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Sunday, January 3, 2016

सोचो ख़ुद को तराशा क्या....अनुराग सिंह


मानव की परिभाषा क्या
अन्तःमन की भाषा क्या
निराशा तो आनी ही है
नहीं तो जीवन की आशा क्या

कुछ भावों के संग्रह से
मानव मन के अनुग्रह से
स्वप्न विघटित होते ही हैं
नहीं तो फिर अभिलाषा क्या

गिरते नहीं तो सँभालते क्या
डरने वाले फिर चलते क्या
तुम ख़ुद ही ख़ुद के परखी हो
सोचो ख़ुद को तराशा क्या

मन में है ये नफ़रत क्यूँ
इंसान की ऐसी फ़ितरत क्यूँ
छोटा सी ही ये जीवन है
उसमें जीना ज़रा सा क्या
-अनुराग सिंह

नाम : अनुराग सिंह

शिक्षा : आईआईआईटी अलाहाबाद से एम.एस.
इस समय एम.ए. (हिन्दी) के विद्यार्थी
संप्रति : आरआरएसआईएमटी में असिटेंट प्रोफ़ेसर
सम्पर्क : anurag17889@gmail.com