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Saturday, October 6, 2018

आज के लिए मेरे शब्द !!............कविता गुप्ता

आज, फिर मन में आया, 
शब्दों की पिटारी खोल लूँ। 
विवेक का पल्लू पकड़ कर 
चुनिंदा, जादुई शब्द ढूँढ लूँ। 

जिनमें हो आकर्षण अनन्त 
हों मस्त पुरवाई से, स्वछंद। 
सुबह की ओस में नहाए हुए 
लिए भीनी २ फूलों की सुगंध। 

राही कुछ सीखें, ऐसा लुभाएँ,
वात्सल्य भरी ठंडक पहुँचाएँ। 
एक नन्हा जीव दे रहा दस्तक 
द्वार पर 'स्वागत है' लिख जाएँ।
-कविता गुप्ता

Thursday, May 3, 2018

सिलवटें !!......कविता गुप्ता

देखती हूँ सिलवटें ही सिलवटें,
बिछौने पर पड़ी, खुद निकालूँ, 
तन की निकालता 'सलाहकार' 
मन:स्थिति का, कोई चमत्कार। 

धरती पर सिलवट! हाहाकार,
व्योम टिका रहे, खुश बेशुमार। 
कैसी भी हों, कहलाए मुसीबत 
इन्हें निकालता,'एक मददगार' ।

हवा स्वतंत्र, सहती न सिलवट,
ज़िंदगी अधूरी है! बिना करवट। 
यदि जीतना, दुर्गम लक्ष्य चाहो,
साहस से लाँघ लो, हर रुकावट।
-कविता गुप्ता