Saturday, November 25, 2017

चुप.....प्रियंका सिंह



मैं 
चुप से सुनती 
चुप से कहती और 
चुप सी ही रहती हूँ 

मेरे 
आप-पास भी 
चुप रहता है 
चुप ही कहता है और 
चुप सुनता भी है 

अपने 
अपनों में सभी 
चुप से हैं 
चुप लिए बैठे हैं और 
चुप से सोये भी रहते हैं 

मुझसे 
जो मिले वो भी 
चुप से मिले 
चुप सा साथ निभाया और 
चुप से चल दिए 

मेरी 
ज़िन्दगी लगता है 
चुप साथ बँधी 
चुप संग मिली और 
चुप के लिए ही गुज़री जाती है 

कितनी 
गहरी, लम्बी और 
ठहरी सी है ये 
मेरी 
चुप की दास्ताँ........

- प्रियंका सिंह
priyanka.2008singh@gmail.com

Friday, November 24, 2017

कान्हा घूंघर पैर धरे हैं ....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

ठुमकि ठुमकि गईया के बाड़े 
कान्हा घूंघर पैर धरे हैं 
कमर कछनियाँ खुलि खुलि जाये 
लटपटाय कर गिरत उठत है ! 

आधी कछनिया फँसी कमर मै 
आधी भूमि पर लहराये 
नाय सुधि कछु कान्हा को वाकी 
चाहे खुली के गिर ही जाये ! 

जकड़ पाँव गईया मय्या को 
एक हाथ पुनि थन पकड़त है 
काचौ दूध पिये है पचि पचि 
नैकु ना बछड़े से डरपत है ! 

गय्या अति नेह के खातिर 
पूछ से खुद सूत दूर हटाये 
कान्हा दूध पी ले पेट भर 
ममत्व भाव थन भरि भरि आये ! 

ना दूध की इच्छा कोई 
नाय कछनिया ध्यान 
गय्या के प्रति नेह का 
कान्हा कर रहे प्रतिदान ! ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Thursday, November 23, 2017

ये दिलासा...तरुणा मिश्रा

मुझे आज इतना दिलासा बहुत है..
कि उसने कभी मुझको चाहा बहुत है ;

उसी की कहानी उसी की हैं नज़्में...
उसी को ग़ज़ल में उतारा बहुत है ;

बड़ी सादगी से किया नाम मेरे...
तभी दिल मुझे उसका प्यारा बहुत है ;

उठाओ न ख़ंजर मेरे क़त्ल को तुम...
मुझे तो नज़र का इशारा बहुत है ;

किसी और से कोई पहचान क्या हो...
सितमगर वही एक भाया बहुत है ;

सिवा उसके कोई नहीं आज मेरा....
वही दर वही इक ठिकाना बहुत है ;

गले तो मिले दिल मिलाते नहीं हैं...
ज़माने में यारों दिखावा बहुत है ;

निग़ाहें मिलाते अगर सिर्फ़ हम से...
यक़ीनन ये कहते भरोसा बहुत है ;

ज़माने का आख़िर भरोसा ही क्या है....
फ़क़त इक तुम्हारा सहारा बहुत है ;

लुटाए हुए आज बैठी हूँ ख़ुद को ..
मुहब्बत करो तो ख़सारा बहुत है ;

तुम्हें पा लिया है ज़माना गंवा कर..
मेरे वास्ते ये असासा बहुत है ;

कड़ी धूप का है ज़माना ये ‘तरुणा’...
मुझे उसकी पलकों का साया बहुत है...!!

Wednesday, November 22, 2017

एक ख़त ...!!!....तरुणा मिश्रा

ख़त तुमको दिलदार लिखूँगी..
पायल कंगन हार लिखूँगी ;

मैं कश्ती हूँ जीवन तूफां...
पर तुमको पतवार लिखूँगी ;

जो है उल्फ़त नए चलन की...
उसको कारोबार लिखूँगी ;

सीने से एक बार लगा लो...
तुमको अपना प्यार लिखूँगी ;

जब भी मयस्सर होगी फ़ुर्सत...
मिलना नदिया पार लिखूँगी ;

तुम हो मेरे , हाँ मेरे हो...
एक नहीं सौ बार लिखूँगी ;

तुम ही नहीं तो मैं काजल को...
इन पलकों पर भार लिखूँगी ;

तुम बिन जो बीतेगा 'तरुणा'...
उस पल को आज़ार लिखूँगी..!!
(आज़ार- दुःख )


Tuesday, November 21, 2017

घर पहुँचना....कुंवर नारायण


हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर 
अपने अपने घर पहुँचना चाहते 

हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते 

हम सब चाहते एक चरम यात्रा 
और एक परम धाम 

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं 
और घर उनसे मुक्ति 

सचाई यूँ भी हो सकती है 
कि यात्रा एक अवसर हो 
और घर एक संभावना 

ट्रेनें बदलना 
विचार बदलने की तरह हो 
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों 
वही हो 
घर पहुँचना
1927-2017
-कुंवर नारायण

Monday, November 20, 2017

अबकी बार लौटा तो .......कुंवर नारायण सिंह


1927-2017
अबकी बार लौटा तो 
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आँखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा
- कुंवर नारायण सिंह



Sunday, November 19, 2017

अपलक देखती रही.....मोनिका जैन 'पंछी'

तुम्हें याद है वो दिन 
जब हम आखिरी बार मिले थे 
फिर कभी ना मिलने के लिए। 

तुम्हें क्या महसूस हुआ 
ये तो नहीं जानती 
पर जुदाई के आखिरी पलों में 
मैं बिल्कुल हैरान थी। 

कुछ ऐसा लग रहा था जैसे 
अलग कर दिया है मेरी रूह को 
मेरे ही जिस्म से 
दिल काँप रहा था मेरा 
इस अनचाही विदाई की रस्म से। 

एक अनजाने से खौफ ने 
जकड़ लिया था मुझे 
और तेरे आँखों से ओझल होने के बाद भी 
अपलक देखती रही मैं बस तुझे। 

- मोनिका जैन 'पंछी'