Thursday, October 18, 2018

है सजर ये मेरे अपनों का...डॉ. आलोक त्रिपाठी


बड़ा अजीब सा मंझर है ये मेरी जिन्दगी की उलझन का 
गहरी ख़ामोशी में डूबा हुआ है सजर ये मेरे अपनों का 


सिले होठों के भीतर तूफानों की सरसराहट से टूटते सब्र 
लगता है जहर बो दिया हो किसीने अपने अरमानों का 


आवाजों को निगलते मेरी बातों के अंजाम का खौफ 
खुली हवाओं में घुला हो जहर तहजीब व सलीकों का 


जीने का हुनर सीखते २ रूठ गयी है जिन्दगी मुझसे 
शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ मै घुटन जंजीरों का 


आपनो से इतनी नफरत कि बस भाग जाऊ कहीं 
शिकायत किसी से नही बोझ हैं चाहत के अपनों का 



Wednesday, October 17, 2018

जीने की वजह ........रंजना भाटिया


दुःख ...
आतंक ...
पीड़ा ...
और सब तरफ़
फैले हैं .............
न जाने कितने अवसाद ,
कितने तनाव ...
जिनसे मुक्ति पाना
सहज नही हैं
पर ,यूँ ही ऐसे में
जब कोई...
नन्हीं ज़िन्दगी
खोलती है अपने आखें
लबों पर मीठी सी मुस्कान लिए
तो लगता है कि
अभी भी एक है उम्मीद
जो कहीं टूटी नहीं है
एक आशा ...
जो बनती है ..
जीने की वजह
वह हमसे अभी रूठी नही है !
-रंजना भाटिया

Tuesday, October 16, 2018

ये आँसू यूँ ही तो बहते नहीं हैं ......रंजना वर्मा

वजह बिन फ़ासला रखते नहीं हैं 
किसी से दुश्मनी करते नहीं हैं 

भरेंगे जल्द ही सब घाव तन के
जखम अब ये बहुत गहरे नहीं हैं 

समझ लेता सभी का दर्द है दिल
ये आँसू यूँ ही तो बहते नहीं हैं 

सहेजी अश्क़ की दौलत जिगर में
जवाहर ये अभी बिखरे नहीं हैं 

दुआ में माँगते खुशियाँ जहाँ की
किसी से हम कभी जलते नहीं हैं 

हैं हँसते लोग अक्सर दूसरों पे 
मगर खुद पे कभी हँसते नहीं हैं 

जमाना साथ आये या न आये
मगर हम राह से भटके नहीं हैं
-रंजना वर्मा

Monday, October 15, 2018

खुद से बिछड़ने की क्या थी वज़ह.....पंकज शर्मा


तेरे खामोश होने की क्या थी वज़ह,
कि फिर लौट न आने की क्या थी वज़ह।

तेरे होने न होने का अब फर्क नहीं पड़ता,
साथ होकर भी साथ न होने की क्या थी वज़ह।

बीती बातों का क्यों अफसोस है तुझे,
ग़ज़ल लिखने की क्या थी वज़ह।

मगरूर हुए वो कुछ इस तरह,
दिल टूट बिखर जाने की क्या थी वज़ह।

बातें तुम करती हो फ़लां फ़लां की,
खुद से बिछड़ने की क्या थी वज़ह।
-पंकज शर्मा

Sunday, October 14, 2018

तुम थे तो हम थे... राहुल कुमार

लम्हे वो प्यार के जो जिए थे, वजह तुम थे
ख्वाब वो जन्नत के जो सजाये थे, वजह तुम थे 
दिल का करार तुम थे,
रूह की पुकार तुम थे
मेरे जीने की वजह तुम थे
लबों पे हँसी थी जो , वजह तुम थे
आँखों में नमी थी जो, वजह तुम थे
रातों की नींद तुम थे,
दिन का चैन तुम थे
मांगी थी जो रब से वो दुआ तुम थे
मेरी दीवानगी तुम थे,
मेरी आवारगी तुम थे
बनाया मुझे शायर,
वो शायरी तुम थे
तुम थे तो हम थे,
मेरी जिंदगी तुम थे
-राहुल कुमार

Saturday, October 13, 2018

बीच भँवर में डोले कश्ती.......डॉ. रजनी अग्रवाल 'वाग्देवी रत्ना'

जीवन में आई बाधाएँ
हमको नाच नचाती हैं,
सुलझ न पाए गुत्थी कोई
उलझन ये बन जाती हैं।

असमंजस का भाव जगातीं
दिल को ये भटकाती हैं,
मृग शावक से चंचल मन को
व्याकुल ये कर जाती हैं।

रिश्तों के कच्चे धागों में
उलझ गाँठ पड़ जाती हैं,
हस्त लकीरें भेद छिपातीं
उलझन फिर कहलाती हैं।

बीच भँवर में डोले कश्ती
मंज़िल नज़र न आती है,
व्यवधानों से घिर जाने पर
हिम्मत साथ निभाती है।

जीवन पथ पर उलझन सारी
भूल भुलैया बन जाती हैं,
धैर्य धरित सन्मार्ग चलाती
सुबुद्धि राह दिखाती है।

उलझन से घबराना कैसा
शक्ति हमें बतलाती है,
जो मन जीता वो जग जीता
कर्मठता सिखलाती है।
-डॉ. रजनी अग्रवाल 'वाग्देवी रत्ना'

डॉ. रजनी अग्रवाल “रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी(मो.-9839664017)


Friday, October 12, 2018

मन की उलझन ....इन्दु सिंह

कभी सोचता है उलझनों में घिरा मन
क्या ठहर गया है वक्त ? नहीं,
वक्त वैसे ही भाग रहा है
कुछ ठहरा है तो वो है मन,
मन ही कर देता है कम
अपनी गति को
और करता है महसूस
ठहरे हुए वक्त को
उसे नज़र आती हैं सारी
जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
निराशायें उसी वक्त में
पर ठहरा हुआ मन अचानक-
हो उठता है चंचल मृगशावक सा
और करता है पीछा उस वक्त का,
जो बीत गया है।
नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
सोचता है तब उसका
ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
वक़्त का नहीं
ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।
-इन्दु सिंह