Thursday, June 20, 2019

कुछ शेर हवाओं के नाम …मंजू मिश्रा

हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होती
ये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं
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हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैं
जहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं
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चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगर
बड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं
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हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती 
इन्ही की इनायत है कि जिंदगी धड़कती है 
- मंजू मिश्रा
बेलौस - निस्वार्थ, बिना किसी भेदभाव के

Wednesday, June 19, 2019

जीवन बड़ा रचनाकार है ....राहुलदेव गौतम

जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
असत्य के शब्दों से,
सत्य का अर्थ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो कभी शाश्वत हुआ न हो,
ऐसे कल्पनाओं का भरमार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो बिखरा हुआ है,
ख़ुद ज़िम्मेदारियों के शृंखला में,
वो टूटे हुए सपनों का हार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

फँस जाते है स्वयं इसमें,
लक्ष्यों का अरमान,
ऐसे जालों का जंजाल रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

ख़ुद में खो जाता है,
ख़ुद में पा जाता है,
ऐसे इच्छाओं का संसार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जिससे मतलब की बात निकले,
जितना जिससे परिहास निकले,
ऐसे शख़्सों का अम्बार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

पल में रूप,
पल स्वरूप,
ऐसे सच-झूठ का नक़ाब बुनता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जितना घावों में ठीक लगे,
उतना ही गुनगुना लेता है,
ऐसे ही नग़मों की आवाज़ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
-राहुलदेव गौतम

Tuesday, June 18, 2019

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम .....हरिपाल सिंह रावत

उकेर लूँ, काग़ज़ पर,
जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
बस...
क़लम, काग़ज़, स्याही...
और तुम,
मैं बह जाऊँ... भावों में, 
अहा!
जो तू‌ आये...

भाव... 
रचना की आत्मा से मिल,
बुन आयें, पश्मीनी... 
ख़्वाबों का स्वेटर,
ओढ़ता फिरूँ जिसे, 
दर्द की सर्द सहर में,
जो दे जाए सर्द में गरमाहट... 
दर्द में राहत, 
अहा!

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम

जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
-हरिपाल सिंह रावत

Monday, June 17, 2019

इंसानियत का आत्मकथ्य .........अनुपमा पाठक

गुज़रती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आए
कितने ही दलदल
पर झेल सब कुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

अट्टालिकाएँ करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूँ
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

जब-जब हारा तुम्हारा विवेक
आए राह में रोड़े अनेक
तब-तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !
-अनुपमा पाठक
जमशेदपुर, झारखण्ड

Sunday, June 16, 2019

ये घट छलकता ही रहेगा ......निधि सक्सेना

मेरी ही करुणा पर
टिकी है ये सृष्टि ..
मेरे ही स्नेह से 
उन्मुक्त होते हैं नक्षत्र..
मेरे ही प्रेम से
आनंद प्रस्फुटित होता है ..
मेरे ही सौंदर्य पर 
डोलता है लालित्य ..
और मेरे ही विनय पर 
टिका है दंभ..

कि प्रेम स्नेह और करुणा का अक्षय पात्र हूँ मैं 
जितना उलीच लो 
ये घट छलकता ही रहेगा ..
-निधि सक्सेना

Saturday, June 15, 2019

घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में - यशु जान

पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

पहली अशुद्धि सच लिखना, 
है दूसरी इनका ना बिकना, 
चोर ना छिप सकता है इनके गांव में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

तीसरी अशुद्धि चुभते शब्द, 
इनमें सब कुछ है उपलब्ध, 
जो होना चाहिए देश के इन युवाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

और पांचवीं इनमें देश-भक्ति, 
छटी तेरे गुरुदेव की शक्ति, 
छिपा बहुत कुछ है इनकी अदाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

सातवीं इनका जोश दिखाना, 
आठवीं सच पर मर मिट जाना, 
यशु जान तू मरेगा सब खताओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में, 
पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में - 
-यशु जान
यशु जान एक पंजाबी कवि और लेखक हैं। वे जालंधर शहर के रहने वाले हैं। उन्हें बचपन से ही कला से प्यार है। आप गीत, कविता और ग़ज़ल विधा में लिखते है | आपकी एक पुस्तक 'उत्तम ग़ज़लें और कविताएं' नाम से प्रकाशित हो चुकी है | फिलहाल आप जे. आर. डी. एम. कंपनी में बतौर स्टेट हैड बतौर काम कर रहे हैं |

Friday, June 14, 2019

सिखाया गया बहना धीरे धीरे ....निधि सक्सेना

बचपन से ही मुझे पढ़ाये गए थे संस्कार
याद कराई गईं मर्यादाएँ
हदों की पहचान कराई गई 
सिखाया गया बहना
धीरे धीरे 
अपने किनारों के बीच
तटों को बचाते हुए..
मन की लहरों को संयमित रख कर 
दायित्व ओढ़ कर बहना था 
आवेग की अनुमति न थी मुझे
अधीर न होना था 
हर हाल शांत रहना था ..

उमड़ना घुमड़ना नहीं था 
धाराएँ नहीं बदलनी थीं 
हर मौसम ख़ुद को संयमित रखना
मुझसे किनारे नहीं टूटने थे
मुझसे भूखंड नहीं टूटने थे 
मुझसे भूतल नहीं टूटने थे

कि मैं तो टूट कर प्रेम भी न कर पाई..
-निधि सक्सेना