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Monday, February 18, 2019

दो कविताएँ .....स्मृति आदित्य


1.
हां मैं प्रेम में हूं, 
प्रेम मुझमें है
तुम ना कहो ना सही 
मैंने तो हर मोड़ पर 
हर बार यह बात कही.... 
पर हर बार 
तुम्हारी 'वह' बात 
हमेशा बची रही...
जो तुमने कभी नहीं कही...
2.
इससे पहले कि तुम 
लाकर रखो हरसिंगार मेरे सिरहाने 
इससे पहले कि 
गुलमोहर की ललछौंही पत्तियां 
इकट्ठा करो तुम मेरे लिए 
और इससे पहले कि तुम लेकर आओ 
ढेर सारे ताजे गुलाब 
मेरे मंदिर के लिए... 
मैं देती हूं अपने शब्दों के सच्चे गुलाबी फूल 
कि तुम से ही महका है मन-उपवन 

मेरी धरा, मेरा गगन...

-स्मृति पाण्डेय (फाल्गुनि)

Tuesday, January 15, 2019

उगती हुई कविता...... स्मृति आदित्य

रख दो 
इन कांपती हथेलियों पर 
कुछ गुलाबी अक्षर 
कुछ भीगी हुई नीली मात्राएं 
बादामी होता जीवन का व्याकरण, 
चाहती हूं कि उग ही आए कोई कविता
अंकुरित हो जाए कोई भाव, 
प्रस्फुटित हो जाए कोई विचार 
फूटने लगे ललछौंही कोंपलें ...
मेरी हथेली की ऊर्वरा शक्ति
सिर्फ जानते हो तुम 
और तुम ही दे सकते हो 
कोई रंगीन सी उगती हुई कविता 
इस 'रंगहीन' वक्त में.... 
-स्मृति आदित्य