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Sunday, September 2, 2018

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'

रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

-अमित जैन 'मौलिक'

Monday, May 7, 2018

हर उम्र को जीना चाहती हूँ.....निधि सिंघल

जब भी यह सवाल कोई पूछता है,
मैं सोच में पड़ जाती हूँ,

बात यह नहीं, कि मैं,
उम्र बताना नहीं चाहती हूँ,
बात तो यह है, की,
मैं हर उम्र के पड़ाव को,
फिर से जीना चाहती हूँ,
इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ,

मेरे हिसाब से तो उम्र,
बस एक संख्या ही है,

जब मैं बच्चो के साथ बैठ,
कार्टून फिल्म देखती हूँ,
उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ,
उन्ही की तरह खुश होती हूँ,
मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ,

और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ,
तब मैं किशोरी बन जाती हूँ,

जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ,
उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ,

दरअसल मैं एकसाथ,
हर उम्र को जीना चाहती हूँ,

इसमें गलत ही क्या है?
क्या कभी किसी ने,
सूरज की रौशनी, या,
चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी?

या फिर खल खल करती,
बहती नदी की धारा से उम्र पूछी?

फिर मुझसे ही क्यों?

बदलते रहना प्रकृति का नियम है,
मैं भी अपने आप को,
समय के साथ बदल रही हूँ,

आज के हिसाब से,
ढलने की कोशिश कर रही हूँ,

कितने साल की हो गयी मैं,
यह सोच कर क्या करना?

कितनी उम्र और बची है,
उसको जी भर जीना चाहती हूँ,

एकदिन सब को यहाँ से विदा लेना है,
वह पल, किसी के भी जीवन में,
कभी भी आ सकता है,

फिर क्यों न हम,
हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ले,
हर उम्र को फिर से, एक बार जी ले..

-निधि सिंघल

Saturday, October 28, 2017

ख़्वाब कोई मचल रहा होगा....अमित जैन 'मौलिक'

नींद में चांद चल रहा होगा
ख़्वाब कोई मचल रहा होगा.

हूक़ उठती है दिल लरज़ता है
कोई कहके बदल रहा होगा.

वो हवाओं से बैर क्यों लेगा
जो चिरागों सा जल रहा होगा.

आँख नींदों से भर गया कोई
ख़्वाब नैनों में मल रहा होगा.

आप आये बड़ी नवाज़िश है 
आपका दिल पिघल रहा होगा.

इन मुंडेरों पे चाँद खिलता था
ख़ूबसूरत वो पल रहा होगा.

हाँ यहीं पर बना है ताज़महल
हाथ हाथों में कल रहा होगा.

दिन ढला फिर वही कयामत है
दिल मचलकर संभल रहा होगा.

Monday, October 16, 2017

माँ चुप रह जाती है...............अमित जैन 'मौलिक'

मेरे हालात को मुझसे, पहले समझ जाती है
माँ अब कुछ नहीं कहती, चुप रह जाती है।

तब भी मुस्कराती थी, अब भी मुस्कराती है
माँ चुप रहकर भी, बहुत कुछ कह जाती है।

एक वक्त था जब सब, माँ ही तय करती थी
अब क्या तय करना है, तय नहीं कर पाती है।

तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।

जिसे दुश्वारियों के, तूफ़ान भी ना हिला पाये हों
वो अपने बच्चे के, दो आँसुओं में बह जाती है।

मेरी माँ कभी मेरी, जेबें खाली नहीं छोड़ती 
पहले पैसे भरती थी, अब दुआयें भर जाती है।

Thursday, October 12, 2017

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'


रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

Friday, October 6, 2017

आतुरता......अमित जैन 'मौलिक'


आतुरता का
व्याकुलता की ओर
यह प्रवाह
आह!!
गुमान ही ना था
कोई अनुमान ही ना था।
लज़्ज़त के गगन से
टप्प टप्प बूँद गिरती रही
हृदय के रजत कटोरे में
चुपके से, लबालब 
चांदनी भरती रही।
जब तंद्रा टूटी 
तो देखा
विदीर्ण हो गई
किन्तु-परंतु की रेखा
जब होश आया तो देखा
पीयूष से भर गया घट
लहक उठा आलम
ख़यालों में था मन
अधखुले नयनों के
बंद ही न होते पट।
क्या छुआ
जो यूँ हुआ
ये वज़ूद तो
तने की तरह तना था
बेपरवाह लापरवाह
स्वयं में मुग्ध।
घट का पीयूष पिया
तो समझा 
अब तक क्या जिया।
खुरदुरेपन में फूटे 
नवीन अंकुर
निकल आईं शाखायें
अब मैं हरा भरा हूँ
हाँ एक जगह ही खड़ा हूँ,
लेकिन तुम थोड़ा और 
उतंग करो अपना उफान
मैं छू लूंगा तुम्हारे तरंगित
अस्तित्व को, 
झुक कर-झुकाकर 
अपनी शाखायें,
हो जाऊँगा तरबतर।
उम्मीदें बढ गईं हैं
कि अब जी लूंगा
देर सवेर ही सही
मैं अमृत पी लूंगा।
- अमित जैन 'मौलिक'

Tuesday, October 3, 2017

प्रश्न तो है!....... अमित जैन 'मौलिक'

चरित्र और मर्यादा!
जिसने भी गढ़े होंगे ये शब्द,
बड़ा व्यापक हेतु रहा होगा।
शायद आचार का निर्धारण
और निष्ठा का पालन कहा होगा।
प्रतिपादित किये गये होंगे
सम्भवतः ‘सर्व गुण संपन्न’
मदांध-नियंताओं और 
सामंतो के लिये।
किन्तु थोप दिये गये,
पुरुषों के पैरोकारों द्वारा,
कुशलतापूर्वक स्त्रियों पर।
समर्थन मिलना ही था, मिला
और समय के साथ बन गया
यह एक अपरिहार्य संस्कार, 
नाम दे दिया गया संस्कृति का
परिप्रेक्ष्य विलुप्त है, क्यों भला ?
प्रश्न तो है, पर अनुत्तरित, 
सदा की तरह।

विषय संवेदनशील है 
और इतिहास भी, 
सिहरन उठती है
यदि पलट लें कभी 
पन्ने उन किताबों के
जिनमें भरे पड़े हैं 
किस्से अतिवाद के
उत्पीड़न के, विलासता के।
सन्धि का उपहार स्त्री
जुये में दाव स्त्री
सत्ता का विस्तार स्त्री
युद्ध का संहार स्त्री
संभवतः 
बहुमूल्य वस्तु की भांति 
प्रबंधन किया जाता होगा 
स्त्रियों का।
जैसे अन्य भौतिक मूल्यवान 
वस्तुओं का किया जाता था
स्वयं का मूल्य बढ़ाने हेतु
जिससे अहम की तुष्टि तो हो ही, 
समर्थता की भी पुष्टि हो
वस्तुतः सामर्थ्य ही तो सबलता 
को सत्यापित करता था
शायद शासन करना, 
नियंता बनना
यही अंतिम शगल है 
पुरुष जाति का, क्यों भला ?
प्रश्न तो है, पर अनुत्तरित, 
सदा की तरह।
-अमित जैन  'मौलिक'