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Wednesday, June 19, 2019

जीवन बड़ा रचनाकार है ....राहुलदेव गौतम

जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
असत्य के शब्दों से,
सत्य का अर्थ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो कभी शाश्वत हुआ न हो,
ऐसे कल्पनाओं का भरमार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो बिखरा हुआ है,
ख़ुद ज़िम्मेदारियों के शृंखला में,
वो टूटे हुए सपनों का हार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

फँस जाते है स्वयं इसमें,
लक्ष्यों का अरमान,
ऐसे जालों का जंजाल रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

ख़ुद में खो जाता है,
ख़ुद में पा जाता है,
ऐसे इच्छाओं का संसार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जिससे मतलब की बात निकले,
जितना जिससे परिहास निकले,
ऐसे शख़्सों का अम्बार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

पल में रूप,
पल स्वरूप,
ऐसे सच-झूठ का नक़ाब बुनता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जितना घावों में ठीक लगे,
उतना ही गुनगुना लेता है,
ऐसे ही नग़मों की आवाज़ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
-राहुलदेव गौतम

Monday, June 3, 2019

बेचैन आवाज़ .....राहुलदेव गौतम

अफ़सोस किस बात का करूँ,
दिल तो मिला था पलभर,
लेकिन विचार नही मिले थे पल भर।

किसी से भी किसी तरह नहीं,
दुनिया की खब़र वो देकर चले गये,
उन्हें कानों-कान ख़बर नहीं चला,
हम उनके लिए कितने दर्द सह गये।

वो समभाव था या डर था,
एक को समझकर वो रुक गये,
एक को हम अपनाकर चलते-चले गये।

 फूल भी नहीं थे तो अंगारे भी नहीं थे,
वो जो थे वो थे ही,
जो बचा इनमें से दूसरा,
उससे जल कर हम राख़ हो गये।

जीवन का झंझावत हमें दूर रखता है,
फिर से उनके हिसाब से जीने में,
जो मैं पहले था उसी तरह जीते चले गये।

न कल्पना में कुछ था,
न हक़ीक़त में कुछ हाथ लगा,
मैं खाली था हम खाली रह गये।
-राहुलदेव गौतम