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Tuesday, July 11, 2017

ऐ ज़िदगी, तू हार गयी दर्द देकर मुझे....श्वेता सिन्हा

श्वेता बहन ने 
दर्द को मेरे 
किया महसूस 
हलका किया 
मेरी पीड़ा को
तन-मन के दाह को
पोछा मेरे बह रहे
अश्रु को...
हृदय से आभारी हूँ..
सादर...
प्रस्तुत है 
उन्हीं की कलम से प्रसवित रचना....





दर्द बेहिसाब मिले ऐ ज़िदगी तुझसे
जीने का हौसला न तोड़ पाये 
जितनी बार दुखा तन मन,
मेरा असहनीय पीड़ाओ से,
व्यथित हृदय के बोझ से
डबडबाये नयन,
पीर की बदरी भरी
बहे कराहकर आँसू जब भी
अश्कों को व्यर्थ न बहने दिया
बंजर सूखे माटी पर बोये
असह्य वेदना में झुलसते
मुरझाये बीजों को सींचकर
नव अंकुरण की प्रतीक्षा की
कटे जीवन वृक्ष के शाखों पर
नव पल्लव की आस लिये
तपते धूप को हँसकर स्वीकार किया
साँझ की फीकी रोशनी
जब आँखों में समायी
न खो कर अंधेरों में 
जलाकर सारी नकारात्मकता
एक दीप आशाओं का
प्रज्जवलित कर सुख के भोर का
पल पल इंतज़ार किया
मौन पल पल शब्दहीन होकर 
अव्यक्त भावों को समेटकर
भरकर लेखनी में
खाली पन्नों को सतरंग किया
ऐ ज़िदगी, तू हार गयी दर्द देकर मुझे
और मैं दर्द सहकर तुझसे जीत गयी

-श्वेता सिन्हा

Friday, July 24, 2015

आगे तो बढ़ !.....................अनुज तिवारी


राह देखती ,
तेरे इन्तजार मे ,
राहें भी आज ! १ !

आगे तो बढ़ !
हौसला है तुझमे ,
कदम बढ़ा ! २ !

कन्धे पे जमीं !
आसमान पैरों पे ,
अब दे झुका ! ३ !

दम तोड दे ,
पवन घुटन से ,
गर चाह ले ! ४ !

ऐसी तपन !
जल भी जल जाये ,
गर चाह ले ! ५ !

सूरज को भी !
प्रभा को ताकने की ,
फुर्सत ना हो ! ६ !

घूमना चाहे !
धरती धुरी पर ,
जुर्रत ना हो ! ७ !

हौसला रख !
आग की औकात क्या ,
तुझे जला दे ! ८ !

बस फासला !
चादं हिन्दुस्तान में ,
दो कदम का ! ९ !

रख हौसला !
अपने जिगर में ,
आजमाने का ! १० !

-अनुज तिवारी
रचनाकार मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर निवासी हैं
नवोदित रचनाकार प्रचार-प्रसार के अभिलाषी नहीं है
वर्तमान में आप अपनी रचनाएँ 
हिन्दी काव्य संकलन में 
संग्रहित करते हैं
सम्पर्क सूत्रः +9158688418