सूनी मुंडेरें
ये शाम की तन्हाई
कहां हो गुम।
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सूरज डूबा
क्षितिज है रंगीन
घिरी उदासी।
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परछाई से
निकली यादें पुरानी
बनी दास्तान ।
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निस्तब्ध मन
इंतजार करता
होले होले से।
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दूर आसमां
एक सूरत दिखी
शायद तुम्ही।
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फिजा श्यामल
लहराया रात का
नीला आंचल।
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शमाऐं जली
फिर यादें मचली
कब आवोगे।
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चांद निकला
शमा हुआ रौशन
फिर भी कमी।
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रात खमोश
तारे हैं झिलमिल
फिजा उदास।
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ढली रजनी
धीरे धीरे मन की
आस भी टूटी।
-कुसुम कोठारी

