Wednesday, August 23, 2017

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट,,,सर्वेश्वर दयाल सक्सेना



गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
'राम'।

दूसरे के मुँह से निकला-
'माओ'।

लेकिन
तीसरे के मुँह से निकला-
'आलू'।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


Tuesday, August 22, 2017

अमाँ हम भी किरायेदार ही हैं....नवीन सी. चतुर्वेदी

चढा कर तीर नज़रों की कमाँ पर। 
हसीनों के क़दम हैं आसमाँ पर॥ 

हरिक लमहा लगे वो आ रहे हैं। 
यक़ीं बढता ही जाता है गुमां पर॥ 

कोई वादा वफ़ा हो जाये शायद। 
भरोसा आज भी है जानेजाँ पर॥ 

उतरती ही नहीं बोसों की लज़्ज़त। 
अभी तक स्वाद रक्खा है ज़ुबाँ पर॥ 

किसी की रूह प्यासी रह न जाये। 
लिहाज़ा ग़म बरसते हैं जहाँ पर॥ 

अगर भटका तो इस को छोड़ देंगे। 
नज़र रक्खे हुये हैं कारवाँ पर॥ 

अमाँ हम भी किरायेदार ही हैं। 
भले ही नाम लिक्खा है मकाँ पर॥ 

-नवीन सी. चतुर्वेदी
फेसबुक से

Monday, August 21, 2017

भरम का भरम लाज की लाज रख लो...सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

अजब नक - चढ़ा आदमी हूँ
जो तुक की कहो बे-तुका आदमी हूँ

बड़े आदमी तो बड़े चैन से हैं
मुसीबत मिरी मैं खरा आदमी हूँ

सभी माशा-अल्लाह सुब्हान-अल्लाह
हो ला-हौल मुझ पर मैं क्या आदमी हूँ

ये बचना बिदकना छटकना मुझी से
मिरी जान मैं तो तिरा आदमी हूँ

अगर सच है सच्चाई होती है उर्यां
मैं उर्यां बरहना खुला आदमी हूँ

टटोलो परख लो चलो आज़मा लो
ख़ुदा की क़सम बा-ख़ुदा आदमी हूँ

भरम का भरम लाज की लाज रख लो
था सब को यही वसवसा आदमी हूँ"।

-सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

Sunday, August 20, 2017

देख तेज़ाब से जले चेहरे .....फरिहा नक़वी

लाख दिल ने पुकारना चाहा 
मैं ने फिर भी तुम्हें नहीं रोका 

तुम मिरी वहशतों के साथी थे 
कोई आसान था तुम्हें खोना? 

तुम मिरा दर्द क्या समझ पाते 
तुम ने तो शेर तक नहीं समझा 

क्या किसी ख़्वाब की तलाफ़ी है? 
आँख की धज्जियों का उड़ जाना 

इस से राहत कशीद कर!! दिन रात 
दर्द ने मुस्तक़िल नहीं रहना 

आप के मश्वरों पे चलना है? 
अच्छा सुनिए मैं साँस ले लूँ क्या? 

ख़्वाब में अमृता ये कहती थी 
इन से कोई सिला नहीं बेटा 

देख तेज़ाब से जले चेहरे 
हम हैं ऐसे समाज का हिस्सा 

लड़खड़ाना नहीं मुझे फिर भी 
तुम मिरा हाथ थाम कर रखना 

वारिसान-ए-ग़म-ओ-अलम हैं हम 
हम सलोनी किताब का क़िस्सा 

सुन मिरी बद-गुमाँ परी!! सुन तो 
हर कोई भेड़िया नहीं होता 

-फरिहा नक़वी

Saturday, August 19, 2017

तमाशा देखेंगे....कवि डी. एम. मिश्र


कोई ‘हिटलर’ अगर हमारे मुल्क में जनमे तो।
सनक में अपनी लोगों का सुख-चैन चुरा ले तो।

अच्छे दिन आयेंगे, मीठे - मीठे जुमलों में,
बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो।

मज़लूमों के चिथड़ों पर भी नज़र गड़ाये हो,
ख़ुद परिधान रेशमी पल-पल बदल के निकले तो।

दूर बैठकर फिर भी आप तमाशा देखेंगे,
जनता से चलनी में वो पानी भरवाये तो।

कितने मेहनतकश दर -दर की ठोकर खायेंगे,
ज़ालिम अपने नाम का सिक्का नया चला दे तो।

वो मेरा हबीब है उससे कैसे मिलना हो,
कोई दिलों में यारों के नफ़रत भड़काये तो।

जिसके नाम की माला मेरे गले में रहती है,
वही मसीहा छुरी मेरी गरदन पर रख दे तो।

आँख मूँदकर कर लेंगे उस पर विश्वास मगर,
दग़ाबाज सिरफिरा वो हमको अंधा समझे तो।
-कवि डी. एम. मिश्र

Friday, August 18, 2017

इंतज़ार मत करना.....राजेश "ललित" शर्मा


इंतज़ार मत करना
अब मेरा
थक गये हैं पाँव
मुश्किल है चलना
मोड़ अभी भी बहुत हैं
ज़िंदगी के
याद कर लेना
कभी हो सके
मेरे अक्स को।
- राजेश "ललित" शर्मा 

Thursday, August 17, 2017

आईने.....पंकज कुमार शर्मा



बरसो से जड़े हैं..
तेरे घर में जो आईने
उनका खयाल करना
उनमें तेरे हर दौर की शक्ल है.
उन्होंने तेरी शक्ल को
संवारा है..
हर दाग को मिटाया है.
-पंकज कुमार शर्मा