Tuesday, June 27, 2017

"अनंत का अंत"......प्रगति मिश्रा 'सधु'









शब्द अथाह है, अपार है, अनंत है l
पर...उस "अनंत का अंत" शब्द मेरा है l
हर शब्द में एक कशिश ~~~~
एक नया उन्माद होता है
शब्द प्रेम है, शब्द अनुभव है 
शब्द तुममें है, शब्द मुझमें है 
शब्द है भाव की काया
शब्द है आँखों की माया
शब्द वाचाल है 
पर ....अनर्गल नहीं 
शब्द सार्थक है, निरर्थक नहीं 
किंतु मेरा शब्द अनन्य है .....
वह मूक है, मौन है 
निस्तेज है, सांकेतिक है वह l
उद्दीपन, आलंबन, स्थाईभावों को 
खुद में समेटे ...आंगिक - रसमयी है 
हाँ !!!! मेरा वह आलौकिक शब्द "नि:शब्द" है l
क्योंकि भाव शब्द का मोहताज नहीं ~~~l












-प्रगति मिश्रा 'सधु'

Monday, June 26, 2017

आजकल की लड़कियाँ.......डॉ. शैलजा सक्सेना

नीता चार साल बाद एम.बी.ए. कर के, अच्छी नौकरी पाकर न्यूयार्क से वापस हाथरस अपने घर पहुँची थी। उसे देख कर पूरा घर उमड़ आया। बड़े भैया, भाभी, और छोटी गुडिया सबसे आगे थे, पीछे से दोनों छोटी बहनें खिली पड़ रहीं थीं। मम्मी और दादी, चाची और उनके दोनों बेटे....सारा घर दरवाज़े पर से ही उसे बाँहों में भरने को तैयार था। भाभी ने आरती उतार कर ही उसे घर के अंदर आने दिया। वह हँस रही थी और शर्मा भी रही थी.."ऐसी कौन सी मेहमान है वो!!"
भाई-बहनों से दस बार लिपटने, गाल नोंचने और बाल खींचने के बाद भी किसी को तृप्ति नहीं हो रही थी। अटैची खुलने के साथ तो समां और बदल गया। किसी को वह कुछ देती तो दूसरा उसके पीछॆ भागता..कमरों के बीच बने, अंदर वाले आँगन में सबकी ख़ूब दौड़ भाग हो रही थी। वह भी सब के साथ बच्ची बन गई, चार साल का विदेशीपन, ऊँची पढ़ाई, ऑफ़िस का अच्छा पद, उस सब से जुड़ी सारी गंभीरता..चार पलों में उड़न-छू! भागा-दौड़ी के बीच ही उसे दादी के वो शब्द सुनाई दिये थे, जो वो माँ से कह रही थीं, "बहू! नीता को ज़रा नब (झुक) के चलने को कहो, पहाड़ सी यहाँ से वहाँ डोल रही है, लड़की की जात, उस पर से भारी पढ़ाई! ऐसे छाती निकाल के चलेगी तो लोग क्या कहेंगे? शादी के टोटे पड़ेंगे सो अलग, आजकल की लड़कियाँ भी बस....!!" दादी इसके बाद भी उसकी चिंता में बुदबुदाती रहीं।
नीता ने सुना! उसे लगा,घर की दीवारों ने सुना, आँगन ने सुना, भाई-बहनों ने भी सुना,रसोई ने सुना...वह हतप्रभ रह गई। फिर वह भाई-बहनों के खेल में भाग नहीं ले सकी। यह बात वो बचपन से सुनती आ रही है दादी से.. "ज़रा नब के चलो"!
पर पिछले सालों से वह अमरीका में दूसरी बात सुनती आ रही थी, "सीधे चलो"!
उसकी बॉस अक्सर उसे कहती, "क्या तुम से कोई ग़लती हुई है?"
वह हैरान होकर कहती, "नहीं!!"
"तो झुक कर क्यों बैठती हो?"
वह शर्मिंदा हो कर और सिकुड़ आती। उसकी अफ़सर उसकी "मैन्टोर" (गुरु) भी थीं। कोर्स समाप्त करने के बाद वह "इन्टर्नशिप" के लिये इसी कम्पनी में आई थी और उसका काम इतना अच्छा था कि उसकी अफ़सर ने उसे एक साल बाद जाने नहीं दिया और नौकरी दे दी। काम के साथ काम की प्रस्तुति के बारे में उसने बहुत कुछ "लॉरा", अपनी इस गुरू और अफ़सर से सीखा था। वो अकसर उसे कहतीं,
"तुम्हारे शरीर की भाषा, तुम्हारे बोले हुये शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होती है। अगर तुम झुक कर बैठोगी, खड़ी होगी तो आत्मविश्वास की कमी दिखाई देगी और तुम अच्छा काम करके भी सफल नहीं हो पाओगी। क्या तुम यह बर्दाश्त कर पाओगी कि तुम्हारा "इम्प्रेशन"(प्रभाव) अच्छा न पड़े?
नहीं! असफलता का कोई विकल्प नहीं है उसके लिये। नीता ने बहुत मेहनत करी है इस पड़ाव तक आने के लिए, अब इस एक छोटी सी बात के लिये वह अपनी सफलता के सपनों को दाँव पर नहीं लगा सकती!
पर तब भी बहुत कोशिशों के बाद भी वह आदतन झुक जाती। बहुत लम्बा समय लगा उसे और "लॉरा" उसे बराबर समझाती, टोकती रही, बिल्कुल दादी की तरह मगर बिल्कुल उल्टी बात के लिये।
और बाद में दोबारा शर्मिंदा हुई थी वह यह जान कर कि उसकी गर्दन और पीठ का तेज़ दर्द केवल इसलिये था क्योंकि वह सीधे नहीं चलती, सीधी नहीं बैठती।
माँ जानती हैं कि उसे किस दर्द और परेशानी से गुज़रना पड़ा था, कितनी रातें हीटिंग पैड पर गुज़ारनी पड़ी थीं! माँ जानती थी कि ऑफ़िस में भी उसे इस बात के लिये टोका जाता है। फोन पर अक्सर वो नीता की बातें सुनकर रुआँसी हो जातीं कि तू इतनी दूर है कि मैं वहाँ आकर तेरी कुछ मदद भी नहीं कर पा रही हूँ। पापा भी यह सब जानते थे..शायद सभी थोड़ा बहुत उसके दर्द के बारे में जानते थे..शायद दादी भी! पर दादी तो दादी हैं..घर की प्रमुख नियंत्रक..कड़क महिला...आज तक किसी ने उनसे पलट कर कुछ नहीं कहा पर उनकी डाँट से सब घबराते थे। बहुत ज़ोर से डाँटती थीं वो।
माँ ने भी उनकी यह बात सुनी, वो कुछ कहने जा रही थीं, कि उन्होंने नीता को हतप्रभ सा खड़ा देखा तो पहले उसके पास आ गईं! नीता के आँखों में एक भाव आता था, एक जाता था! इतनी छोटी सी बात लगती है, सीधे खड़े रहना, सीधे बैठना पर जिसे हमेशा झुक कर चलने को कहा गया हो, उसके लिये सीधे चलने की आदत डालना कितना कठिन होता है, वह जानती है! लॉरा हमेशा कहती.. "इट वोंट हैपन अंटिल यू डू इट (यह तभी होगा जब तुम करोगी)।"
इतनी कोशिशों के बाद उसे अभ्यास हुआ था सीधे बैठने, खडे होने का! और अब...
माँ ने उसे कंधे से घेर लिया, और दादी के पास आते हुए सधी आवाज़ में कहा, "माता जी, नीता को सीधे ही चलना है, सीधा खड़ा रहना है, सीधे ही बैठना है। किसी को अगर इस कारण हमारी लड़की पसन्द नहीं आती तो यह उनकी समस्या है, अब यह कभी झुक कर नहीं चलेगी!"
ड्यौढ़ी पार कर भीतर आते हुये पापा और चाचा ने माँ की बात सुनी, दादी ने भी हैरानी से सुना। आँगन ने सुना, घर की दीवारों ने सुना, बच्चों ने सुना, चौके में चाय बनाती चाची ने सुना..पहली बार नीता ने सुना ..और पाया कि उसकी माँ उस से भी कहीं ज़्यादा सीधी खड़ी है!
-डॉ. शैलजा सक्सेना

Sunday, June 25, 2017

ऐसा प्रेम मिला ही नहीं..........वन्दना गुप्ता

प्रेम के पनघट पर सखी री
कभी गागर भरी ही नही
मन के मधुबन मे
कोई कृष्ण मिला ही नही

जिसकी तान पर दौडी जाऊँ
ऐसी बंसी बजी ही नही
किस प्रीत की अलख जगाऊँ
ऐसा देवता मिला ही नही

किस नाम की रट्ना लगाऊँ
कोई जिह्वा पर चढा ही नही
कौन सी कालिन्दी मे डूब जाऊँ
ऐसा तट मिला ही नही

जिसके नाम का गरल पी जाऊँ
ऐसा प्रेम मिला ही नहीं
वो जोगी मिला ही नही
जिसकी मै जोगन बन जाऊँ

फिर कैसे पनघट पर सखी री
प्रीत की मैं गागर भर लाऊँ
- वन्दना गुप्ता

Saturday, June 24, 2017

''शेष क्या रहना है''....सविता चड्ढा













भान हो जाता है जब यह 
''शेष क्या रहना है''
जीवन और यथार्थ,
यथार्थ और  कल्पना,
कल्पना और सच के अंतर 
दृष्टव्य हो जाते है जब,
तब शून्य रह जाती है
मन की लहरों की चंचलता,
नेति नेति का ज्ञान हो जाता है ,
टूट जाती हैं व्यर्थ सीमाएं
बंधन रहित  हो जाता  तन मन ।
तब शांतचित्त नीला आसमान,
हरी भरी फूलों से लदी सारी धरती,
चांद, तारें,सूरज और 
विश्व के सभी नक्षत्र,
मेरी धरोहर हो जाते हैं।








-सविता चड्ढा
अनहद कृति से

Friday, June 23, 2017

प्रतिभा बहुत है.....निधि सक्सेना









एक दिन हमारे हाथ की रेखाएं पढ़ कर
एक ज्योतिष महाराज कहने लगे
प्रतिभा बहुत है
परंतु रेखायें इंगित कर रही हैं 
यश और गौरव नही हैं
प्रशस्ति लौट लौट जाती है
बृहस्पति बहुत हल्का है
वही कीर्ति रोक रहा है..

पुखराज पहने तर्जिनी में
भाग्य घुटनों के बल चल कर आएगा
सोया बृहस्पति जागेगा..
हमनें सोचा
वो भाग्य ही क्या
जिसे कोई पत्थर जगाये

अगर भाग्य हमारा है
और हमें उसे जगाने की इच्छा है
तो यथेष्ट कर्म भी हमें ही करने होने..

अगर हमारा भाग्य एक छोटा सा पत्थर जगा सकता है
तो हम क्यों नही..
वैसे भी अपने भाग्य को जगाने सुलाने की
और फल निष्फल की जिम्मेदारी
हमारी है 
बेचारे पुखराज की थोड़ी है..

सो हमने रेखाओं पर एक दॄष्टि डाली 
महाराज को प्रणाम किया
हाथ झाड़ा और चले आये...
अपने यश की तृष्णा के लिए
आँखो पर पट्टी बाँध
किसी पत्थर का अनुगामी बनना 
हमे मंज़ूर नही...
~निधि सक्सेना

Thursday, June 22, 2017

इस कठिन समय में .....परितोष कुमार 'पीयूष'



इस कठिन समय में
जब यहाँ समाज के शब्दकोश से
विश्वास, रिश्ते, संवेदनाएँ
और प्रेम नाम के तमाम शब्दों को
मिटा दिये जाने की मुहिम जोरों पर है 

तुम्हारे प्रति मैं 
बड़े संदेह की स्थिति में हूँ
कि आखिर तुम अपनी हर बात
अपना हर पक्ष
मेरे सामने इतनी सरलता
और सहजता के साथ कैसे रखती हो

हर रिश्ते को निश्छलता के साथ जीती
इतनी संवेदनाएँ कहाँ से लाती हो तुम 
बार-बार उठता है यह प्रश्न मन में
क्या तुम्हारे जैसे और भी लोग
अब भी शेष हैं इस दुनिया में

देखकर तुम्हें
थोड़ा आशान्वित होता हूँ 
खिलाफ मौसम के बावजूद
तुम्हारे प्रेम में
कभी उदास नहीं होता हूँ

-परितोष कुमार 'पीयूष'

Wednesday, June 21, 2017

चुप..........भास्कर चौधुरी









पिता के पिता ने कहा
पिता से
चोप्प
दुबक गए पिता
किताबों की अलमारी के पीछे

पिता ने मुझसे कहा
चुप
मैंने दरवाजा खोला
बाहर निकल गया घर से
और  बाहर ही रहा
खाने के वक्त तक
घूमता रहा इधर-उधर
बेमतलब

मैंने बेटी से कहा
चुप्प
उसने पलट कर जवाब दिया !!
-भास्कर चौधुरी