श्वेता बहन ने
दर्द को मेरे
किया महसूस
हलका किया
मेरी पीड़ा को
तन-मन के दाह को
पोछा मेरे बह रहे
अश्रु को...
हृदय से आभारी हूँ..
सादर...
प्रस्तुत है
दर्द बेहिसाब मिले ऐ ज़िदगी तुझसे
जीने का हौसला न तोड़ पाये
जितनी बार दुखा तन मन,
मेरा असहनीय पीड़ाओ से,
व्यथित हृदय के बोझ से
डबडबाये नयन,
पीर की बदरी भरी
बहे कराहकर आँसू जब भी
अश्कों को व्यर्थ न बहने दिया
बंजर सूखे माटी पर बोये
असह्य वेदना में झुलसते
मुरझाये बीजों को सींचकर
नव अंकुरण की प्रतीक्षा की
कटे जीवन वृक्ष के शाखों पर
नव पल्लव की आस लिये
तपते धूप को हँसकर स्वीकार किया
साँझ की फीकी रोशनी
जब आँखों में समायी
न खो कर अंधेरों में
जलाकर सारी नकारात्मकता
एक दीप आशाओं का
प्रज्जवलित कर सुख के भोर का
पल पल इंतज़ार किया
मौन पल पल शब्दहीन होकर
अव्यक्त भावों को समेटकर
भरकर लेखनी में
खाली पन्नों को सतरंग किया
ऐ ज़िदगी, तू हार गयी दर्द देकर मुझे
और मैं दर्द सहकर तुझसे जीत गयी
-श्वेता सिन्हा
