Tuesday, April 7, 2020

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं ...ममता किरण

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं
ज़िंदगी के साथ चलता क्यों नहीं

बोझ सी लगने लगी है ज़िंदगी
ख़्वाब एक आँखों में पलता क्यों नहीं

कब तलक भागा फिरेगा ख़ुद से वो
साथ आख़िर अपने मिलता क्यों नहीं

गर बने रहना है सत्ता में अभी
गिरगिटों सा रंग बदलता क्यों नहीं

बातें ही करता मिसालों की बहुत
उन मिसालों में वो ढलता क्यों नहीं

ऐ ख़ुदा दुख हो गये जैसे पहाड़
तेरा दिल अब भी पिघलता क्यों नहीं

ओढ़ कर बैठा है क्यूँ खामोशियाँ
बन के लौ फिर से वो जलता क्यों नहीं

क्या हुई है कोई अनहोनी कहीं
दीप मेरे घर का जलता क्यों नहीं.
-ममता किरण

Monday, April 6, 2020

दरवाज़े की आंखें ...आरती चौबे मुदगल

दीवारों के कान होते हैं
एक पुरानी कहावत है
किंतु अब दरवाज़े देखने भी लगे हैं
उनके पास आंखें जो हो गई हैं

चलन बदल गया है
पहले नहीं लगी होती थी कुंडी
सिर्फ़ उढ़के होते थे दरवाज़े
कोई भी खोल के
घर के अंदर प्रवेश कर सकता था

फिर धीरे से कुंडी बंद होने लगी
खड़काने पर ही दरवाज़े खुलते

चीज़ें बदलीं
डोर बेल का ज़माना आया
साथ ही डोर 'आई '
और सी सी टी वी भी

बेल बजते ही
पूरा घर चौकन्ना हो जाता है
दरवाज़े की आंखें
और दीवारों के कान
आपस में तय करने लगते हैं
किसे अंदर आना है
किसे नहीं...

-आरती चौबे मुदगल

Sunday, April 5, 2020

सफ़ेद कुरता....नीलिमा शर्मा

अब तुम कही भी नही हो
कही भी नही
ना मेरी यादों में
न मेरी बातों में

अब मैं मसरूफ रहती हूँ
दाल के कंकड़ चुन'ने में
शर्ट के दाग धोने में
क्यारी में टमाटर बोने में

एक पल भी मेरा
कभी खाली नही होता
जो तुझे याद करूँ
या तुझे महसूस करू

मैंने छोड़ दिए
नावेल पढने
मैंने छोड़ दिए है
किस्से गढ़ने

अब मुझे याद रहता हैं बस
सुबह का अलार्म लगाना
मुंह अँधेरे उठ चाय बनाना
और सबके सो जाने पर
उनको चादर ओढ़ाना

आज तुमको यह कहने की
क्यों जरुरत आन पढ़ी हैं
सामने आज मेरी पुरानी
अलमारी खुली पड़ी हैं

किस्से दबे हुए हैं जिस में
कहानिया बिखरी सी
और उस पर मुह चिढ़ाता
तेरा उतारा सफ़ेद कुरता भी

नही नही !!अब कही भी नही हो
न मेरी यादो में न मेरी बातो में
फिर भी अक्सर मुझको सपने में
यह कुरता क्यों दिखाई देता हैं ......
- नीलिमा शर्मा


Saturday, April 4, 2020

सरगोशियों का मलाल था .. मृदुला प्रधान

पिछले पोस्ट पर कई लोगों ने इच्छा व्यक्त की .. 
वहाँ जिस कविता का ज़िक्र हुआ था 
उसे पढ़ने की .. तो प्रस्तुत है ..

कभी मुंतज़िर चश्में
ज़िगर हमराज़ था
कभी बेखबर कभी
पुरज़ुनू ये मिजाज़ था
कभी गुफ़्तगू के हज़ूम तो 
कभी खौफ़-ए-ज़द
कभी बेज़ुबां
कभी जीत की आमद में मैं
कभी हार से मैं पस्त था...

कभी शौख-ए-फ़ितरत का नशा
कभी शाम-ए-ज़श्न  
ख़ुमार था 
कभी था हवा का ग़ुबार तो
कभी हौसलों का पहाड़ था
कभी ज़ुल्मतों के शिक़स्त में 
ख़ामोशियों का शिकार था
कभी थी ख़लिश कभी रहमतें 
कभी हमसफ़र का क़रार था..

कभी चश्म-ए-तर की 
गिरफ़्त में
सरगोशियों का मलाल था
कभी लम्हा-ए-नायाब में
मैं  भर रहा परवाज़ था
कभी  था उसूलों से घिरा
मैं रिवायतों के अजाब में
कभी था मज़ा कभी बेमज़ा 
सूद-ओ-जिया के हिसाब में..

मैं था बुलंदी पर कभी 
छूकर ज़मीं जीता रहा
कभी ये रहा,कभी वो रहा 
और जिंदगी चलती रही .……
-मृदुला प्रधान
मूल रचना

Friday, April 3, 2020

आग ...वीरेन्दर भाटिया



आग
मनुष्य का
अविष्कार नहीं, मनुष्य से
पहले से है आग
आग 
खोज भी नहीं है मनुष्य की
खुद आग खोज रही थी
कोई सुरक्षित हाथ
जिसमे कल्याणकारी रहे आग

2
आग 
छिपकर आयी चकमक में
यही आग का दर्शन था
आग को जहां
नग्न किया गया
आग वहां विकराल हो गयी

3
आग
मनुष्यता को मिला 
सबसे नायाब तोहफा था
सभी तत्वों से सबसे ज्यादा तीव्रता थी 
आग में
आग ही ने समझाए
आग को झेलने..और
आग से खेलने के  हुनर

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आग से खेलने की पराकाष्ठा में
इसी आग से
मनुष्य ने
मनुष्यता जला डाली

-वीरेंदर भाटिया

Thursday, April 2, 2020

दरख्तों ने कितने रंगों के घूंघट सजाए हैं ...राज्यश्री त्रिवेदी

कुछ अनजानी आहटें हैं,
सफ़र ही सफ़र समाया है जिनमें,
ऐसी ही कुछ राहें हैं..
हर कदम पर खनकती हैं बारिशें,
अब हरी-सी लगती हैं ख्वाहिशें,
नए से रंग नज़ारों में समाए हैं..
हर वक्त सुनाई देता है इक शोर,
जबकि तनहाई का नहीं ओर-छोर,
बारिशों ने कैसे नगमें सुनाए हैं..
दिखते भी नहीं फिज़ाओं के रंग,
घुल से गए जैसे, बादलों के संग,
चाल बदली-सी, गीली हवाएं हैं..
अंधियारों की चली है,
चांद से बादलों की खूब बनी है,
दरख्तों ने कितने रंगों के घूंघट सजाए हैं..

-राज्यश्री त्रिवेदी
इंदौर, मध्यप्रदेश 

Wednesday, April 1, 2020

अचानक उग आए थे अप्रैल में इतने सारे फूल ...घनश्याम कुमार 'देवांश'

सिर्फ़ तुम्हारी बदौलत
भर गया था अप्रैल
विराट उजाले से
हो रही थी बरसात
अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह में
चाँद के चेहरे पर नहीं थी थकावट
रातों के सिलसिले में
एक इन्द्रधनुष टँग गया था
अप्रैल की शाम में
एक सूखे दरख़्त की फुनगी में
मंदिर की घंटियाँ
गिरजे की कैंडल्स और
मस्जिद की अज़ान
घुल गई थी
अप्रैल की त्रिवेणी में...

सचमुच... सिर्फ़ तुम्हारी ही बदौलत
अचानक उग आए थे
अप्रैल में
इतने सारे फूल
पहली बार अच्छा लग रहा था
बनकर अप्रैल फूल...
-घनश्याम कुमार 'देवांश'