Saturday, April 20, 2019

स्वप्न की जलती राह.....सरिता यादव

कुछ उथले से कुछ गहरे से।
भाँति भाँति के चित्र उभर कर बूँद बूँद बिखरे से।
हाँ यही स्वप्न और जीवन है।
जिनको जन मानस पालता है।
मन के कोने कोने में।
कुछ हाँ मीठी कुछ तीखी याद में बीते।
किन्तु शीतल शीघ्र गर्म हवा में रीते।
काँच की तरह बिखर जाएँ फ़र्श पर,
पल भर में, सँजोए सारे स्वप्न।
बस यही ज़िन्दगी है।
उम्र के गलियारे हर मोड़ नये होते हैं।
मिले कई बिछड़े कई।
अन्त में कौन किसके साथ होते हैं?
यही ज़िन्दगी है।
-सरिता यादव 

Friday, April 19, 2019

प्रश्न और प्रश्न.....सतीश राय


प्रश्न चिन्हों की नदी में 
डूबता मैं जा रहा,
सब चले पतवार लेकर, 
मैं भँवर में नहा रहा।
है ये हिम्मत या हिमाक़त, 
वक़्त ही बताएगा,
अपनी धुन हम ख़ुद रटेंगे, 
या ज़माना गायेगा।
सब चले पक्की सड़क पर, 
पगडण्डी मैं बना रहा,
प्रश्न चिन्हों की नदी में 
डूबता मैं जा रहा।

अपने ख़्वाबों को सँजोए, 
दिल ही दिल में जो गदगदा रहा,
कल के बदले में कहीं मैं, 
आज तो ना गँवा रहा?
मैं किनारे रुक कर तनिक 
सोच तो लूँ, पर कैसे!
आकांक्षाओं का प्रवाह मुझे 
प्रतिपल बहाता जा रहा।
क्यूँ न जाकर वापस मैं भी, 
पकड़ लूँ वही पक्की डगर?
महफ़िलों की भीड़ में मैं, 
ख़ुद को खो न लूँ मगर!
पीछे पड़े अपने निशां पर, 
मैं जो यूँ इठला रहा,
प्रश्न चिन्हों को मैं 
अपने प्रश्नों में ही डूबा रहा।
जो भी संशय था, 
अब ना रहा.....अब ना रहा!
-सतीश राय

Thursday, April 18, 2019

तू कहे तो...मधुलिका मिश्रा

तू अगर आग है,
मैं तुझमें जल जाऊँ।
है तू समुंदर तो,
नदिया बन तुझमें समाऊँ
मैं रेत बन कभी,
तुम्हें छू जाऊँ
तो कभी लहर बन कर, 
तेरे दर तक आऊँ।
हर लम्हे को जी लूँ
तेरी हो के ज़िन्दगी बिताऊँ॥
-मधुलिका मिश्रा

Wednesday, April 17, 2019

आपके एहसास ने...श्वेता सिन्हा

आपके एहसास ने जबसे मुझे छुआ है
सूरज चंदन भीना,चंदनिया महुआ है

मन के बीज से फूटने लगा है इश्क़
मौसम बौराया,गाती हवायें फगुआ है

वो छोड़कर जबसे गये हमको तन्हा
बेचैन, छटपटाती पगलाई पछुआ है

लगा श्वेत,कभी धानी,कभी सुर्ख़,
रंग तेरी चाहत का मगर गेरुआ है

क्या-क्या सुनाऊँ मैं रो दीजिएगा 
तड़पकर भी दिल से निकलती दुआ है

जीवन पहेली का हल जब निकाला 
ग़म रेज़गारी, खुशी ख़ाली बटुआ है



Tuesday, April 16, 2019

ताज़ी नज़्म पकाते हैं....दिलीप

आओ दिन के फ़र्श पे दोनों रात बिछाते हैं...
चाँद अंगीठी जला के ताज़ी नज़्म पकाते हैं...

थोड़ा सा एहसास गूँथ लो, कल ही पिसवाया हैं...
ग़म के फिर चकले बेलन पर उसे घुमाते हैं...

पिछली बार की जो ग़ज़लें बाँधी थी मैने ख़त में...
चलो उसे चखने से पहले कुछ गर्माते हैं...

खट्टी बादल की चटनी या तारों की शक्कर से...
तोड़ तोड़ कर एक निवाला चाव से खाते हैं...

वो जो ऊपर रात की रानी उड़ती रहती है...
चलो उसे भी प्याले मे भर ओस पिलाते हैं...

ज़रा ओस फिर हम पी लें और थोड़ी मदहोशी में...
चलो ओढ़ कर हवा सुहानी हम सो जाते हैं...

आओ दिन की फ़र्श पे दोनों रात बिछाते हैं...
चाँद अंगीठी जला के ताज़ी नज़्म पकाते हैं...


Monday, April 15, 2019

क्षण दोष .........शेष अमित

नदी जब बहती है
तो घुला लेती है अपने में,
राह की भाषा-
कुछ मन की, कुछ तन की
और कुछ जो परे हैं इनसे,
उद्गम का वह बाल जल-बिन्दु,
मुहाने तक आते-आते,
ज्ञान और अनुभव से झुक गया है थोड़ा,
एक बार बाढ़ के समय,
मेरे गाँव के तालाब से मिला था,
तब से उसमें प्रेम का छाया-दोष है,
कई बार अकबका जाता है,
आस्मां को ताकता है शून्यता भर अंदर-
जबकि नज़र होनी थी ज़मीन पर,
सागर में विलीन होकर भी,
आंय-बांय-सांय बकता है,
पीछे घूमकर देखता है,
अंधी आँखों से छूटे राह को,
निबद्ध और दीवाना!
-शेष अमित

Sunday, April 14, 2019

चमत्कार.....

मासूम गुड़िया बिस्तर से उठी और अपना गुल्लक ढूँढने लगी…

अपनी तोतली आवाज़ में उसने माँ से पूछा, “माँ, मेला गुल्लक कहाँ गया?”

माँ ने आलमारी से गुल्लक उतार कर दे दिया और अपने काम में व्यस्त हो गयी.

मौका देखकर गुड़िया चुपके से बाहर निकली और पड़ोस के मंदिर जा पहुंची.

सुबह-सुबह मंदिर में भीड़ अधिक थी…. हाथ में गुल्लक थामे वह किसी तरह से बाल-गोपाल के सामने पहुंची और  पंडित जी से कहा, “बाबा, जला कान्हा को बाहल बुलाना!”

“अरे बेटा कान्हा अभी सो रहे हैं… बाद में आना..”,पंडित जी ने मजाक में कहा.

“कान्हा उठो.. जल्दी कलो … बाहल आओ…”, गुड़िया चिल्ला कर बोली.

हर कोई गुड़िया को देखने लगा.

“पंडित जी, प्लीज… प्लीज कान्हा को  उठा दीजिये…”

“क्या चाहिए तुमको कान्हा से?”

“मुझे चमत्काल चाहिए… और इसके बदले में मैं कान्हा को अपना ये गुल्लक भी दूँगी… इसमें 100 लूपये हैं …कान्हा इससे अपने लिए माखन खरीद सकता है. प्लीज उठाइए न उसे…इतने देल तक कोई छोता है क्या???”

“ चमत्कार!, किसने कहा कि कान्हा तुम्हे चमत्कार दे सकता है?”

“मम्मा-पापा बात कह लहे थे कि भैया के ऑपरेछन के लिए 10 लाख लूपये चाहिए… पल  हम पहले ही अपना गहना… जमीन सब बेच चुके हैं…और नाते-रिश्तेदारों ने भी फ़ोन उठाना छोड़ दिया है…अब कान्हा का कोई चमत्काल ही भैया को बचा सकता है…”

पास ही खड़ा एक व्यक्ति गुड़िया की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था, उसने पूछा, “बेटा क्या हुआ है तुम्हारे भैया को?”

“ भैया को ब्लेन ट्यूमल है…”

“ब्रेन ट्यूमर???”

“जी अंकल,  बहुत खतल्नाक बिमाली होती है…”

व्यक्ति मुस्कुराते हुए बाल-गोपाल की मूर्ती निहारने लगा…उसकी आँखों में श्रद्धा के आंसूं बह निकले…रुंधे गले से वह बोला, “अच्छा-अच्छा तो तुम वही लड़की हो… कान्हा ने बताया था कि तुम आज सुबह यहाँ मिलोगी… मेरा नाम ही चमत्कार है… लाओ ये गुल्लक मुझे दे दो और मुझे अपने घर ले चलो…”

वह व्यक्ति लन्दन का एक प्रसिद्द न्यूरो सर्जन था और अपने माँ-बाप से मिलने भारत आया हुआ था. उसने गुल्लक में पड़े मात्र सौ रुपयों में ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन कर दिया और गुड़िया के भैया को ठीक कर दिया.
-संकलित