Tuesday, April 25, 2017

बहुत दिन हो गए!....एमएल मोदी (नाना)










जब करते थे यारों के बीच ठिठौली
वो वक्त गुजरे बहुत दिन हो गए!

किसी अपने को तलाश करते हुए,
एक अनजान शहर में आए-
बहुत दिन हो गए!  

न मंजिल का पता है और न ही रास्ते की खबर,
फिर भी अनजानी राह पर चलते हुए-
बहुत दिन हो गए!

भीड़ तो बहुत देखी हमने इस जमाने में,
मगर इस भीड़ में कोई अपना देखे-
बहुत दिन हो गए!  

जब मिलेगा कहीं वो हमें तो,
पूछेंगे यार कहां थे तुमसे मिले-
बहुत दिन हो गए!  

और जो करते थे साथ निभाने की बातें,
उनसे बिछड़े 'नाना' को बहुत दिन हो गए!! 
-एमएल मोदी (नाना)  

Monday, April 24, 2017

दिल के लहू में......डॉ. विजय कुमार सुखवानी


दिल के लहू में आँखों के पानी में रहते थे
जब हम माँ बाप की निग़हबानी में रहते थे

नये मकानों ने हम सब को तन्हा कर दिया
सब मिल जुल के हवेली पुरानी में रहते थे

माँ बाबा दादा दादी चाचा चाची बुआ
कितने सारे किरदार एक कहानी में रहते थे

कैसी चिंता कैसी बीमारी कहाँ का बुढ़ापा
तमाम उम्र हम लोग सिर्फ़ जवानी में रहते थे

ये कभी तो तन्हा मिले तो इस पर वार करें
सारे दुश्मन हमारे इसी परेशानी में रहते थे

जब तक बड़े बूढ़े सयाने हमारे घरों में रहे
हम लोग बड़े मज़े से नादानी में रहते थे

बड़े होकर किस किस के आगे झुकना पड़ा
जब छोटे थे सब हमारी हुक्मरानी में रहते थे

-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Sunday, April 23, 2017

कबाड़ उठाती लड़कियाँ...........मनोज चौहान











पाचं – छः जन के
समूह में
जा रही हैं वे लड़कियाँ
राष्ट्रीय राजमार्ग के एक ओर
रंग बिरंगे, पुराने से
कपड़े पहने
जो कि धुले होंगे
महीनों पहले
उनके किसी त्यौहार पर

पावों में अलग – अलग
चप्पल पहने
दिख जाती हैं पैरों की
बिबाइयां सहज ही
उन के हाथों में हैं
राशन वाली किसी दुकान से खाली हुई
सफेद बोरियां

राजमार्ग पर चलते हुए
जब दिख जाती है उन्हें
किसी गोलगप्पे
या चाट वाले की रेहड़ी पर
उमड़ी भीड़
तो चल पड़ते हैं उनके कदम
स्वतः ही उस ओर
अपनी जिव्हा का स्वाद
मिटाने नहीं
बल्कि खाली पड़ी किसी
पानी या कोल्ड ड्रिंक की बोतल
या इसी तरह के किसी
दुसरे सामान की
आस में

ये लडकियां किशोरियां हैं
सत्रह – अठरह बर्ष के करीब की
सड़क के एक ओर चलते
मिल ही जाती हैं सुनने को
किसी ट्रक ड्राइवर की फब्तियां
या मोटर साइकिल पर जाते
मनचलों के बोल
जिन्हें कर देती हैं वे अनसुना
याद कर
पारिवारिक जरूरतों की
प्राथमिकताओं को ।

चहक उठती हैं वे
शैक्षणिक भ्रमण पर निकली
उस बस को देखकर
जिसमें बैठीं हैं
उनकी ही उम्र की छात्राएं
जो हिला देती हैं हाथ
उन्हें देखकर
अभिवादन स्वरुप
क्या उन्हें नहीं होगा शौक
बन – संवरकर
अच्छा दिखने का
या किसी महंगे मोबाइल से
सेल्फी खींचने का ?

वे कबाड़ उठातीं लडकियां
चिढ़ाती हैं
आज भी
इकीसवीं सदी के विकास को
और साथ ही
प्रति व्यक्ति आय में हुए
इजाफा दर्शाने वाले
अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों को
और संविधान के उन
अनुच्छेदों को भी
जिनमें दर्ज हैं
उनको न मिल सके
कई मौलिक अधिकार

वे मेहनतकश बेटियाँ हैं
अपने माँ – बाप के आँगन में खिले
सुंदर फूल हैं
जिम्मेदारियां उठाकर
परिवार का भरण - पोषण करते हुए
जो बन गई हैं माताओं की तरह
इस उम्र में ही
और जूझ रही हैं
मूलभूत आवश्यकताओं की
उहापोह में
-मनोज चौहान,

Saturday, April 22, 2017

हँसते ही............गिरिजा अरोड़ा











मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही 

फूल खिल जाते हैं
दिल मिल जाते हैं
ग़म के स्तंभ हिल जाते हैं

रंग छा जाते हैं
ढंग भा जाते हैं
दंभ के व्यंग्य सकुचाते हैं

राग बज जाते हैं
भाग जग जाते हैं
हर्ष के पल मिल जाते हैं

पर्दे उठ जाते हैं
अंतर घट जाते हैं
छल के बल घट जाते हैं

बंधन खुल जाते हैं
रस्ते मिल जाते हैं
दर्द के दंश घुल जाते हैं

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही 
तत्व अमरत्व के पास आते हैं
और
अम्ल आसुरी मुड़ जाते हैं

-गिरिजा अरोड़ा

Friday, April 21, 2017

लेखनपुर की प्रेम कथा......अख़तर अली

बहुत समय पहले की बात है, लेखनपुर नामक गाँव में एक युवक और युवती रहा करते थे । युवती का नाम कविता और युवक का नाम कहानी था । कविता और कहानी के प्रेम के चर्चे सिर्फ लेखनपुर मे ही नहीं बल्कि आस पास के गाँव में हुआ करते थे । लोग इनकी तुलना लैला-मजनू और शीरी-फरहाद से किया करते थे । बड़े बुजुर्ग तो यहाँ तक कहा करते थे कि कविता और कहानी से ही लेखनपुर आबाद है, कोई कहता कविता और कहानी के रहने से ही लेखनपुर की पहचान बनी है। कविता और कहानी की मौजूदगी से लेखनपुर भी आनंदित था ।
अचानक एक दिन लेखनपुर में एक अजनबी आदमी आया। उसकी बुरी नज़र कविता और कहानी की जोड़ी पर पड़ी और उसी दिन से कविता और कहानी के बुरे दिन शुरू हो गये। वह अजनबी आदमी धीरे-धीरे संदिग्ध होने लगा, उसने कविता और कहानी को सब्ज़-बाग दिखाने शुरू कर दिये, उसने इनके दिमाग में यह बात बैठा दी कि यहाँ लेखनपुर मे तुम्हारी कोई पहचान नहीं बन पा रही है तुम मेरे साथ चलो फिर देखो मैं तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा देता हूँ । कविता और कहानी उस धोखेबाज के चक्कर में आ गये और अपने आप को पूरी तरह से उसके हवाले कर दिया। उस दिन के बाद से आज तक लेखनपुर में कविता और कहानी को नहीं देखा गया। किसी को पता ही नहीं चला कि आखिर ये दोनों का क्या हुआ? बहुत समय बाद केवल इतना ही पता चला कि उस संदिग्ध आदमी का नाम प्रकाशक था ।

-अख़तर अली

Thursday, April 20, 2017

500 रुपए रोज....डॉ. संगीता गाँधी


सरकारी हस्पताल के एक कोने में आमिर  बुत बना बैठा था ।अनजाना अँधेरा उसके चारों ओर छाया था ।
ये क्या हो गया ? उसने अपने ही हाथों से अपने दिल के टुकड़े को कैसे मार दिया !
अंदर डॉ उसके 12 साल के बेटे का इलाज कर रहे थे ।सर पर पत्थर लगने से  आमिर के बेटे का बहुत खून बह चुका था ।डॉ. पूरी कोशिश कर रहे थे ।
आमिर  एक ग़रीब ,लाचार शाल बनाने वाला बुनकर था । सर्दियों में वो कश्मीर से बाहर जा कर शाल बेचकर पैसे कमा लेता था पर गर्मियां एक मुसीबत बन कर आती थीं । 2 दिन से घर का चूल्हा नहीं जला था । आमिर किसी काम की तलाश में था , तब उसे रफ़ीक मिला ।
रफ़ीक -काम करोगे ,बहुत आसान है ।
आमिर -  हाँ ,साहब करूँगा ,घर  वाले भूखे हैं ।
रफ़ीक -चौक पर खड़ा हो कर पत्थर मारने हैं , 500 मिलेंगे एक दिन के !
आमिर एक अनपढ़ ,गरीब था । उसे न राजनीती की समझ थी न अलगाववादियों के षड्यंत्रों का पता था । उसके लिए  बहुत बड़ी बात थी की एक दिन के 500 मिल रहे हैं ।
आमिर ने एक दिन एक बड़ी भीड़ का हिस्सा बन सेना पर पत्थर  मारे ।
शाम को 500 मिले.......घर वालों को खाना मिला ।
अगले दिन फिर आमिर गया । भीड़ पत्थर फेंक रही थी ।आमिर भी फेंक रहा था........तभी आमिर ने देखा उसका पत्थर एक बच्चे को लगा ।शक्ल उसे कुछ पहचानी सी लगी ।दौड़ कर पास गया तो सुन्न हो गया ! ये तो उसका ही "खून " था । उसका 12 साल का बेटा  बेहोश पड़ा था ।
आमिर  उसे उठा कर दौड़ा । शहर के खराब हालात में जैसे तैसे कई घंटों में अस्पताल  पहुंचा ।
डॉ. ने उसके कंधे पर हाथ रखा .....हम बच्चे को बचा नहीं पाए ,खून काफी निकल चुका था ।
आमिर  बेसुध सा खड़ा था , उसकी  लुटी हुई दुनिया  की तस्वीर की मानिंद बच्चे की लाश पड़ी थी । तभी  उसका दोस्त  अस्पताल पहुंचा.....ये लो आमिर , रफ़ीक ने तुम्हारे 500 दिए हैं !!
आमिर का एक हाथ बच्चे की लाश पर था , दूसरे में 500 थे !!  अज्ञात अँधेरा उसकी दुनिया  को निगल चुका  था।

-डॉ. संगीता गांधी

Wednesday, April 19, 2017

क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती....डॉ. मोहम्मद युनूस बट







पहले बुढ़ापा कलात्मक होता था आज कल भयानात्मक होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप बुढ़ापे की दुनियां मैं जवानी के कौन से रास्ते से दाख़िल हुए हैं। विशेषज्ञों ने दावा किया है कि 2035 तक देश में बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी। अब ये तो दुनियां का नियम है कि यहाँ अगर कोई चीज़ बहुत ज़्यादा मात्रा में है तो उसकी क़ीमत बहुत कम हो जाती है। कालेज के प्रोफ़ेसर ने पाँच लड़कों को कक्षा में खड़ा किया और कहा - तुम चार लड़कों के दिमाग़ की क़ीमत पाँच सौ रुपये प्रति ग्राम और मेरे से कहा - तुम्हारे दिमाग़ की क़ीमत ड़बल यानी हज़ार रुपये प्रति ग्राम है। अपने दिमाग़ क़ीमत जान कर मैं पूरी तरह ख़ुश हो भी नही पाया था कि प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि जो वस्तु बहुत कम मात्रा में पाई जाती है उसकी क़ीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। मुझे लगता है बूढ़ों की बढ़ती तादाद से उनकी मार्केट वैल्यू एकदम घट जायेगी । जनसंख्या रोकने के तरीक़े ढूँढ़ निकाले बुढ़ापा रोकने का कोई उपाय नहीं है। अब जब चारों तरफ़ बूढ़े ही बूढ़े हो जायेंगे तो उन्हें बूढ़ा समझ उनकी इज़्ज़त कौन करेगा?
बूढ़ों को हमारे समाज में वही स्थान प्राप्त है जिस स्थान पर वह बैठे रहते हैं। हम बूढ़ों के ख़िलाफ़ नहीं क्योंकि हमें भी एक दिन बूढ़ा होना है लेकिन बूढ़े हमारे ख़िलाफ़ रहते हैं क्योंकि उन्हें अब कौन सा जवान होना है?
हमारे यहाँ बूढ़े नसीहत देने के काम आते हैं। एक बूढ़े ने बच्चे को नसीहत देते हुए कहा - बेटे अपनी बाईक की रफ़्तार उतनी ही रखना जितनी मेरी दुआओं की रफ़्तार है यानी चालीस किलो मीटर प्रति घंटा, ये उनकी दुआओं की रफ़्तार है, नसीहतों की रफ़्तार बाईक की रफ़्तार जैसी है।
बूढ़े हमेशा ये सोच कर परेशान रहते हैं कि नई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी? वह भी यही सोच कर परेशान रहेगी कि ऩई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी?
एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पच्चीस प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि बूढ़े एकदम खाली रहते हैं जबकि तीन प्रतिशत बूढ़े भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं उन सब का कहना है कि हमारे पास पल भर की भी फ़ुरसत नही है। दरअसल जवान जिस काम को पाँच मिनट में कर के दिन भर खाली बैठे रहते हैं, बूढ़े उसी पाँच मिनट के काम को करने में पूरा दिन लगा देते हैं लिहाज़ा उनके पास पाँच मिनट का भी टाईम नहीं होता। बुढ़ापे की बस एक ही बीमारी है और वह है बुढ़ापा और बुढ़ापे के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
बुढ़ापे में अक्सर भूल जाने की आदत होती है। तीन बूढ़े आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा - जब मैं सीढ़ियों के बीच में पहुँचता हूँ तब भूल जाता हूँ कि मेरे को चढ़ना है या उतरना, दूसरे ने कहा - जब मैं फ्रिज खोलता हूँ तो भूल जाता हूँ कि मेरे को कुछ रखना है या निकालना है, तीसरे ने कहा - मैं कभी कभी यही भूल जाता हूँ कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। वैसे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आप किसी भी बूढ़े को झाड़ेंगे तो उसमें से एक जवान आदमी निकलेगा।
कहते है स्वर्ग में कोई बूढ़ा नहीं होता और अगर यहाँ बूढ़ों की संख्या बढ़ती गई तो फिर इस देश के स्वर्ग बनने की कोई संभावना नहीं रहेगी।
अब जो लोग कहते हैं कि 2035 तक बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी उन्हें मैं ये भी बता दूँ उस वक़्त जो बूढ़े होंगे वो बुढ़ापे की सभी परिभाषायें बदल देंगे क्योंकि उस वक़्त हम बूढ़े होंगे।
एक बात और बुढ़ापे की सभी बातें बूढ़े पुरुषों के बारे में ही होती हैं बूढ़ी औरतों के बारे में नहीं, क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती।

लेखक - डॉ. मोहम्मद युनूस बट
अनुवाद - अख़तर अली