शाम की परतें
खोल कर देखें
कितना कुछ
छुपा रखा है
दिन ने परदे में ...
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दिन भर का
चढ़ा हुआ गिलाफ
उतार कर देखना
शाम की परतें गिनना
और फिर सोचना
रात कितनी लम्बी होगी
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दफ़्न रहते हैं
जाने कितने ही
अधूरे ख्वाब
मजबूर ख्वाहिशें ,
भूखे पेट , टूटे शरीर
पूरे दिन का दर्द समेटे
आँखों में पालते हैं
रात का इन्तजार
कि शायद नींद पनाह देदे
चार पल को ही


