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Monday, January 7, 2019

मेरे पर निकलने लगते हैं..........राहत इन्दोरी

पुराने शहर के मंजर निकलने लगते है 
ज़मी जहा भी खुले, घर निकलने लगते है

मैं खोलता हूँ सदफ मोतियों के चक्कर में 
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते है 

हसीन लगते है जाडो में सुबह के मंजर 
सितारे धूप पहन कर जब निकलने लगते हैं 

बुरे दिनो से बचाना मुझे मेरे मौला 
करीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं

बुलन्दियो का तसव्वुर भी खुब होता हैं 
कभी-कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं 

अगर ख्याल भी आए कि तुझको खत लिखू 
तो घोसले से कबूतर निकलने लगते हैं। 
- राहत इन्दोरी

Sunday, April 16, 2017

आँखों में हैं जंतर-मंतर......राहत इन्दोरी


उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से रूठे-रूठे हैं
चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर वह भी कहाँ अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब

आखिर मै किस दिन डूबूँगा फ़िक्रें करते है
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब
- राहत इन्दोरी