Friday, September 22, 2017

अहसासों की शैतानियाँ ...सीमा "सदा"


खूबसूरत से अहसास, 
शब्‍दों का लिबास पहन 
खड़े हो जाते जब
कलम बड़ी बेबाकी से 
उनको सजाती संवारती 
कोई अहसास 
निखर उठता बेतकल्‍लुफ़ हो 
तो कोई सकुचाता 
.... 
अहसासों की शैतानियाँ 
मन को मोह लेने की कला, 
किसी शब्‍द का जादू 
कर देता हर लम्‍हे को बेकाबू 
खामोशियाँ बोल उठती 
उदासियाँ खिलखिलाती जब 
लगता गुनगुनी धूप 
निकल आई हो कोहरे के बाद 
अहसासों के बादल छँटते जब भी 
कलम चलती तो फिर 
समेट लाती ख्‍यालों के आँगन में 
एक-एक करके सबको !!!!
-सीमा "सदा"

Thursday, September 21, 2017

आहिस्ता.....प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


तेरी ख़ातिर आहिस्ता,
शायद क़ामिल हो जाऊँगा।
या शायद बिखरा-बिखरा,
सब में शामिल हो जाऊँगा॥

शमा पिघलती जाती है,
जब वो यादों में आती है।
शायद सम्मुख आएगी,
जब मैं आमिल हो जाऊँगा॥

पेशानी पर शिकन बढ़ाती,
जब वो बातें करती है।
नहीं पता कब होश में आऊँ,
कब क़ाहिल हो जाऊँगा॥

उसकी नज़रें दर-किनार,
मेरी नज़रों को कर देती हैं।
सारी रंजिश दूर हटाकर,
खुद साहिल हो जाऊँगा॥

वह तितर-बितर मेरे मन की,
हर ख़्वाहिश को कर देती है।
कदम बढ़ा उसकी राहों में,
मैं राहिल हो जाऊँगा॥

हर एक गुज़ारिश उसकी,
अपनी किस्मत में लिख देता हूँ।
तक़दीर मेरी भी गूँज उठेगी,
जब क़ाबिल हो जाऊँगा॥

शब में आ कर ख़्वाबों पर,
अपना कब्ज़ा कर लेती है।
‘भोर’ तलक मैं आहिस्ता।
शायद ज़ामिल हो जाऊँगा॥

©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Wednesday, September 20, 2017

जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते....नीतू राठौर

जरा सी देर सही घर अगर गये होते
तेरे ही सीने से लग के निखर गये होते।

नहीं भूली हूँ जुदाई की शाम अब तक भी
जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते।

अभी नहीं जो होता रूह से रूह का मिलना
तो इस जनम में दुबारा ठहर गये होते।

तेरा कभी तो सहारा होता तन्हाई में
तो हम भी शाम ढले अपने घर गये होते।

यूँ मन मेरा भी तो अटका रहा ख़्वाहिशों में
नहीं तो रूह छूकर "नीतू" ग़ुजरे गये होते।
-नीतू राठौर

Tuesday, September 19, 2017

खोई हुई पहचान हूँ मैं...राजेश रेड्डी

गीता हूँ कुरआन हूँ मैं
मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं

ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी
देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं

इतनी मुश्किल दुनिया में
क्यूँ इतना आसान हूँ मैं

चेहरों के इस जंगल में
खोई हुई पहचान हूँ मैं

खूब हूँ वाकिफ़ दुनिया से
बस खुद से अनजान हूँ मैं
- राजेश रेड्डी

Monday, September 18, 2017

दस्तक देते कईं शब्द मेरे.....रश्मि वर्मा

सामर्थ्य नहीं अब शब्दों में
कहना कुछ भी है व्यर्थ तुम्हें।
अधरों के स्वर हो गए कंपित, 
अब रुँध चले हैं कंठ मेरे।
नयनों के अश्रु भी तुमसे
विनती कर के अब हार गए

मेरे संतापों के ताप से भी
ना रूद्ध ह्रदय के द्वार खुले
जो प्रश्न मेरे थे गए तुम तक
ना लौट के आया प्रत्युत्तर
दस्तक देते कईं शब्द मेरे
बैरंग चले आए मुझ तक
अब छोड़ दिया है आस सभी
भूला तेरा अपमान सभी
पशुता सा जो आघात किया
बेधा मन छल प्रतिघात किया
लो मुक्त किया हर बंधन से
अपने रूदन और क्रदन से
जी लो तुम मुक्त-मगन होकर
रच लो संसार नव-सृजन कर
- रश्मि वर्मा

Sunday, September 17, 2017

खिलौने वाला.....सुभद्रा कुमारी चौहान


वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ से लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है।
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं
तुमको यही बनाऊँगा
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा?
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में,
मनचाही चींजे़ देगा।
-सुभद्रा कुमारी चौहान

Saturday, September 16, 2017

सुख या फिर ख़ुशी..


चुनते हैं हम
सुख या फिर
ख़ुशी..
रह कर भी
शिविर में ..
प्रताड़नाओं के
हम मन के
मौसम को... 
बासन्ती बना सकते हैं
कोई इन्सान..
कोई वस्तु 
या फिर 
प्रक्रिया हो 
कोई भी....
इतनी बलशाली नहीं
कि हमारे मन पर
कब्ज़ा कर सके
वो भी बगैर हमारी 
मर्जी....और हम
मन से..करते हैं 
कोशिश...और
तलाश लेतें हैं
खुशियाँ...
-मन की उपज
#हिन्दी दिवस