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Saturday, July 23, 2016

और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला...महाकवि हरिवंश राय बच्चन


महाकवि हरिवंश राय बच्चन की कलम ने रचा एक 
काव्य ग्रन्थ नाम दिया "मधुशाला"
पूरा पढ़ी आज..
या यों कहिए आज अमृत पान किया मैंने
प्रस्तुत कर रही हूँ इस ग्रन्थ का परिशिष्ठ

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।

एक सौ पैंतीस मनकों की ये माला
यहां पठन-पाठन के लिए उपलब्ध है
सादर

Sunday, August 9, 2015

जो राज़ का आलम था वही राज़ का आलम.....ग़ुलाम रब्बानी 'ताबाँ'




1914 - 1993

सर ता ब क़दम एक हसीं राज़ का आलम
अल्लाह रे इक फ़ित्ना-गर-ए-नाज़ का आलम

 ज़ुल्फ़ों में वो बरसात की रातों की जवानी
 आरिज़ पे वो अनवार-ए-सहर-साज़ का आलम

 उनवान-ए-सुख़न ‘ग़ालिब’ ओ ‘मोमिन’ का तग़ज़्ज़ुल
 अंदाज़-ए-नज़र बादा-ए-शीराज़ का आलम

 दुज़-दीदा निगाहों में इक इल्हाम की दुनिया
 नाज़ुक से तबस्सुम में इक एजाज़ का आलम

उलझे हुए जुमलों में शरारत भी हया भी
जज़्बात में डूबा हुआ आवाज़ का आलम

इस सादगी-ए-हुस्न में किस दर्जा कशिश है
हर नाज़ में इक जज़्बा-ए-ग़म्माज़ का आलम

 उस सैद को क्या कहिए जो ख़ुद आए तह-ए-दाम
 दिल में लिए इक हसरत-ए-परवाज़ का आलम

 यूँ तो न तसाहुल न तग़ाफ़ुल न तजाहुल
 कुछ और है उस काफ़िर-ए-तन्नाज़ का आलम

 शोख़ी में शरारत में मतानत में हया में
 जो राज़ का आलम था वही राज़ का आलम

-ग़ुलाम रब्बानी 'ताबाँ'

1914 - 1993
जन्म स्थान : फ़रूखाबाद, उत्तरप्रदेश

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