Showing posts with label अज्ञात. Show all posts
Showing posts with label अज्ञात. Show all posts

Tuesday, September 22, 2020

इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता ....अज्ञात

इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता ....अज्ञात 

मस्जिद पे गिरता है
मंदिर पे भी बरसता है..
ए बादल बता तेरा मजहब कौन सा है........।।

इमाम की तू प्यास बुझाए
पुजारी की भी तृष्णा मिटाए..
ए पानी बता तेरा मजहब कौन सा है.... ।।

मज़ारों की शान बढाता है
मूर्तियों को भी सजाता है..
ए फूल बता तेरा मजहब कौन सा है........।।

सारे जहाँ को रोशन करता है
सृष्टि को उजाला देता है..
ए सूरज बता तेरा मजहब कौन सा है.........।।

मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है
हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है..
ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौन सा है......।।

ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर,
इंसान बनो
क्योंकि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता... ।।

-रचनाकार 

अज्ञात

Thursday, May 14, 2020

औरतें बहुत बुरी होती है, जब वे खड़ी होकर बोलने लगती हैं ...अज्ञात

कई दिनो से पीठ में बहुत दर्द था
डाक्टर ने कहा
अब और
झुकना मत
अब और झुकने की
गुंजाइश नहीं
तुम्हारी रीढ की हड्डी में गैप आ गया है
सुनते ही उसे
हँसी और रोना
एक साथ आ गया..

ज़िंदगी में पहली बार
वह किसी के मुँह से
सुन रही थी
ये शब्द ...

बचपन से ही वह
घर के बड़े, बूढ़ों
माता-पिता
और समाज से
यही सुनती आई है,
झुकी रहना...

औरत के
झुके रहने से ही
बनी रहती है गृहस्थी..
बने रहते हैं संबंध
प्रेम..प्यार,
घर परिवार
वो
झुकती गई
भूल ही गई
उसकी कोई रीढ भी है..
और ये आज कोई
कह रहा है
झुकना मत..

वह परेशान सी सोच रही है
कि क्या सच में
लगातार झुकने से रीढ की हड्डी
अपनी जगह से
खिसक जाती हैं
और उनमें
खालीपन आ जाता है..

वह सोच रही है...
बचपन से आज तक
क्या क्या खिसक गया
उसके जीवन से
बिना उसके जाने समझे...

उसका खिलंदड़ापन,
अल्हड़पन
उसके सपने
उसका मन
उसकी चाहत..
इच्छा, अनिच्छा
सच
कितना कुछ खिसक गया
जीवन से..

क्या वाकई में औरत की
रीढ की हड्डी बनाई है भगवान ने
समझ नहीं आ रहा.....
-अज्ञात
साभार :- Womaniya