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Sunday, March 6, 2016

शाम की परतें – तीन क्षणिकाएँ....मंजू मिश्रा

आओ 

शाम की परतें  

खोल कर देखें 

कितना कुछ

छुपा रखा है 

दिन ने परदे में ...
..............

ख्वाबों पर 
दिन भर का 
चढ़ा हुआ गिलाफ 
उतार कर देखना 
शाम की परतें गिनना 
और फिर सोचना 
रात कितनी लम्बी होगी 
.........................

शाम की परतों में 
दफ़्न रहते हैं 
जाने कितने ही  
अधूरे ख्वाब 
मजबूर ख्वाहिशें , 
भूखे पेट , टूटे शरीर 
पूरे दिन का दर्द समेटे 
आँखों में पालते हैं 
रात का इन्तजार  
कि शायद नींद पनाह देदे 
चार पल को ही 
मगर सुकून तो होगा

- मंजू मिश्रा 

मूल रचना