Monday, October 21, 2019

पता नहीं कितनी पुरानी रचना है ...डॉ. कुमार विश्वास

जब भी मुंह ढक लेता हूं, 
तेरे जुल्फों की छांव में.
कितने गीत उतर आते हैं, 
मेरे मन के गांव में!

एक गीत पलकों पे लिखना, 
एक गीत होंठो पे लिखना.
यानी सारे गीत हृदय की, 
मीठी चोटों पर लिखना !

जैसे चुभ जाता है 
कांटा नंगे पांव में.
ऐसे गीत उतर आता है, 
मेरे मन के गांव मे !

पलके बंद हुई जैसे, 
धरती के उन्माद सो गए.
पलकें अगर उठी तो जैसे, 
बिना बोले संवाद हो गए. !

जैसे धूप चुनरिया ओढ़े, 
आ बैठी हो छांव में.
ऐसे गीत उतर आता है, 
मेरे मन के गांव मे.!!
-डॉ. कुमार विश्वास

Sunday, October 20, 2019

अपनी-अपनी रात का मातम मनाओ ...आबिद

अपने-अपने दर्द का किस्सा सुनाओ,
रात भर देगी वगरना सबके घाव।

कुछ सुलाओ आरज़ू को कुछ जगाओ,
घटती-बढ़ती टीस की लज़्ज़त उठाओ।  

फिर कोई टहनी कोई पत्ता हिलाओ,
ऐ मेरे ख़्वाबरो जंगल की हवाओ।

या किसी सूरज का रस्ता रोक लो,
या किसी तारीक़ शब में डूब जाओ।

आज इसे कमरे से बाहर फेंक दो,
कल इसी को ला के कमरे में सजाओ।

ओढ़ लो या कोई दस्ते-ख़ामोशी,
या किसी बहरी सदा में डूब जाओ।

अपने-अपने ख़्वाब का मलबा लिए,
अपनी-अपनी रात का मातम मनाओ।

या उड़ो वहशी बग़ूलों की तरह,
या किसी पत्थर में छुप के बैठ जाओ।

'रामनाथ चसवाल (आबिद आलमी)'

Saturday, October 19, 2019

अतिथि......रचना दीक्षित


कुछ समय से
घर भर गया है
मेहमानों से.
घर ही नहीं 
शरीर, मन, मस्तिष्क
चेतन, अवचेतन.
ये मात्र मेहमान नहीं
मेहमानों का कुनबा है.
सोचती हूँ
मन दृढ करती हूँ 
आज पूंछ ही लूँ 
अतिथि
तुम कब जाओगे
पर संस्कार रोक लेते है.
ये आते जाते रहते है 
पर क्या मजाल
कि पूरा कुनबा
एक साथ चला जाये
शायद उन्हें डर है 
उनकी अनुपस्थिति में 
वो धरोहर जो मुझे सौंपी गई,  
वो किसी और के 
नाम न लिख दी जाय.
हाँ! चिंता, दुःख,
इर्ष्या, डर और 
इनकी भावनाएं 
मेरे मस्तिष्क में
स्थायी निवास कर रही हैं....!!


लेखक परिचय - रचना दीक्षित 

Friday, October 18, 2019

मेरी हथेलियां दायरे बनाती हैं.....सीमा सिंघल सदा


ये बिखराव कैसा है
जिसे समेटने के लिए
मेरी हथेलियां दायरे बनाती हैं
फिर कुछ समेट नहीं पाने का
खालीपन लिये
गुमसुम सी मन ही मन आहत हो जाती हैं
अनमना सा मन
ख्यालों के टुकड़ों को
उठाना रखना करीने से लगाना
सोचना आहत होना
फिर ठहर जाना
..........
मन का भारी होना जब भी
महसूस किया
तुम्हारा ही ख्याल सबसे पहले आया
तुम कैसे जीते हो हरपल
बस इतना ही सोचती तो
मन विचलित हो जाता
इक टूटे हुए ख्याल ने आकर
मुझसे ये पूछ लिया
इन टुकड़ों में तुम भी बंट गई हो
मैं मुस्करा दी जब आहत भाव से
वो बनकर आंसू
बिखर गया मेरी हथेलियों में !!


लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा 

Thursday, October 17, 2019

चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे ...निदा फ़ाजली

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक 
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा 

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो 
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे 

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिए 
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई 

तुम से छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था 
तुम को ही याद किया तुम को भुलाने के लिए 

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई 
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई 

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी 
और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है 

सब कुछ तो है क्या ढूँडती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता 

उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था 
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला 

दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती 
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती 

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया 
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया 

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने 
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है 

ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई 
जो आदमी भी मिला बन के इश्तिहार मिला 
-निदा फ़ाजली

Wednesday, October 16, 2019

जांबाज़....अफ़ज़ल अलाहाबादी

चांद तारों का वो हमराज़ नहीं हो सकता,
ख़ुद से माइल-ए-परवाज़ नहीं हो सकता

मेरे जैसा तेरा अंदाज नहीं हो सकता
इक कबूतर कभी शाहबाज़ नहीं हो सकता

अज़्म फ़रहाद जो रखता नहीं अपने दिल में
वो ज़ुनु-ख़ेजी में मुमताज़ नहीं हो सकता

तू ही रखता है हर राज़ मेरा पोशीदा,
तेरे जैसा कोई हमराज़ नहीं हो सकता.

मुझको जो कुछ भी मिला ये है इनायत तेरी,
अपनी कोशिश पे मुझे नाज़ नही हो सकता.

सर को अपने जो हथेली पे रख ले अफ़ज़ल,
मेरी नज़रों में वो जांबाज़ नहीं हो सकता.
-अफ़ज़ल अलाहाबादी

Tuesday, October 15, 2019

दीपक दम तोड़ रहा है..कुसुम कोठारी

चारों तरफ कैसा तूफान है
हर दीपक दम तोड़ रहा है !


इंसानों की भीड जितनी बढी है 

आदमियत  उतनी ही नदारद है !


हाथों मे तीर लिये हर शख्स है

हर नजर नाखून लिये बैठी है !


किनारों पे दम तोडती लहरें है

समंदर से लगती खफा खफा है !


स्वार्थ का खेल हर कोई खेल रहा है

मासूमियत लाचार दम तोड रही है !


शांति के दूत कहीं दिखते नही है

हर और शिकारी बाज उड रहे है !


कितने हिस्सों मे बंट गया मानव है

अमन ओ चैन मुह छुपा के रो रहा है !!


-- कुसुम कोठारी