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Wednesday, May 3, 2017

चाँद बोला चाँदनी....गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"



चाँद बोला चाँदनी, चौथा पहर होने को है,
चल समेटें बिस्तरे वक़्ते सहर होने को है।

चल यहाँ से दूर चलते हैं सनम माहे-जबीं,
इस ज़मीं पर अब न अपना तो गुज़र होने को है।

गर सियासत ने न समझा दर्द जनता का तो फिर,
हाथ में हर एक के तेग़ो-तबर होने को है।

जो निहायत ही मलाहत से फ़साहत जानता,
ना सराहत की उसे कोई कसर होने को है।


है शिकायत, कीजिये लेकिन हिदायत है सुनो,
जो क़बाहत की किसी ने तो खतर होने को है।


पा निजामत की नियामत जो सखावत छोड़ दे,
वो मलामत ओ बगावत की नज़र होने को है।

शान "हिन्दुस्तान" की कोई मिटा सकता नहीं,
सरफ़रोशों की न जब कोई कसर होने को है।

-गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"
(कवि एवं साहित्यकार)
अजमेर (राजस्थान)
gdsharma1970@gmail.com

तेग़ो-तबर ::तलवार और फरसा (कुल्हाड़ी), मलाहत ::उत्कृष्टता, फ़साहत ::वाक्पटुता,सराहत :: स्पष्टता, क़बाहत ::खोट,अश्लीलता, ख़तर ::ख़तरा, निज़ामत :: प्रबंधन, नियामत (नेमत)::वरदान, सख़ावत ::सज्जनता, मलामत ::दोषारोपण, बग़ावत :: विद्रोह


Friday, April 28, 2017

शमशीर हाथ में हो....गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"

शमशीर हाथ में हो ओ तमाम तक न पहुँचे।
बुजदिल बड़ी सियासत जो नियाम तक न पहुँचे॥


सतसंग की परीक्षा जिस ने भी पास कर ली।
मुमकिन नहीं कि फिर वो घनश्याम तक न पहुँचे॥

शिकवा करूँ मैं कैसे कि जवाब क्यों न आया।
गुमनाम सारे ख़त थे गुलफ़ाम तक न पहुँचे॥


अब रोक दे ओ मालिक सब गर्दिशें ख़ला की।
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे॥

जब ओखली में पूरा सर ही फँसा दिया तो।
मुगदर से क्यों कहें कि अंजाम तक न पहुँचे॥

"हिन्दोस्तां" भी या रब कब तक बचा सकेगा।
जो ये तार तार खेमे ख़य्याम तक न पहुँचे॥
-गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"

नियाम = म्यान, गुलफ़ाम =फूल का रंग

Thursday, March 23, 2017

चाँद बोला चाँदनी....गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"

चाँद बोला चाँदनी, चौथा पहर होने को है,
चल समेटें बिस्तरे वक़्ते सहर होने को है।

चल यहाँ से दूर चलते हैं सनम माहे-जबीं,
इस ज़मीं पर अब न अपना तो गुज़र होने को है।

गर सियासत ने न समझा दर्द जनता का तो फिर,
हाथ में हर एक के तेग़ो-तबर होने को है।
तेग़ो-तबर=तलवार और फरसा (कुल्हाड़ी)

जो निहायत ही मलाहत से फ़साहत जानता,
ना सराहत की उसे कोई कसर होने को है।
मलाहत=उत्कृष्टता; फ़साहत=वाक्पटुता; सराहत=स्पष्टता

है शिकायत, कीजिये लेकिन हिदायत है सुनो,
जो क़बाहत की किसी ने तो खतर होने को है।
क़बाहत=खोट;अश्लीलता; ख़तर=ख़तरा

पा निजामत की नियामत जो सखावत छोड़ दे,
वो मलामत ओ बगावत की नज़र होने को है।
निज़ामत=प्रबंधन; नियामत (नेमत)=वरदान;
सख़ावत=सज्जनता; मलामत=दोषारोपण; बग़ावत=विद्रोह

शान "हिन्दुस्तान" की कोई मिटा सकता नहीं,
सरफ़रोशों की न जब कोई कसर होने को है।

गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"
(कवि एवं साहित्यकार)
अजमेर (राजस्थान)
gdsharma1970@gmail.com