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Monday, July 1, 2019

सोलह श्रृंगार. .......नरेंद्र श्रीवास्तव

ये सोलह श्रृंगार है, अभिसार के लिये।
ये चितवन इज़हार है, इक़रार के लिये॥

ये चूड़ी की खनक,
ये बिंदी की चमक।
ये माला की लटक,
ये पायल की छमक॥
ये प्रीत मनुहार है, दिलदार के लिये।

ये मेहंदी की महक,
ये माहुर की चहक।
ये काजल की दहक,
ये कुंकुम की कहक॥
ये अमृत बयार है, सत्कार के लिये।

ये सपनों की लचक
ये लज्जा की कसक।
ये रिश्ते की भनक,
ये अपनों की झलक॥
ये अंतर पुकार है,दीदार के लिये।
-नरेंद्र श्रीवास्तव

Sunday, June 30, 2019

वो सृष्टि का कर्ता है सृष्टि का कारण .....अजय अमिताभ 'सुमन'

ख़ुदा की दवा  को जफ़ा मानते हो,
है उसकी अता ये ना पहचानते  हो।

ये उसकी नहीं  बन्दे  तेरी ख़ता है,
ख़फ़ा है अकारण तुझे क्या पता है।

सज़ा है ये तेरी या तुझ पे भरोसा,
जाने ये कैसे क्या है तू ख़ुदा सा?

क्या जाने ख़ुदा  की नई सी  दुआ है,
तू नाहक़ समझता ग़लत सा हुआ है।

जब न रहेगा इस जग में अँधेरा,
जाने जग कैसे सूरज का बसेरा।

जब प्यूपा रगड़ता है ख़ुद के बदन को,
तभी जाके पाता है, पूर्ण अपने तन को।

जो हल को न राज़ी, आकांक्षी है छाया,
उन्हें तो बस मिलती है कोमल ही काया।

गर तुझको मोहब्बत है ख़ुद के ख़ुदा से,
तो लानत फिर कैसी शिकायत ख़ुदा से?

है ठीक औ ग़लत क्या ये सब जानते हैं,
बामुश्क़िल ही पर  उसको पहचानते हैं।

वो सृष्टि का कर्ता है सृष्टि का कारण,
करे कोई कैसे  भी उसका निर्धारण?
-अजय अमिताभ 'सुमन'

Thursday, January 31, 2019

याद.....शबनम शर्मा

बरसों बाद
पीहर की दहलीज़,
आँख भर आई, 
सोच 
बेसुध सीढ़ियाँ चढ़ना 
पापा के गले लग 
रो देना, 
हरेक का उनके 
आदेश पर गिर्द घूमना, 
खूँटी पर टंगा काला कोट, 
मेज़ पर चश्मा, ऐश-ट्रे,
घर के हर कोने में 
रौबीली गूँज।
आज घूरती आँखें, 
रिश्तों को निभाती आवाज़ें, 
समझती बेटी को बोझ, 
हर तरफ़ परायापन
एक आवाज़ बुलाती, 
जोड़ती उस पराये 
दर से ‘पापा बुआ 
आई हैं।’
-शबनम शर्मा

Sunday, January 21, 2018

आपसे जब दोस्ती होने लगी.....’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी


आपसे जब दोस्ती होने लगी
हाँ ग़मों में अब कमी होने लगी

रोज़ की ये दौड़ रोटी के लिए
भूख के घर खलबली होने लगी

आप मेरे हम सफ़र जब से हुए
ज़िन्दगी मेरी भली होने होने लगी

रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब
सूख के वो शायरी होने लगी

शहर भर में ज़िक्र है इस बात का
पीर की चादर बड़ी होने लगी

फूल तितली चिड़िया बेटी के बिना
कैसे ये दुनिया भली होने लगी

सर्द दुपहर उम्र की है साथ में
याद स्वेटर ऊनी सी होने लगी

सीख देता है नई वो इसलिए
हर नए ग़म से ख़ुशी होने लगी

ज़ख्म अब कहने लगे 'गुमनाम' जी
आपसे अब दोस्ती होने लगी
-’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी
(नवीन विश्वकर्मा)

Tuesday, January 9, 2018

कुछ क्षणिकाएँ.....प्रतिमा भारती

सोंधी खुशबू
......................
शब्द गुमसुम हों तो क्या...।
हँसी की धूप दिखाओ ...
जितनी भी ...।
दर्द बरसेगा जब भी
मन के आँगन में...
हवा में होगी
उसकी सोंधी खुशबू...।।

नियति
.........................
जानती हूँ 
पहचानती भी हूँ
’नियति’
फिर भी ...

शब्दों का लबादा ओढ़े
वह...।
जल्लाद सी नज़र आती है ।।

दिल की बातें
..............................
आओ बैठें
कुछ अधलेटे कुछ उन्नीदे से
दिल की हरी नर्म ज़मीन पर....
सहलाएँ...नोचें...बिखराएँ ...फैलाएँ और उड़ाएँ
भावनाओं और संवेदनाओं की दूब...
बातें करें कुछ बिखरी बिखरी फैली बेतरतीब सी...
वैसी ही जैसी होती हैं बातें....
दिल से दिल के करीब की.....

बहाना
................................
मत कुरेदो ...
बहुत कुछ होगा अनावृत ...
बहुत कुछ ऐसा 
जो है
अनपेक्षित... , असहनीय..., अशोभनीय ...,
है मेरे भी भीतर
क्योंकि 
मेरे पास भी 
है बहाना 
इंसान होने का ।।
-प्रतिमा भारती


Thursday, November 16, 2017

ज़िन्दगी उम्मीद पर...गुलाब जैन

ज़िन्दगी उम्मीद पर कब तक रहेगी,
काग़ज़ की कश्ती है कब तक बहेगी।

क्यूँ, किसने, क्या कहा, फ़िक्र न करें,
दुनिया तो कहती है, कहती रहेगी।

जलती है वो भी इश्क़ में उसके,
शमा परवाने को, ये कैसे कहेगी।

ख़िज़ां गर है आई, फ़िज़ा होगी पीछे,
दोनों की दौड़ ये, बदस्तूर रहेगी।

तसव्वुर में जैसी परवाज़ होगी,
बुलंदी आसमां की भी वैसी रहेगी।
- गुलाब जैन

Friday, February 17, 2017

और क्या चाहिये बसर के लिये.........ऋतु कौशिक

चल पड़े हम उसी सफ़र के लिये
वो ही मंज़िल उसी डगर के लिये

जिसके साये में मिट गई थी थकन
मैं हूँ बेताब उसी शजर के लिये

चंद रिश्ते दिलों के थोड़ी ख़ुशी 
और क्या चाहिये बसर के लिये

पक के गिरने की राह देखी सदा
पास पत्थर तो था समर के लिये

हर जगह रोशनी हुई है मगर
शब अँधेरी है खँडहर के लिये।


-ऋतु कौशिक

ritukaushiktanu@gmail.com

Thursday, October 27, 2016

आवाज़.............दीप्ति शर्मा













आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़
-दीप्ति शर्मा

Wednesday, October 19, 2016

हर लम्हा खुश होना पड़ेगा............डॉ. फ़रियाद "आज़र"


खु़द अपना बारे-गम ढोना पड़ेगा
मगर हर लम्हा खुश होना पड़ेगा

वो इतना हँस चुका है ज़िन्दगी में
कि शायद उम्र भर रोना पड़ेगा

अगर तुम खु़द को पाना चाहते हो
तो आपने आप को खोना पड़ेगा

वो शायद ख़्वाब में दोबारा आये
मुझे इक बार फिर सोना पड़ेगा

निखर जायेगी फिर सूरत तुम्हारी
मगर अश्कों से मुँह धोना पड़ेगा

पड़ेगा दुश्मनों का साथ देना
ख़िलाफ़ अपने उसे होना पड़ेगा

-डॉ. फ़रियाद "आज़र"

Sunday, October 16, 2016

एक जू-ए-दर्द से जिगर तक रवां है आज............... अली सरदार जाफ़री

एक जू-ए-दर्द से जिगर तक रवां है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशां है आज
जू-ए-दर्द=पीड़ा की नदी; रवाँ=बहना/चलना
रग़=नाड़ी; आतिश-फ़िशां=ज्वालामुखी

लब सी दिये हैं ता न शिक़ायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख्म के मुँह में ज़बां है आज
ता=ताकि

तारीकियों ने घेर लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियां है आज
तारिकी=अँधेरा; हयात=जीवन; रू=चेहरा; हसीं=सुन्दर

जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमां है आज
शादमां=प्रसन्न

हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्तां है आज
अहल-ए-वफ़ा=विश्वसनीय; दास्तान-ए-शौक़=प्रेमकथा

आए हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में
ज़ख्मों से दिल चूर नज़र गुल-फ़िशां है आज
निशात=प्रसन्नता; क़त्ल-गाह=वध-स्थल; चूर=टूटा हुआ; गुल-फ़िशां=फूलों को फैलना

ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया जुल्म का ग़रूर
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज
ज़िन्दानी=बन्दी; ग़रूर=अभिमान; दब-दबा=तड़क-भड़क;
रौब=धाक / डर / त्रास; हुकूमत=शासन

अली सरदार जाफ़री 
29 नवम्बर 1913 - 01 अगस्त 2000