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Sunday, December 13, 2020

क्यूं रूठे है सनम आप हमसे ....प्रीती श्रीवास्तव

 


नजरो से अपनी पिलाइये तो जरा।
हस कर करीब मेरे आइये तो जरा।।


क्यूं रूठे है सनम आप हमसे।
क्या वजह है बताइये तो जरा।।

दिल है मेरा कांच का सनम।
इस पर रहम खाइये तो जरा।।

 टूटकर बिखर न जाऊं कहीं।
दिल की दिल को सुनाइये तो जरा।।

 प्यासे ही रह गये जाकर मयखाने।
थोड़ी ही सही पिलाइये तो जरा।।

सबकी नजरें उठ रही बार बार।
हया को आँखों में लाइये तो जरा।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Friday, May 29, 2020

जरा बता दो है क्या ...प्रीती श्रीवास्तव

बहुत ग़ज़ल से मुहब्बत वो करतें हैं यारों
उसी में शामों सहर रंग भरतें हैं यारों।।

नजर उठी मेरी उनकी तरफ देखा उन्हें।
वो करते इश्क से दीदार डरतें हैं यारों।।

कोई बता दो मेरी आरजू उन्हें जाकर।
लिखा है खत में कि वो आहें भरतें हैं यारों।।

करूं मैं कैसे यूं दीदार अपने साहिब का।
वो तो नकाब हटातें भी डरतें हैं यारों।।

खुदा ही जाने मुहब्बत में क्या होगा मेरा।
देखा है लोग होकर खाक मरतें हैं यारों।।

जरा बता दो है क्या हाथ की लकीरों में।
ये सच है इश्क तो उन्ही से करतें हैं यारों।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Monday, May 11, 2020

वो करके नशा फिर झिझकने लगे ...प्रीती श्रीवास्तव

जो हम आइनें में सवरनें लगे।
हमें देखकर वो मचलनें लगे।।

नशा इस कदर उनपे छाया के फिर।
वो तो नींद में यारों चलने लगे।।

जो आयी कयामत न पूछों ये तुम।
सरे बज्म ही वो बहकने लगे।।

न पूछों मुहब्बत में हाल फिर।
वो शम्मा के जैसे पिघलने लगे।।

गजब की कहानी लिखी शाम तक।
हुई शाम वो फिर सँभलने लगे।।

कहूं आगे कुछ तो बहकना नही।
वो करके नशा फिर झिझकने लगे।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Sunday, May 3, 2020

मुहब्बत की ग़ज़ल....प्रीती श्रीवास्तव

खौफ क्या से क्या बना दे आदमी को।
जी रहा डर डर यूं इन्सां जिन्दगी को।।

हर तरफ तूफान चलती आँधियां हैं।
रोक लूं मैं कैसे आँखों की नमी को।।

तू बता मेरे खुदा मेरी खता क्या।
कब तलक जीती रहूं इस बेबसी को।।

याद मुझको आ रही मेरी मुहब्बत।
किस तरह पूरी करूं उसकी कमी को।।

छुप गया वो चाँद सा क्यूं मुस्कुरा के।
मैं छुपाऊं कैसे बढ़ती बेखुदी को।।

मुझको तेरा ही सहारा मेरे मालिक।
रोक इन बेमौत मरती जिन्दगी को।।

कैसे कह दूं अब मुहब्बत की ग़ज़ल मैं।
हर तरफ रोते देखा हर आदमी को।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Tuesday, April 28, 2020

दिल में बस वफा है ...प्रीती श्रीवास्तव

मुहब्बत की ये कैसी दास्तां है।
अश्क आँखों में दिल में बस वफा है।

कभी दीदार किया शामों सहर तक।
कभी दुश्वार मिलना भी हुआ है।।

निभायी हमने सिद्दत से कसमें भी।
मगर फिर भी मिली हमको जफा है।।

बसी है दिल में यारों की मुहब्बत।
मेरे दिल से बस निकलती दुआ है।।

रहें आबाद वो चाहे जहां हो।
खुदा शायद यही अब चाहता है।

हुई मुद्दत उसे देखे हुये तो।
बिना उसके जीना लगता सजा है।।

उसे आवाज देकर भी बुलाया।
बेरूखी से मेरा दिल ही दुखा है।।

देखा जो आसमाँ की ओर यारा।
तो हमको चाँद भी फीका लगा है।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Wednesday, April 15, 2020

बस यूं ही ...प्रीती श्रीवास्तव

मैनू याद उसकी आती रही सारी रात।
दिल मेरा ही जलाती रही सारी रात।।

वो साला ओड़ कर कम्बल सोता रहा।
मैं तकिये लगाकर रोती रही सारी रात।।

बड़ा निर्दयी बड़ा निष्ठुर था वो हरजाई।
मै अपना चैन शुकूं खोती रही सारी रात।।

सारा दिन खत लिखे मैने उसकी याद में।
ख्वाब खत में संजोती रही सारी रात।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Saturday, April 11, 2020

बहारों के मौसम में ...प्रीती श्रीवास्तव

मुहब्बत को आँखों से छलका रहे हो ।
मुझे तुम बहुत आज बहला रहे हो।।

बयां हो रहा है नजर से तुम्हारे।
कि तुम मुझसे फिर आज घबरा रहे हों

अभी कह दो जो मुझसे है तुमको कहना।
बिना बात क्यूं बात उलझा रहे हो।।

जो ढल जायेगी शाम फिर क्या करोगे।
बहारों के मौसम में शरमा रहे हो।।

कोई गैर ले जायेगा फिर उठाकर।
अभी कुछ भी कहने से इतरा रहे हो।

कहो राज दिल में छुपा क्या तुम्हारे।
यो गुप चुप से तुम क्यों चले जा रहे हो।।

कहीं रह न जाये ये फिर से अधूरी।
नयी बात कोई तो समझा रहे हो।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Friday, April 10, 2020

छेड़ो धुन प्यार की ...प्रीती श्रीवास्तव

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जाम हाथों से अपने पिलाओ कभी।
फूल गजरे में हंसकर सजाओ कभी।

आके महफिल में कोई गजल बाबहर।
खूबसूरत सी हमको सुनाओ कभी।।

मोह ले मन मेरा मुग्ध होके कहूं।
वाह यारों गजल फिर से गाओ कभी।

सुर बिना ताल बिना गजल गायकी।
कर दे मदहोश ऐसी सुनाओ कभी।।

गाके तुम एक गजल छेड़ो धुन प्यार की।
भाव सुन्दर सनम तुम दिखाओ कभी।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Saturday, March 14, 2020

इम्तहां रोज लेती रही जिन्दगी ....प्रीती श्रीवास्तव

प्यार के लिये आँसू बहाना पड़ा।
फिर जमाने से इसको छुपाना पड़ा।।

लोग बदनाम कर दे न हमको सनम।
सोचकर गम बहुत हमको खाना पड़ा।।

आँख भरती रही रात दिन ये मेरी।
दर्द सीनें में फिर भी दबाना पड़ा।।

इम्तहां रोज लेती रही जिन्दगी।
खौफ को दूर खुद से  भगाना पड़ा।।

रिश्ते नाजुक बहुत हैं मेरे यार सुन।
काँटों पे चल के इन्हें निभाना पड़ा।।

इनसे बचना भी मुमकिन कहाँ था कभी।
हार कर इन्हें अपना बनाना पड़ा।।

अब न छूटे कभी इल्तजा है यही।
या खुदा सिर तेरे दर झुकाना पड़ा।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Wednesday, February 26, 2020

तेरी महफिल में ...प्रीती श्रीवास्तव

तेरी महफिल में आना चाहता हूं।
गजल तुझको सुनाना चाहता हूं।।

मोहब्बत की कहानी इस शहर में।
सनम सबको बताना चाहता हूं।।

कभी रोकर कभी सबको रूलाकर।
कभी हँसकर हँसाना चाहता हूं।।

जमाना चाहे मुझको या न चाहे।
तुझे मैं आजमाना चाहता हूं।।

मुझे मेरी मुहब्बत की कसम है।
तुझे अपना बनाना चाहता हूं।।

तेरे दिल में ठहर कर अपने लिये।
मुहब्बत फिर जगाना चाहता हूं।।

तेरी ही आरजू में जानेजां मैं।
ये दुनिया भूल जाना चाहता हूं।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Thursday, May 30, 2019

दोस्त है कि दुश्मन वो मेरा पुराना.....प्रीती श्रीवास्तव

अभी हाल दिल का सुनाया नही है।
किसी को जख्म ये दिखाया नही है।

मेरे इश्क का है ऐसा असर दिलबर।
उसने अब तलक मुझे भुलाया नही है।।

मुहब्बत में किये कई वादे उसने।
मगर उनको रहबर निभाया नही है

बयां क्या करें उन गुनाहों को हरपल।
जहां में ऐसा सनम पाया नही है।

दोस्त है कि दुश्मन वो मेरा पुराना।
ये मेरे आज भी समझ आया नही है।

लुत्फ़ हम उठायें ऐसे कैसे दिलबर।
सफर में मिला कोई भाया नही है।।

कयामत न आ जाये इक रोज देखना।
मेरा चांद घर मेरे आया नही है।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Tuesday, March 19, 2019

अभी भुला क्यूँ नही देते....प्रीती श्रीवास्तव


वफा के बदले वफा क्यूँ नही देते।
जख्म दिया है दवा क्यूँ नही देते।।

आंख है नम जो तुम्हारे साथ से।
तुम उसे अभी भुला क्यूँ नही देते।।

मुहब्बत नही जब तुम्हारी रूह से।
गुनाह की उसे सजा क्यूँ नही देते।।

दिल है तुम्हारा नाजुक आइने सा।
दीदार उसे भी करा क्यूँ नही देते।।
देवता है जो वो पत्थर का साहिब।
बीच चौराहे उसे दफना क्यूँ नही देते।।

जिओगे कब तक उसका नाम लेकर।
लिखकर खत जला क्यूँ नही देते।।

फायदा क्या तुम्हारे ऐसे जीने से।
उसको भी तुम रूला क्यूँ नही देते।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Tuesday, March 5, 2019

दिल का लगाना आ गया...प्रीती श्रीवास्तव

उनकी बज्म तक चलकर जाना आ गया।
खूबसूरत सफर का लुत्फ़ उठाना आ गया।।

यूं बैठे थे सारे मेहरबां मुद्दत से नकाब में।
तीर निशाने पर हमको लगाना आ गया।।

तोड़कर लाते थे कभी वो फूल गुलाब का।
कांटो से हमको दिल का लगाना आ गया।।

पेशे खिदमत में हमारी उनकी तहरीर थी।
चार लफ्जों से हमें उनको लुभाना आ गया।।

लगाओ बोली शौक से बिकने को तैयार हूं।
तुम्हारी कीमत का अंदाजा लगाना आ गया।।
- प्रीती श्रीवास्तव

Sunday, December 9, 2018

है प्यार उसको तो सारे जहान से........प्रीती श्रीवास्तव

तुम्हारी नजर में जो चांद दागदार है।
रौशन सारा जहां उससे ही यार है।।

है प्यार उसको तो सारे जहान से।
सब पर बरसती चांद की बहार है।।

उसी की इनायत से चमके सितारें।
उसकी जरूरत सबको मेरे यार है।।

हसरत है मुझे उसके पास जाने की।
वही इबादत मेरी और मेरा प्यार है।।

तमन्ना है मेरी वो चमकता रहे यूं ही।
खुदा से मेरी बस इतनी दरकार है।।

मौत आने से पहले उठे मेरा जनाजा।
रूके धड़कने हो बारिस की फुहार है।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Saturday, September 30, 2017

रो रोकर जीते है गैरों की महफिल में.....प्रीती श्रीवास्तव

हुई अंजुमन मे आपकी रात आधी !
रह गई मुलाकात आधी बात आधी!!

हाथ जो बढ़ाया हमने खफा हो गये!
महफिल से हुई रूखसत बारात आधी!!

नजरे उठायी जो बहकने लगे कदम!
खता हो गई थी चांदनी रात आधी!!

करवट बदलते ही सहर हो गई साहिब !
करार आया कहां था थी बात आधी!!

फिर मिलने का वादा करके चले वो!
रो रही थी हर कली कायनात आधी!!

मुड़कर जो देखा मुझे करार आ गया !
कह गये वो मेरी हर सौगात आधी!!

यादें है अब पास उनकी मेरे रहबर !
फाड़ दी तस्वीर तहरीर किताब आधी !!

रो रोकर जीते है गैरों की महफिल में !
होती रही तुमसे अक्सर मुलाकात आधी !!

मुमकिन कहां है अब मक्का-मदीना!
पहुंचती रही हर बार मेरी आवाज आधी !!

-प्रीती श्रीवास्तव

Sunday, August 27, 2017

बारिस का वो पानी भूली....प्रीती श्रीवास्तव


मैं भूली, मेरी कहानी भूली !
संग बिताई सांझ सुहानी भूली !!

मन का आंगन डोल रहा !
मद-मस्त वो जवानी भूली !!

कोयल ने जब छेड़ी तान !
बारिस का वो पानी भूली !!

पंरिदे जब घर वापस आये !
दोपहर की वो नादानी भूली !!

हुई सांझ तेरी याद आयी !
गुजरे वक्त की निशानी भूली !!

आंखो आंखो मे बीती रातें !
फिर आंख का पानी भूली !!

प्यास बुझ गई एक बूंद से !
तपती रेत की वो रवानी भूली !!

मै भूली, मेरी कहानी भूली !
साथ बिताई सांझ सुहानी भूली !!

-प्रीती श्रीवास्तव

Sunday, July 23, 2017

आंखो से गिरे है मोती हजारो.....प्रीती श्रीवास्तव

तेरी बेवफाई का शिकवा सनम ! 
मै किसी से कर नही सकती !!

है गुनाहगार तू मेरा कहकर !
साहिब आहें भर नही सकती!!

इल्जाम क्या दूं मै तुझको !
बिन आइना संवर नही सकती !!

की हिमाकत मैने जहां मे सनम !
संगदिलो से जंग लड़ नही सकती !!

अब तो खुदाया का आसरा है !
दर्दे-दिल से अब गुजर नही सकती !!

लिख दूं नाम तेरा हर हरफ पर!
शरारत मै ऐसी कर नही सकती !!

तारीफ क्या करूं उस नाचीज की !
आबरू जिसकी बिगड़ नही सकती !!

आंखो से गिरे है मोती हजारो !
दामन खाली ये भर नही सकती !!

तराना क्या छेड़ू ग़ज़ल मे !
प्रीत बिन मुकम्मल कर नही सकती !!

कुछ नया कर जाऊं तो अच्छा! 
आखिरी दम मगर पढ़ नही सकती !!

सात फेरे सात जन्मों का बंधन!
सात आरजुये मगर निखर नही सकती!!

कर जाये वो वफा तेरे साथ भी! 
उम्मीद न कर ठहर नही सकती !!

तेरी पालकी में चार फूल अच्छे !
तेरे नाम से बगिया बिखर नही सकती !!

-प्रीती श्रीवास्तव..

Sunday, July 16, 2017

सावन का महीना ! ......प्रीती श्रीवास्तव
















हर चेहरे पे निखार आयी है !!
बादल भी बरसे जमकर !
धरा की प्यास बुझायी है !!
बैरी सजनवां परदेश बसे !
याद उनकी बार बार आयी है !!
पाती लिख लिख हैरान हुई !
बागों में भी बहार आयी है !!

चूड़ी खनके हाथों मे !
पायल ने टेर लगायी है !!
पांव महावर लगाके !
हाथों में मेंहदी रचायी है !!
बन-ठन बैठी अंगना !
विरहा ने आग लगायी है !!
सखियां बोले बोली !
मिलकर हंसी उड़ायी है !!

दे दे कोई साथी संदेशवा !
आंख मेरी भर आयी है !!
अबके आना फिर न जाना !
बैरी बलम तुमको दुहाई है !!

- प्रीती श्रीवास्तव
महफिल से....