Tuesday, April 24, 2018

ढूँढती हूँ...अजन्ता शर्मा

उनको बिसारकर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।

खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।

अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।

अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।

बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।

दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।

रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।

इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।

दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।

रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।

छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।

जो मुझे डंसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।

जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।

कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!

पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
-अजन्ता शर्मा

Monday, April 23, 2018

कोई अर्थ नहीं......राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, 
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

मन कटुवाणी से आहत हो 
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
     फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
-राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

Sunday, April 22, 2018

जीवन के प्रति श्रद्धा...उर्मिला सिंह

दिल के  समन्दर  में भावों की  कश्ती  होती है!
उठती गिरती लहरें जीवन की कहानी कहती है!!
सुख दुख है जीवन माना ,पर पार उसे है करना,
सघर्षों से लड़ कर ही अपनी पहचान बनानी है!!

ज्ञान तुम्हें मिलता है किताबों से, सच है माना
अनुभव राह दिखाता है ,जब छाये घोर अँधेरा
जितने गहरे जाओगे मोती ढूंढ तभी पाओगे
जग में पदचिन्ह तभी तुम अपने दे जाओगे

जीवन के प्रति श्रद्धा ही ध्येय तुम्हें बनाना है
कर्म शक्ति सर्वदा तुम्हे, उसी से पाना है
यदि साध्य तुम्हारा उज्ज्वल होगा जीवन में
साधन अवश्य मिलेगा तुमको मन्जिल पाने में
-उर्मिला सिंह

Saturday, April 21, 2018

लघु कविताएँ ; ‘एक काफिला नन्हीं नौकाओं का’.....डॉ. सुधा गुप्ता

‘एक काफिला नन्हीं नौकाओं का’.....

1- सिर्फ़ एक धुन
उदासी में डूबी सुबह
उदासी में भीगी शाम
उदासी का जाम 
जिन्दगी की बाँसुरी पर 
सिर्फ़ एक धुन 
बजती हैं –
एSS क तेरा नाम ।
-0-
2- तपिश और आग 
दिल के आतिशदान में
चटख़ती यादों ! 
तपिश तो ठीक है, सही जाएगी 
उफ़ ! आग ऐसी ।
मत बनो बेरहम इतनी
मेरी दुनिया जल ही जाएगी !
-0-
3-दो पल में 
कहाँ- कहाँ हो आया मन
दो पला में
क्या- क्या पाया
खो आया मन 
दो पल में …
-0-
4- इंतज़ार 
इंतज़ार 
इंतज़ार ---
पलकों पर काँपते 
आँसुओं की बन्दनवार 
कि / पुतली की रोशनी में
झिलमिलाते /दीयों की क़तार ----
-0-
5-दस्तक
स्वीटपीज़ की गंध 
धीमे – धीमे/ हवा पर बैठ 
सरसराती/ आती हैं 
कोई महक भरी याद 
हौले –हौले 
मेरे दिल का दरवाज़ा 
थपथपाती हैं –
न, नहीं खोलूँगी !
-0-
6-फाँस 
बदल गया मौसम 
फूल गए
अमलतास 
करक गई / ज़ोर से 
फिर कोई फाँस…
-0-
7-चोट 
सुबह-सवेरे
कोयल बोली / कहाँ पी का गाँव
मौसम-बहेलिया 
मँजे खिलाड़ी-सा
फेंक गया दाँव 
टप से गिरी मैं 
चोट खाई चिड़िया-सी 
बाज़ी फिर
उसके हाथ रहेगी !!
-0-
8-मृग- जल 
हौले –से 
तुमने/ तपता मेरा हाथ 
छुआ, और पूछा -
‘अब कैसी हो?’
----झपकी आई थी !
-0-
9-सान्त्वना
फूल
मुझे बहलाने आए—
मेरे पास बैठ कर
हिचकी भर-भर 
रोने लगे …
-0-
10- सिसकी 
बहुत देर रो –रो कर
हलकान हो-हो कर 
सो जाए/ कोई बच्चा
काँधे लग कर 
तो/ नींद में 
जैसे बार- बार 
उसे सिस की आती है,
ऐसे 
मुझे तेरी याद आती है…।
-0-
11-बुज़दिल
दहकती टहनियाँ 
गुलमौर की 
‘आग किसने लगाई’ 
फुस फुसाया जा रहा है,
सवाल
जंगल में कई दिन से 
बुझाने
कोई आगे नहीं आता ।
-0-
12- औचक ही
गुज़रे सबेरों की 
किताब
का कोई पन्ना खुल गया
जनवरी की अलस्सुबह
ठण्डे पानी से नहा कर 
निकलने पर 
पूरी रफ्तार से / चलते
छत-पंखे के नीचे 
औचक ही 
आ गया तन –मन…
-0-
13-मिट्टी का दिया
मैं / मिट्टी का दीया
बड़ी मेहरबानी!
इस दीवाली
तुमने जला दिया
और / यूँ / अपना
जश्न मना लिया …
-डॉ. सुधा गुप्ता

Friday, April 20, 2018

*पंद्रह कदम* ......कुसुम कोठारी


पहले कदम से साथ चले सब
एक सुंदर स्नेह *अलाव*'प्रज्वलित कर 
फिर मचा *'बवाल'* जबरदस्त
तीसरा कदम एक *'चित्र'* मनोरम
रचा सभी ने काव्य विहंगम
फिर कायनात हुई *इंद्रधनुषी*
*पहाड़ी नदी* की रागिनी मोहक
*खलल* पडा फिर भी ना  रुका कारवाँ
बढते रहे कदम उत्साहित
*प्रश्न* पूछना था तितली से
क्यों मंडराती हो सुमनों पर
सांझ ढले होती *उदास*
*परिक्रमा* ये कैसी विचित्र
फिर भी ना छोडी *उम्मीद*
*एहसास* था कितना गहरा
उस पर *तन्हाई* का पहरा
तोड बंधन भरी  *उड़ान* 
*डर* का ना था अब कोई काम
पंद्रहवें कदम पर *कदम*  मिलायें
आज तक की यही कहानी
लिखो कदम पर कविता सुहानी।
-कुसुम कोठारी।

Thursday, April 19, 2018

पाषाण यहाँ बसते.....उर्मिला सिंह

कैसे मन्जिल तक पहुँचे, छाया  घोर अँधेरा है!
कदम कदम यहाँ दरिंदो का लगा हुआ मेला है!

मन  कहता  सपनो  को  पूरा  कर लूँ,
डर कहता दरिंदो से अपने को बचालूँ,
      
कैसे अर्जुन बन लक्ष्य साधू हाँथों से तीर सरकता है!
कदम-कदम पर यहाँ  दरिंदो का लगा हुआ मेला है!  
  
मन कहता सघर्षों से डरो नही तुम,
तन कहता नर भक्षी से दूर रहों तुम,
        
 किस को मन की व्यथा सुनाऊँ पाषाण यहाँ बसते!
 काँटो से रुह जख्मी होती मानव पाषाण बने हँसते!   

नारी सदियों से अग्नि परीक्षा से है गुजरी , 
जीने का मोल चुकाया माँ बहन पत्नी बनी,
        
बाजी जब भी हारी रिश्तों के भाओं में बहते-बहते!   
कामी बहसियों की दरिंदगी कदम नारियों के रोकते!
    
 प्रदूषित हो  रहा शहर-शहर व्यभिचार से,
डरी है बच्चियाँ माँ बाप देश के माहौल से,
       
काँटों से रूह जख्मी होती मानव पाषाण बनेहंसते!
किसको मन की  व्यथा सुनाऊँ  पाषाण यहाँ बसते! 
-उर्मिला सिंह


Wednesday, April 18, 2018

कदम कदम बढ़ाये जा...राम सिंह ठाकुर


कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा
ये जिन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा

शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर
उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा ...

हिम्मत तेरी बढ़ती रहे, खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे खड़े, तू ख़ाक मे मिलाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा ...

चलो दिल्ली पुकार के, क़ौमी निशां सम्भाल के
लाल किले पे गाड़ के, लहराये जा लहराये जा
कदम कदम बढ़ाये जा...
-राम सिंह ठाकुर