Tuesday, August 21, 2018

आँखें....दिव्या माथुर

लो आसमान सी फैल उठीं नीली आँखें
लो उमड़ पड़ीं सागर सी वे भीगी आँखें

मेघश्याम सी घनी घनी कारी आँखें
मधुशाला सी भरी भरी भारी आँखें

एक भरे पैमाने सी छलकीं आँखें 
दिल मानो थम गया किंतु धड़कीं आँखें

ओस में डूबी झील सरीखी नम आँखें
जग का समेटे बैठी हैं ये ग़म आँखें

आँसू का पी एक घूँट, दीं मुस्का आँखें
ये इलाज कई मर्ज़ों का नुस्खा आँखें

शब भर पढ़ती रहीं किसी के ख़त आँखें
धंस बेज़ारी से गालों में गईं झट आँखें

ठिठक गईं जीवन का लगा ग्रहण आँखें
पलक हुआ मन और बनी धड़कन आँखें

जहाँ का दर्द समेटे थीं बोझिल आँखें
दूज के चाँद सी सिमट हुईं ओझल आँखें।
-दिव्या माथुर

Monday, August 20, 2018

मैं नीर भरी दुख की बदली!,,,,,महादेवी वर्मा

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
-महादेवी वर्मा

Sunday, August 19, 2018

इसीलिए तो नगर -नगर..............गोपालदास नीरज


इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू 
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था|

जिनका दुःख लिखने की ख़ातिर 
मिली न इतिहासों को स्याही,
क़ानूनों को नाखुश करके 
मैंने उनकी भरी गवाही 

जले उमर-भर फिर भी जिनकी 
अर्थी उठी अँधेरे में ही,
खुशियों की नौकरी छोड़कर 
मैं उनका बन गया सिपाही 

पदलोभी आलोचक कैसे करता दर्द पुरस्कृत मेरा 
मैंने जो कुछ गाया उसमें करुणा थी श्रृंगार नहीं था|

मैंने चाहा नहीं कि कोई 
आकर मेरा दर्द बंटाये,
बस यह ख़्वाहिश रही कि-
मेरी उमर ज़माने को लग जाये,

चमचम चूनर-चोली पर तो 
लाखों ही थे लिखने वाले,
मेरी मगर ढिठाई मैंने 
फटी कमीज़ों के गुन गाये,

इसका ही यह फल है शायद कल जब मैं निकला दुनिया में 
तिल भर ठौर मुझे देने को मरघट तक तैयार नहीं था|

कोशिश भी कि किन्तु हो सका 
मुझसे यह न कभी जीवन में,
इसका साथी बनूँ जेठ में 
उससे प्यार करूँ सावन में,

जिसको भी अपनाया उसकी 
याद संजोई मन में ऐसे 
कोई साँझ सुहागिन दिया 
बाले ज्यों तुलसी पूजन में,

फिर भी मेरे स्वप्न मर गये अविवाहित केवल इस कारण 
मेरे पास सिर्फ़ कुंकुम था, कंगन पानीदार नहीं था|

दोषी है तो बस इतनी ही 
दोषी है मेरी तरुणाई,
अपनी उमर घटाकर मैंने 
हर आँसू की उमर बढ़ाई,

और गुनाह किया है कुछ तो 
इतना सिर्फ़ गुनाह किया है 
लोग चले जब राजभवन को 
मुझको याद कुटी की आई

आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा 
नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था|

-गोपालदास नीरज

Saturday, August 18, 2018

शेरो-सुख़न तक ले चलो...अदम गोंडवी


भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो 
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ़ हो गई 
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में 
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है 
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग 
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो
-अदम गोंडवी 

Friday, August 17, 2018

स्वतंत्रता दिवस की पुकार....अटल बिहारी वाजपेयी


पन्द्रह अगस्त का दिन कहता - आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

- अटल बिहारी वाजपेयी

Thursday, August 16, 2018

परिचय की वो गांठ....त्रिलोचन

1917-2007

यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला 
फूल उपेक्षित कोई फूला 
जाने कौन लहर ती उस दिन 
तुमने अपनी याद जगा दी। 


कभी कभी यूं हो जाता है 
गीत कहीं कोई गाता है 
गूंज किसी उर में उठती है 
तुमने वही धार उमगा दी। 


जड़ता है जीवन की पीड़ा 
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा 
छवि के शर से दूर भगा दी।
-त्रिलोचन

Wednesday, August 15, 2018

परिचय ?....मीना चोपड़ा


भूल से जा गिरी थी मिट्टी में
मद्धिम सी अरुणिमा तुम्हारी।
बचा के उसको उठा लिया मैंने।
उठा कर माथे पर सजा लिया मैंने।

सिंदूरी आँच को ओढ़े इसकी
बर्फ़ के टुकड़ों पर चल पड़ी हूँ मैं।
सर्द सन्नाटों में घूमती हुई
हाथों को अपने ढूँढती रह गई हूँ मैं।

वही हाथ
जिनकी मुट्ठी में बन्द लकीरें
तक़दीरों को अपनी खोजती हुई
आसमानों में उड़ गईं थी।

बादलों में बिजली की तरह
कौंधती हैं अब तक।

शून्य की कोख से जन्मी ये लकीरें
वक़्त की बारिश में घुलकर
मेरे सर से पाओं तक बह चुकी हैं।
पी चुकी हैं मुझे क़तरा क़तरा।

पैर ज़मीं पर कुछ ऐसे अटक गए हैं
वे उखड़ते ही नहीं।

ये सनसनाहटे हैं कि छोड़ती ही नहीं मुझको
सुर और सुर्खियों के बीच
अपरिचित सी रह गई हूँ मैं।

स्वयं से स्वयं का परिचय?
कभी मिलता ही नहीं।

-मीना चोपड़ा