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Wednesday, September 12, 2018

जाने के ख्वाहिश हैं.....एस. नेहा

क्षितिज के उस पार 
जहाँ  मेरी जाने के ख्वाहिश हैं

वहां न ख्वाहिशों की  बेड़ियाँ हैं 
और न ही रिश्तों का दोहरापन 
वहाँ न ही उम्मीदें हैं 
और न ही किसी प्रकार का सूनापन 

वहां बसता है गर कुछ तो 
बस शांति का एहसास ....
मेरे चेहरे पे अब थकान दिखने लगी हैं 
मेरे आवाज में बेबसी सजने लगी है 
की मुझे ये दुनिया पसंद नहीं 
की मै थक गई हूँ।

अब मुझे इस थकान  को मिटाना है 
आवाज से इस बेबसी को मिटाना है 
कि मैं  जिन बन्धनों में बंध  गई हूँ 
तोड़ देना है उन्हें 
कि मुझे अब चीखना है  जोरों से   
कि मेरा खुदा  सुन सके 

और मेरा मसीहा मुझसे  मिल सके 
की अब तो मुझे क्षितिज के पार ही जाना है 
-एस. नेहा
दस साल पुरानी रचना