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Monday, October 1, 2018

ऐ शरीफ़ इंसानों........... साहिर लुधियानवी


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में,
अमन-ऐ-आलम का ख़ून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे के सरहद पर , 
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले के औरों के ,
ज़ीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढ़ें की पीछे हटें,
कोख धरती की बाँझ होती है !
फतह का जश्न हो के हार का सोग,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है !

जंग तो खुद ही एक मसलआ है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और ख़ून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी ! 

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती रहे तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आँगन में,
शमा जलती रहे तो बेहतर है 
- साहिर लुधियानवी

शब्दार्थ
नस्ल-ए-आदम = आदम का वशंज, मशरिक = पूर्व दिशा, 
मगरिब = पश्चिम, अम्न-ए-आलम = विश्व शांति, ज़ीस्त = जीवन, फ़ाक़ों = गरीबी / उपवास, एहतियाज = बलिदान

Sunday, October 25, 2015

मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए....... साहिर लुधियानवी

उनकी पुण्यतिथि पर विशेष
25 अक्टूबर,1980


मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए 
मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए 
  
ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है 
बसर हो सके तो बसर कीजिए

सितम के बहुत से हैं रद्द-ए-अमल
ज़रूरी नहीं चश्म तर कीजिए

वही ज़ुल्म बार-ए-दिगर है तो फिर
वही जुर्म बार-ए-दिगर कीजिए

क़फ़स तोड़ना बाद की बात है
अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए

-साहिर लुधियानवी
1921-1980

मुश्तहरः घोषणा, रद्द-ए-अमलः प्रतिक्रिया, 
बार-ए-दिगरः दूसरे का भार,  क़फ़सः पिंजरा, 
ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-परः पंख आने का इन्तजार