिवोर हो जाती हूं

मैं एक अदना सी नारी
लिख कर कुछ जज़्बात
खुशियां बिखेर देती हूं
आपके संग संग
अपने अधरों पर भी
एक मुस्कान सहेज लेती हूं....

स्वरचित

©नीलम गुप्ता 

Monday, January 11, 2021

शुरू ही कहां हुआ ....नीलम गुप्ता


शुरू ही कहां हुआ

लोग कहतें हैं कि
बक्त नहीं कटता
हम कहते कि
बक्त ही नहीं मिलता
लोग कहते हैं
उम्र हो गई
हम कहते
अब जिंदगी
शुरू हो गई
लोग कहे बच्चों को
सैटल करना है
हम कहे, हमें
अब मजे करना है
लोग बुढ़ापे से
डर रहे
हम जवानी के
मजे कर रहे
उन्हें भविष्य
डरा रहा
हमे वर्तमान में
मजा आ रहा
उन्होंने जीना
छोड़ दिया
हमनें तो अब जाके
शुरू किया
वो कहते
बहुत हुआ
हम कहते
शुरू ही
कहां हुआ...???
स्वरचित

- नीलम गुप्ता

Thursday, December 24, 2020

रूह हूं मैं ...नीलम गुप्ता

 रूह हूं मैं
मुझे चांद ना कहना
उसमें तो दाग है
मुझे फूल भी ना कहना
मुरझाना उसका भाग्य है
मै कोई परी भी नहीं
जो आसमां मे उड़ जाऊं
मै कोई किताब भी नहीं
जो रद्दी में बेच दी जाऊं
मै तेरा आज नहीं
जो कल नजर ना आऊं
मैं कोई परछाई भी नहीं
जी अंधेरे से डर जाऊं
मै तो तेरे रूह का हिस्सा हूं
जिसे तू भी मिटा नहीं सकता
अपने नाम से मेरा नाम
हटा नहीं सकता
जब भी सांस लेगा तू
मुझे ही महसूस करेंगा
जाएगा कहां भागकर खुद से
मेरा अस्तित्व तो
हर जगह मौजूद रहेगा
स्वरचित 
©नीलम गुप्ता

 

Monday, December 21, 2020

देर ना हो जाए ...नीलम गुप्ता

 

देर ना हो जाए

सिगरेट फूंकती लड़की

बदचलन कहलाती

और लड़का मर्द

कहा जाता

दोनों के गुर्दे क्या

अलग अलग ब्रांड के है

लड़की का भूगोल नापतें नापतें

इतिहास पर नजर अटक जाती 

उसका कौमार्य ही 

उसकी पहचान कहलाती

बड़े अजीब नजारे दुनिया ने दिखाए है

मर्द सुबह का भूला शाम को भी ना आता

फिर भी लड़की पर इल्जाम लग जाता

कैसी पत्नी, रूप में ना फंसा सकी

पति के दिल में ना समा सकी

इल्जाम हर बार आना ही है

बिना गुहार सुने, फैसला सुनाना ही है

तो फिर चोला क्यों हम पहन घूमते रहे

क्यों और कब तक बिना वजह सहे

बस यही से कहानी बदल गईं

आज लड़की हावी हो रही

जितना दबाया सताया था उसे

आज उतना ही वो भारी हो रही

समझ लो कहीं देर ना हो जाएं

आपका लडका भी कहीं

चाय की ट्रे लेकर ना जाए

ओर लड़की उसके

कौमार्य पर सवाल उठाएं 

स्वरचित 

-नीलम गुप्ता

कविताएं डॉ अंशु के साथ

Wednesday, October 21, 2020

#दाग अच्छे है ...नीलम गुप्ता


 #दाग अच्छे है
दाग पर ना जा
दाग है तभी हम सच्चे है 
दाग बहुत अच्छे है
सफ़ेद कुर्ती पर लगा दाग
क्यों आंखों को नहीं भाता
इस दाग से ही तो
रचता संसार सारा
क्यों शराब खुले में
पैड काली पन्नी 
में लाए जाते
उन पांच दिनों की कीमत
क्यों लोग समझ ना पाते
रचा ब्रह्मांड उन दागों से ही
फिर क्यों उन पांच दिनों की
कोई बात नहीं करता
उन दिनों के दर्द को
कोई नहीं समझता
क्यों छुपा छुपा कर 
क्यों बचा बचा कर
इस तस्वीर में रंग भरते है
क्यों नहीं कहते
ये दाग बहुत ही अच्छे है

स्वरचित

-नीलम गुप्ता