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Monday, October 20, 2014

हम ऐसी भी इक हार संभाले हुए हैं..........नवनीत शर्मा

 


 मुस्‍कराहट को जो रुख़सार संभाले हुए हैं
दिल में लगता है कि आज़ार संभाले हुए हैं

दिल के खण्डरात के सब्ज़े में हैं इतनी यादें
कितना कुछ हम भी न बेकार संभाले हुए हैं

धूप, बरसात, हवाओं से बचाती है हमें
हम तेरी याद की दीवार संभाले हुए हैं

क्‍यों भला ग़ैर लगायेगा निशाना मुझपर
काम ये मेरे तरफ़दार संभाले हुए हैं

उठ गये लोग थियेटर हुआ ख़ाली लेकिन
आप अब तक वही किरदार संभाले हुए हैं

बाद जिसके न कोई जीत हमें जीत सकी
ख़ुद में हम ऐसी भी इक हार संभाले हुए हैं

आप अख़लाक़ के पहलू को भी देखें साहब
इससे क्‍या होगा कि दस्‍तार संभाले हुए हैं

मुल्‍क की, कौ़म की क्‍या बात करूं मैं इनसे
ये भले लोग तो घर-बार संभाले हुए हैं

रेगज़ारों की कोई बात न कुछ छालों की
"आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं"

तीरगी हमको है
"नवनीत" ज़िया से बेहतर
रोशनी, सुनते हैं बाज़ार संभाले हुए हैं

नवनीत शर्मा 09418040160

http://wp.me/p2hxFs-1Pi

Tuesday, September 16, 2014

चांद मेरा वक़ील हो जैसे....नवनीत शर्मा

 

उसकी आंखों में झील हो जैसे
प्‍यास ? मुद्दत क़लील हो जैसे

ढूंढना उसको…कोई अंत नहीं
एक सहरा तवील हो जैसे

उसको देखा तो हो गये पत्‍थर
पांव रखना भी मील हो जैसे

सांस लेने में जान जाती है
कोई इतना अलील हो जैसे

फ़ैसला उसके हक़ में होना था
उसका चेहरा दलील हो जैसे

धूप की सब अदालतों के लिए
चांद मेरा वक़ील हो जैसे

उतर आया सलीब से लेकिन
अब तो सब दिल ही कील हो जैसे

ख़ूब दौड़ा कहीं नहीं पहुंचा
दिल-हिरन ही में ढील हो जैसे

उस तक आवाज़ जा नहीं पाती
दरमियां इक फ़सील हो जैसे

डर गया मुश्किलों से इतना मैं
छोटी चिड़िया भी चील हो जैसे

ख़ाब के खो चुके जज़ीरों की
याद ही संगे-मील हो जैसे

-नवनीत शर्मा 09418040160

 http://wp.me/p2hxFs-1Oq