Wednesday, August 15, 2018

परिचय ?....मीना चोपड़ा


भूल से जा गिरी थी मिट्टी में
मद्धिम सी अरुणिमा तुम्हारी।
बचा के उसको उठा लिया मैंने।
उठा कर माथे पर सजा लिया मैंने।

सिंदूरी आँच को ओढ़े इसकी
बर्फ़ के टुकड़ों पर चल पड़ी हूँ मैं।
सर्द सन्नाटों में घूमती हुई
हाथों को अपने ढूँढती रह गई हूँ मैं।

वही हाथ
जिनकी मुट्ठी में बन्द लकीरें
तक़दीरों को अपनी खोजती हुई
आसमानों में उड़ गईं थी।

बादलों में बिजली की तरह
कौंधती हैं अब तक।

शून्य की कोख से जन्मी ये लकीरें
वक़्त की बारिश में घुलकर
मेरे सर से पाओं तक बह चुकी हैं।
पी चुकी हैं मुझे क़तरा क़तरा।

पैर ज़मीं पर कुछ ऐसे अटक गए हैं
वे उखड़ते ही नहीं।

ये सनसनाहटे हैं कि छोड़ती ही नहीं मुझको
सुर और सुर्खियों के बीच
अपरिचित सी रह गई हूँ मैं।

स्वयं से स्वयं का परिचय?
कभी मिलता ही नहीं।

-मीना चोपड़ा

Tuesday, August 14, 2018

लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों.....दुष्यन्त कुमार

वह चपल बालिका भोली थी
कर रही लाज का भार वहन
झीने घूँघट पट से चमके
दो लाज भरे सुरमई नयन
निर्माल्य अछूता अधरों पर
गंगा यमुना सा बहता था
सुंदर वन का कौमार्य
सुघर यौवन की घातें सहता था
परिचय विहीन हो कर भी हम
लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों।
-दुष्यन्त कुमार

Monday, August 13, 2018

कौन जो दूध का धुला होगा.....सजीवन मयंक

आज कोई तो फैसला होगा।
कौन जो दूध का धुला होगा।।

एक पगडंडी अलग से दिखती है।
कोई इस पर कभी चला होगा।।

होगी मशाल जिसके हाथों में।
पीछे उसके एक काफ़िला होगा।।

जो आदमी को गले लगाता था।
वो पागल आपको मिला होगा।।

झूठ बनकर गवाह आया है।
सांच की आंच में जला होगा।।

ठूँठ सा जो आज उपेक्षित है।
कभी इस पर भी घोंसला होगा।।

रोशनी का स्याह चेहरा है।
अंधेरे नें कहीं छला होगा।।

ये लावारिस पड़ा हुआ मुर्दा।
किसी की गोद में पला होगा।।
-सजीवन मयंक

Sunday, August 12, 2018

इश्क़...निर्मल सिद्धू


इश्क़ का शौक़ जिनको होता है
मौत का न ख़ौफ़ उनको होता है

घूमते फिरते हैं फ़क़त दर बदर
ये मर्ज़ न हर किसी को होता है

ली होती है मंज़ूरी तड़पने की
मिला ख़ुदा से यही उनको होता है

चुनता है वो भी ख़ास बन्दों को ही
इसलिये न जिसको तिसको होता है

सहरा की रेत हो या फ़ाँसी का फंदा
गिला कुछ भी न उनको होता है

अख़्तियार में कुछ रह नहीं जाता
ये इशारा जब दिल को होता है

ख़्याल निर्मल को ये सता रहा है
ख़ुदाया, क्यों नहीं सबको होता है
-निर्मल सिद्धू

Saturday, August 11, 2018

शून्य से शिखर हो गए........सजीवन मयंक

शून्य से शिखर हो गए।
और तीखा ज़हर हो गए।।

कल तलक जो मेरे साथ थे।
आज जाने किधर हो गए।।

बाप-बेटों की पटती नहीं।
अब अलग उनके घर हो गए।।

है ये कैसी जम्हूरी यहाँ।
हुक्मरां वंशधर हो गए।।

क्यो परिन्दे अमन चैन के।
ख़ून से तरबतर हो गए।।

भूल गए हम शहीदों को पर।
देश द्रोही अमर हो गए।।
-सजीवन मयंक

Friday, August 10, 2018

परेशां आईना है...........सजीवन मयंक

शब्द को कुछ इस तरह तुमने चुना है। 
स्तुति भी बन गयी आलोचना है।।

आजकल के आदमी को क्या हुआ है।
देखकर जिसको परेशां आईना है।।

दोस्तों इन रास्तों को छोड़ भी दो।
आम लोगों को यहाँ चलना मना है।।

जिसके भाषण आज सडकों पर बहुत हैं।
लोग कहते हैं कि वो थोथा चना है।।

जिस कुएँ में आज डूबे जा रहे हम।
वो हमारे ही पसीने से बना है।।

ठोकरों से सरक सकता है हिमालय।
जो अपाहिज हैं यह उनकी कल्पना है।।

खोल दो पिंजर मगर उड़ ना सकेगा।
कई वर्षों से ये पंछी अनमना है।।
-सजीवन मयंक

Thursday, August 9, 2018

कोई क़ीमत चुका नहीं सकता.....नज़ीर बनारसी

बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर

क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर

बुज़ुर्गवार ने इसके लिए तो कुछ न कहा,
गए हैं मुझको दुआ-ए-सलामती देकर

हमारी तल्ख़-नवाई को मौत आ न सकी,
किसी ने देख लिया हमको ज़हर भी देकर

न रस्मे दोस्ती उठ जाए सारी दुनिया से,
उठा न बज़्म से इल्ज़ामे दुश्मनी देकर

तिरे सिवा कोई क़ीमत चुका नहीं सकता,
लिया है ग़म तिरा दो नयन की ख़ुशी देकर 
- नज़ीर बनारसी