Monday, February 18, 2019

दो कविताएँ .....स्मृति आदित्य


1.
हां मैं प्रेम में हूं, 
प्रेम मुझमें है
तुम ना कहो ना सही 
मैंने तो हर मोड़ पर 
हर बार यह बात कही.... 
पर हर बार 
तुम्हारी 'वह' बात 
हमेशा बची रही...
जो तुमने कभी नहीं कही...
2.
इससे पहले कि तुम 
लाकर रखो हरसिंगार मेरे सिरहाने 
इससे पहले कि 
गुलमोहर की ललछौंही पत्तियां 
इकट्ठा करो तुम मेरे लिए 
और इससे पहले कि तुम लेकर आओ 
ढेर सारे ताजे गुलाब 
मेरे मंदिर के लिए... 
मैं देती हूं अपने शब्दों के सच्चे गुलाबी फूल 
कि तुम से ही महका है मन-उपवन 

मेरी धरा, मेरा गगन...

-स्मृति पाण्डेय (फाल्गुनि)

Sunday, February 17, 2019

दहशत का रास्ता...मंजू मिश्रा

सरहदों पर यह लड़ाई
न जाने कब ख़त्म होगी
क्यों नहीं जान पाते लोग
कि इन हमलों में सरकारें नहीं
परिवार तबाह होते हैं

कितनों का प्रेम
बिछड़ गया आज ऐन
प्रेम के त्यौहार के दिन
जिस प्रिय को कहना था
प्यार से हैप्पी वैलेंटाइन
उसी को सदा के लिए खो दिया
एक ख़ूंरेज़ पागलपन और
वहशत के हाथों

अरे भाई
कुछ मसले हल करने हैं
तो आओ न...
इंसानों की तरह
बैठें और बात करें
सुलझाएं साथ मिल कर
लेकिन नहीं, तुम्हे तो बस
हैवानियत ही दिखानी है
तुम्हे इंसानियत से क्या वास्ता
तुमने तो बस...
चुन लिया है दहशत का रास्ता
- मंजू मिश्रा

Saturday, February 16, 2019

तुमको परवाह नही....प्रीती श्रीवास्तव

लिखकर खत हम जलाने लगे।
पास रहकर भी दूर जाने लगे।।

तुमको परवाह नही मेरे जानिब।
आंशियां दूर अपना बनाने लगे।।

खुश रहो तुम्हें खुशियां मुबारक।
जख्म दिल के हमें सताने लगे।।

चोट है खायी जो दिल पर हमनें।
देख पत्थर लोग पिघल जाने लगे।।

रोना कैसा तुम्हारे लिये दिलबर।
तुम मयखाना अलग बनाने लगे।।

लौटना नामुमकिन है मेरे लिये।
जश्न की रात में कब्र सजाने लगे।।

कहेगा जमाना तेरी खातिर सनम।
हम जहां से रूठकर यूं जाने लगे।।

कद्र करना उन कद्रदानों की सनम।
जो तेरी महफिल अब सजाने लगे।।

-प्रीती श्रीवास्तव

Friday, February 15, 2019

जंगल में कोयल कूक रही है.....अनुज लुगुन

जंगल में कोयल कूक रही है
जाम की डालियों पर
पपीहे छुआ-छुई खेल रहे हैं
गिलहरियों की धमा-चौकड़ी
पंडुओं की नींद तोड़ रही है
यह पलाश के फूलने का समय है।

यह पलाश के फूलने का समय है
उनके जूड़े में खोंसी हुई है
सखुए की टहनी
कानों में सरहुल की बाली
अखाड़े में इतराती हुईं वे
किसी भी जवान मर्द से कह सकती हैं
अपने लिए एक दोना
हँड़िया का रस बचाए रखने के लिए
यह पलाश के फूलने का समय है।

यह पलाश के फूलने का समय है
उछलती हुईं वे
गोबर लीप रही हैं
उनका मन सिर पर ढोए
चुएँ के पानी की तरह छलक रहा है
सरना में पूजा के लिए
साखू के पेड़ों पर वे बाँस के तिनके नचा रही हैं
यह पलाश के फूलने क समय है।
-अनुज लुगुन 

Thursday, February 14, 2019

फिर आया बसंत.......श्वेता सिन्हा

केसर बेसर डाल-डाल 
धरणी पीयरी चुनरी सँभाल
उतर आम की फुनगी से
सुमनों का मन बहकाये फाग
तितली भँवरें गाये नेह के छंद
सखि रे! फिर आया बसंत

सरसों बाली देवे ताली
मदमाये महुआ रस प्याली
सिरिस ने रेशमी वेणी बाँधी
लहलही फुनगी कोमल जाली
बहती अमराई बौराई सी गंध
सखि रे! फिर आया बसंत

नवपुष्प रसीले ओंठ खुले
उफन-उफन मधु राग झरे
मह-मह चम्पा ले अंगड़ाई 
कानन केसरी चुनर कुसुमाई
गुंजित चीं-चीं सरगम दिगंत
सखि रे! फिर आया बसंत

प्रकृति का संदेश यह पावन
जीवन ऋतु अति मनभावन
तन जर्जर न मन हो शिथिल 
नव पल्लव मुस्कान सजाओ
श्वास सुवास आस अनंत
सखि रे! फिर आया बसंत।
-श्वेता सिन्हा

Wednesday, February 13, 2019

प्रेम....भगवतीचरण वर्मा

बस इतना--अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;

पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे।

तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें

अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को

जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।

फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये।
- भगवतीचरण वर्मा

Tuesday, February 12, 2019

आईने से भी रहते है.....अर्पित शर्मा "अर्पित"

सामने कारनामे जो आने लगे,
आईना लोग मुझको दिखाने लगे ।

जो समय पर ये बच्चे ना आने लगे, 
अपने माँ बाप का दिल दुखाने लगे ।

फ़ैसला लौट जाने का तुम छोड़ दो, 
फूल आँगन के आँसू बहाने लगे ।

फिर शबे हिज़्र आँसूं मेरी आँख के, 
मुझको मेरी कहानी सुनाने लगे ।

आईने से भी रहते है वो दूर अब,
जाने क्यू खुदको इतना छुपाने लगे |

कोई शिकवा नही बेरुखी तो नही,
हम अभी आये है आप जाने लगे ।

तेरी चाहत लिए घर से अर्पित चला, 
सारे मंज़र नज़र को सुहाने लगे ।
- अर्पित शर्मा "अर्पित"

परिचय
अर्पित शर्मा जी अर्पित उपनाम से रचनाये लिखते है 
आपके पिता का नाम कृष्णकांत शर्मा है | आपका जन्म मध्यप्रदेश के 
उज्जैन शहर में 28 अप्रैल, 1992 को हुआ | फिलहाल आप शाजापुर में रहते है | 
आपसे इस मेल sharmaarpit28@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है |