Sunday, August 9, 2020

घोसला ..डॉ. अनुपमा गुप्ता


वह ढेर, सारे तिनकों का
बहुत सारी मेहनत
और अखंडित लगन से
बनाती है एक घोसला
जिसमें पालती है
अपने दुधमुहों को
और मांगती है दुआ
कि उनके अपने बच्चे
न भूलें, यह घोसला
-डॉ. अनुपमा गुप्ता
रसरंग से

Friday, August 7, 2020

मेरा पुरुष बहुरूपिया ...फणीश्वर नाथ रेणु

दुनिया दूषती है
हँसती है
उँगलियाँ उठा कहती है ...
कहकहे कसती है -
राम रे राम!
क्या पहरावा है
क्या चाल-ढाल
सबड़-झबड़
आल-जाल-बाल
हाल में लिया है भेख?
जटा या केश?
जनाना-ना-मर्दाना
या जन .......
अ... खा... हा... हा.. ही.. ही...
मर्द रे मर्द
दूषती है दुनिया
मानो दुनिया मेरी बीवी
हो-पहरावे-ओढ़ावे
चाल-ढाल
उसकी रुचि, पसंद के अनुसार
या रुचि का
सजाया-सँवारा पुतुल मात्र,
मैं
मेरा पुरुष
बहुरूपिया।
- फणीश्वर नाथ रेणु

Wednesday, August 5, 2020

उनके गम तो मिले हैं ...पावनी दीक्षित "जानिब"

तू है आसमा और मैं हूं ज़मीं
तेरा मेरा मिलन होना मुश्किल है।

मैं सागर किनारे पड़ी रेत हूं
मेरी किस्मत में ना कोई साहिल है।

क्यों इल्जाम दें जहां में किसीको
मेरा दिल ही मेरे दिल का कातिल है।

वो ना सही उनके गम तो मिले हैं
उनकी यादों का हक हमको हासिल है।

तेरे दर पे हम फूल लाए थे लेकिन
सुना यह अमीरों की महफिल है।

बहुत दर्द जानिब हुआ हाथ छूटा
के जुदा आज से अपनी मंजिल है।

-पावनी दीक्षित "जानिब" 
सीतापुर

Tuesday, August 4, 2020

क़ौमियत, इंसानियत का आइना हो जायेगी ...ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफ़ी

13 दिसम्बर 1866  – 1 नवम्बर 1955

देख लेना तुम कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
और ही कुछ बाग़-ए-आलम की हवा हो जाएगी

क़िस्से सब दैर-ओ-हरम के मिट जाने को हैं
बांग, नाक़ूस ओ अज़ाँ की हमनवा हो जायेगी

तंग-नज़री और तअस्सुब का अमल उठ जायेगा
क़ौमियत, इंसानियत का आइना हो जायेगी

अम्न, जंग और अज़्म-ए-ख़ूंरेज़ी पे ग़ालिब आएगा
वजह हुब्बे ख़ल्क़, हुब्बे किब्रिया हो जाएगी

ये जो है बैत-उल-हिज़्न, हो जायेगा दार-उस-सुरूर
तुम फ़ना जिसको समझते हो बक़ा हो जाएगी

-ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफ़ी 

Monday, August 3, 2020

ग़म के फ़साने में उलझ जाता हूँ ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

2122 1122 1122 22
हाले दिल सुनने सुनाने में उलझ जाता हूँ ।
मैं तेरे ग़म के फ़साने में उलझ जाता हूँ ।।

जाने कैसी है क़शिश उसकी सदा में यारो ।
बारहा उसके तराने में उलझ जाता हूँ ।।

हो शबे वस्ल कहीं मुद्दतों से है ख़्वाहिश ।
बात उनसे ये बताने में उलझ जाता हूँ ।।

कौन अपना है यहाँ कौन पराया साहब।
जुबां पे बात ये लाने में उलझ जाता हूँ ।।

वो शरर बन के गुज़रता है मेरे कूचे से ।
और मैं आग बुझाने में उलझ जाता हूँ ।।

बयां कर देती है चेहरे की शिकन जब सच को ।
मैं हक़ीक़त को छुपाने में उलझ जाता हूँ ।।

यार की शक्ल में मिलते हैं फ़रेबी मुझको ।
आजकल हाथ मिलाने में उलझ जाता हूँ ।।

जाने कैसी तेरी जुल्फों की है फ़ितरत जानां ।
मैं तेरा अक्स बनाने में उलझ जाता हूँ ।।

तोड़ जाती है कमर रोज़ यहां महँगाई ।
मैं तो परिवार चलाने में उलझ जाता हूँ ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Sunday, August 2, 2020

तुम एक टूटा हुआ काँटा हो ...पूजा प्रियंवदा

वक़्त को कितना भी बारीक़ गूँधो
कुछ पछ्तावों की किरचें रहती हैं
जैसे किसी गुम चोट का दर्द
जो है तो लेकिन कहाँ है
ऊँगली से छुआ नहीं जाता

इंसान क्या-क्या झेल जाता है
बाढ़ , चक्रवात, भूकंप , तूफ़ान
और किसी दिन कुनमुनी बारिश से ही
दिल के किले की दीवार
भरभरा कर गिर जाती है
सालों का मलबा बह निकलता है

होना और नहीं होना
निरंतर प्रक्रिया है
जैसे खोना पाना
कुछ और खोना कुछ और पाना
फिर खुद ही कोई गुम लम्हा हो जाना
जिसे कोई नहीं ढूंढ रहा

समंदर पाँव के तलवे चूमने के बाद

लौटता है, थोड़ा और धंसा जाता है
जैसे सुई से कुरेदने से
कोई टूटा काँटा
चमड़ी की एक और तह चीरता
दब जाता है और गहरा

तुम एक टूटा हुआ काँटा हो
मेरे दिल में
मैं एक ज़िंदा लाइलाज ज़ख्म हूँ

-पूजा प्रियंवदा
मूल रचना

https://wp.me/p3VurB-ju

Saturday, August 1, 2020

कि मेरे भगवान हो तुम ...डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

शाम-ए -महफ़िल है- 
मेरे दिल के मेहमान हो तुम।
मेरी चाहत है समंदर! 
फिर क्यों परेशान हो तुम?

सबने मुख मोड़ लिया, 
आँखें हैं नम,व्याकुल मन
दीप आँधी में जला लूँगी  
कि मेरे भगवान हो तुम।


आके मिल जाओ-बादलों से 
गिर रही रिमझिम,
जानेमन, जानेचमन, 
जानेवफ़ा, मेरी जान हो तुम।
       
प्रियतम! दीपों की टोली, 
तुम रंग भी हो रंगोली।
थाल पूजा का हो पावन कि 
मेरे घनश्याम हो तुम।
डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'