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Saturday, December 2, 2017

फिर यादें मचली .....कुसुम कोठारी

सूनी मुंडेरें
ये शाम की तन्हाई
कहां हो गुम। 
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सूरज डूबा
क्षितिज है रंगीन 
घिरी उदासी। 
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परछाई से
निकली यादें पुरानी
बनी दास्तान । 
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निस्तब्ध मन
इंतजार करता
होले होले से।
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दूर आसमां 
एक सूरत दिखी
शायद तुम्ही। 
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फिजा श्यामल 
लहराया रात का
नीला आंचल। 
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शमाऐं जली
फिर यादें मचली 
कब आवोगे।
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चांद निकला
शमा हुआ रौशन
फिर भी कमी।
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रात खमोश
तारे हैं झिलमिल
फिजा उदास।
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ढली रजनी
धीरे धीरे मन की
आस भी टूटी।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, November 30, 2017

हर दीपक दम तोड़ रहा है...कुसुम कोठारी

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चारों तरफ कैसा तूफान है
हर दीपक दम तोड़ रहा है

इंसानों की भीड जितनी बढी है
आदमियत उतनी ही नदारद है

हाथों मे तीर लिये हर शख्स है
हर नजर नाखून लिये बैठी है

किनारों पे दम तोडती लहरें है
समंदर से लगती खफा खफा है

स्वार्थ का खेल हर कोई खेल रहा है
मासूमियत लाचार दम तोड रही है

शांति के दूत कहीं दिखते नही है
हर और शिकारी बाज उड रहे है

कितने हिस्सों मे बंट गया मानव है
अमन ओ चैन मुह छुपा के रो रहा है।
-कुसुम कोठारी