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Friday, February 1, 2019

यादों के दरीचे से........अर्जित पाण्डेय

एक हसीन ख़्वाब
काग़ज़ की तरह मोड़कर
दिल के कमरे में बने 
यादों के दरीचे पर मैंने 
रख दिया है
धूमिल न हो जाए वो पन्ना 
इसलिए अक्सर उसे अपने
आँसुओं से धोता हूँ
उस ख़्वाब को सजाने में
वक़्त की कितनी सीमाएँ लाँघी हमने, 
ये सोचता हूँ
उस पन्ने पर अपने ख़्वाब मैं 
और लिखना चाहता था 
पर ज़माने की पैदा की हुई ठण्ड ने 
मेरी लेखनी की स्याही को जमा डाला 
मैं बेबस लाचार अब उस ख़्वाब को 
लिख नहीं सकता 
पर जब वक़्त के झोंकों से
वो पन्ना 
यादों के दरीचे से हिलता है 
तो मैं उस लिखे हुए ख़्वाब को पढ़ लेता हूँ
-अर्जित पाण्डेय