Monday, January 20, 2020

चलो फिर से मुस्कुराएं ...फैज अहमद फैज


चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल जलाएं

जो गुज़र गयी हैं रातें
उन्हें फिर जगा के लाएं
जो बिसर गयी हैं बातें
उन्हें याद में बुलायें

चलो फिर से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं
किसी शह-नशीं पे झलकी
वो धनक किसी क़बा की

किसी रग में कसमसाई
वो कसक किसी अदा की
कोई हर्फे-बे-मुरव्वत
किसी कुंजे-लब से फूटा
वो छनक के शीशा-ए-दिल
तहे-बाम फिर से टूटा

ये मिलन की, ना मिलन की
ये लगन की और जलन की

जो सही हैं वारदातें
जो गुज़र गयी हैं रातें
जो बिसर गयी हैं बातें
कोई इनकी धुन बनाएं
कोई इनका गीत गाएं

चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल लगाएं

-फैज अहमद फैज..

Saturday, January 18, 2020

ग़ज़ल मैंने भी लिखी है. ..अरूणिमा सक्सेना


221.  2121.  1221. 212
मतला
आंखों के आगे गिर रहे पत्ते चनार के
आंसू लहू के टपके दिले दाग दार के ।।
हुस्ने मतला
सोचा किये कि जाएंगे मौला के द्वार पे
सपने अधूरे रह गए ग़म बेशुमार के।।
छाया यहाँ  नहींअब शायद इसी लिए
पेड़ों के कौन ले गया ज़ेवर उतार के ।।
❣ 
मिलने चले थे वक्त जुदाई का आ गया
उम्मीद के वो धागे हुये तार तार के।।
❣❣
-अरूणिमा सक्सेना

Friday, January 17, 2020

मैं हिन्दी हूँ ....डॉ० विश्राम जी

मैं सूरदास की दृष्टि बनी
तुलसी हित चिन्मय सृष्टि बनी
मैं मीरा के पद की मिठास
रसखान के नैनों की उजास
मैं हिन्दी हूँ ।।

मैं सूर्यकान्त की अनामिका
मैं पन्त की गुंजन पल्लव हूँ
मैं हूँ प्रसाद की कामायनी
मैं ही कबीरा की हूँ बानी
मैं हिन्दी हूँ ।।

खुसरो की इश्क मज़ाजी हूँ
मैं घनानंद की हूँ सुजान
मैं ही रसखान के रस की खान
मैं ही भारतेन्दु का रूप महान
मैं हिन्दी हूँ ।।

हरिवंश की हूँ मैं मधुशाला
ब्रज, अवधी, मगही की हाला
अज्ञेय मेरे है भग्नदूत
नागार्जुन की हूँ युगधारा
मैं हिन्दी हूँ ।।

मैं देव की मधुरिम रस विलास
मैं महादेवी की विरह प्यास
मैं ही सुभद्रा का ओज गीत
भारत के कण-कण में है वास
मैं हिन्दी हूँ ।।

मैं विश्व पटल पर मान्य बनी
मैं जगद् गुरु अभिज्ञान बनी
मैं भारत माँ की प्राणवायु
मैं आर्यावर्त अभिधान बनी
मैं हिन्दी हूँ।।

मैं आन बान और शान बनूँ
मैं राष्ट्र का गौरव मान बनूँ
यह दो तुम मुझको वचन आज
मैं तुम सबकी पहचान बनूँ
मैं हिन्दी हूँ।।
-डॉ० विश्राम जी 

Thursday, January 16, 2020

माँ इतनी खाश क्यों है ?



बारिश में मै जब घर वापस आयी....
भाई ने पूछा, "छाता लेकर क्यों नहीं गयी थे?
दीदी ने सलाह दी, "बारिश रुकने का इन्तजार करती"
पापा ने गुस्से में बोला, "जब ठण्ड लग जाएगी तब मालुम पड़ेगा"
लेकिन
मेरी माँ मेरे बाल सुखाती हुई बोली, 

"ये बारिश भी न, थोडा देर रुक नहीं सकती थी 
जब मेरी बेटी घर आ रही थी |

ब्लॉग - Love You Mom


Wednesday, January 15, 2020

मौन के भी शब्द होते हैं.....गुन्जन


हाँ मौन के भी "शब्द" होते हैं
और बेहद मुखर भी
चुन -चुन कर आते हैं ये उस अँधेरे से
जहाँ मौन ख़ामोशी से पसरा रहता है
बिना शिकायत -
बैठे-बैठे न जाने क्या बुनता रहता है .. ?
शायद शब्दों का ताना-बना

और ये शब्द विस्मित कर देते हैं
तब.... जब वो सामने आते हैं
प्रेम की एक नयी परिभाषा गढ़ते हुए
अथाह सागर ... असीमित मरुस्थल ... जलद व्योम
न जाने कितना कुछ
अपने में समेटे हुए .. छिपाए हुए
ओह ...... !!

जब सुना था उन्हें .... तब रो पड़ी थी मैं
हाँ मौन के भी शब्द होते हैं
और बेहद मुखर भी
कभी सुनना उन्हें
रो दोगे तुम भी ...... जानती हूँ मैं
अभी भी कितना कुछ समेटे हैं अपने भीतर
भला तुम क्या जानो .. ?


लेखिका परिचय - गुन्जन

Tuesday, January 14, 2020

हवा रो रही है ...दिव्या भसीन

सिसकती है डाली हवा रो रही है।
कली अधखिली फिर से रौंदी गई है।।

फ़िज़ा में उदासी घुली इस तरह अब,
जुबां सिल गयी आँख में भी नमी है।

मेरी ख़ैर ख़्वाही का दावा था करता,
तबाही मेरी देख लब पर हँसी है।

हुए तन्हा हम ज़िन्दगी के सफ़र में,
लगे अपनी सूरत ही अब अजनबी है।

यकीं है मुझे जिसकी रहमत पे हरदम,
उसे चारसू ही नज़र ढूंढती है।

उसे रात के क्या अँधेरे डरायें,
जो ताउम्र ख़ुद तीरगी में पली है।

नसीबा करो बंद अब आज़माना
ख़बर भी है क्या मेरी जां पर बनी है।
-दिव्या भसीन

Monday, January 13, 2020

औरत का दर्द ...दिनेश ध्यानी

औरत का दर्द
आजीवन पराश्रित
कहने को तो घर की लक्ष्मी
हक़ीक़त में
लाचार और विवश।

जन्मने से पहले
जन्मने के बाद न जाने
कब दबा दिया जाय
इसका गला।

तरेरती आँखें नोचने को तत्पर
न घर, न बाहर रही अब सुरक्षित,
जीवन की रटना
जीवनभर खटना
दूसरों की खातिर
खुद को होम करना।
-दिनेश ध्यानी