Showing posts with label उर्मिला सिंह. Show all posts
Showing posts with label उर्मिला सिंह. Show all posts

Saturday, July 21, 2018

उत्तर प्रदेश की कजरी.....उर्मिला सिंह

image not displayed
हिंडोला झूल रही राधा प्यारी 
झुलावे कृष्ण मुरारी ना......
छाई काली घटा मतवारी
झुलावें कृष्ण मुरारी ना...

पी..पी..पपिहा सुर में गावे
कोयल प्यारी कुक सुनावे
मादक स्वर बंसी के बाजे
सुध बुध खोवें राधा रानी ना....
झुलावें कृष्ण मुरारी ना.....

ऊंची पेंग अम्बर को छुवे
प्रेम मगन राधे ..मोहन देखें
रुनझुन बाज रही पैजनिया
हँसि हँसी हरि झूला झुलावे ना...

झूला झूल रही राधे प्यारी
झुलावें कृष्ण मुरारी ना...

गोप गोपी हँसी हँसी नाचे
हर्षित मेघा जल बरसावे
देव मुनी बलि बलि जावें
देख के अनुपम जोड़ी ना....
झुला झूल रहीं राधा प्यारी
झुलावें कृष्ण मुरारी ना.....
-उर्मिला सिंह

Friday, July 20, 2018

हिंडोला....उर्मिला सिंह

मोह माया से सजा हिंडोला,
सांसों की लागी डोरी!
तृष्णा रह रह पटेंग मारती,
हिंडोला झूल रही है काया!!

तन की तृष्णा तनिक है!
मन की तृष्णा है अनन्त !!
धन दौलत धरी रह जाये,
बुलावा जब पी का आये!!

काम क्रोध का है मेला,
जिसमें बिचरत नश्वर काया!
टूटी जब साँसों की डोरी,
टूट गया सजा हिंडोला !
मिट्टी का तन रह गया अकेला!!
#उर्मिला सिंह

Thursday, July 5, 2018

मेघा.... आये....द्वार..............उर्मिला सिंह

सखी री .... मेघा आये द्वार...!
मदमाती गाती शीतल बहत बयार!!
सखी री....मेघा आये द्वार...!!

ढोल बजावत बदरा आये!
टिप..टिप बूँदन के सुर साजे!
तृषित धरा लेत अँगड़ाई!
श्रावण करत श्रृंगार.....!!
सखी री....मेघा आये द्वार...!!

रात अँधेरी दामिनी चमके!
दादुर मुखर भये चहुँ ओर!!
डार पात छुपि कोयल बोले!
ठमक ठमक नाचत बन मोर!!
सखी री ...मेघा आये द्वार....!!

हर्षित ताल तलैया....!
प्रकृति रही मुस्काय...!!
बाँकी चितवन नदिया झूमत!
नाविक छेड़े ...तान मल्हार....!!
सखी री....मेघा आये द्वार....!!
-उर्मिला सिंह

Sunday, April 22, 2018

जीवन के प्रति श्रद्धा...उर्मिला सिंह

दिल के  समन्दर  में भावों की  कश्ती  होती है!
उठती गिरती लहरें जीवन की कहानी कहती है!!
सुख दुख है जीवन माना ,पर पार उसे है करना,
सघर्षों से लड़ कर ही अपनी पहचान बनानी है!!

ज्ञान तुम्हें मिलता है किताबों से, सच है माना
अनुभव राह दिखाता है ,जब छाये घोर अँधेरा
जितने गहरे जाओगे मोती ढूंढ तभी पाओगे
जग में पदचिन्ह तभी तुम अपने दे जाओगे

जीवन के प्रति श्रद्धा ही ध्येय तुम्हें बनाना है
कर्म शक्ति सर्वदा तुम्हे, उसी से पाना है
यदि साध्य तुम्हारा उज्ज्वल होगा जीवन में
साधन अवश्य मिलेगा तुमको मन्जिल पाने में
-उर्मिला सिंह

Thursday, April 19, 2018

पाषाण यहाँ बसते.....उर्मिला सिंह

कैसे मन्जिल तक पहुँचे, छाया  घोर अँधेरा है!
कदम कदम यहाँ दरिंदो का लगा हुआ मेला है!

मन  कहता  सपनो  को  पूरा  कर लूँ,
डर कहता दरिंदो से अपने को बचालूँ,
      
कैसे अर्जुन बन लक्ष्य साधू हाँथों से तीर सरकता है!
कदम-कदम पर यहाँ  दरिंदो का लगा हुआ मेला है!  
  
मन कहता सघर्षों से डरो नही तुम,
तन कहता नर भक्षी से दूर रहों तुम,
        
 किस को मन की व्यथा सुनाऊँ पाषाण यहाँ बसते!
 काँटो से रुह जख्मी होती मानव पाषाण बने हँसते!   

नारी सदियों से अग्नि परीक्षा से है गुजरी , 
जीने का मोल चुकाया माँ बहन पत्नी बनी,
        
बाजी जब भी हारी रिश्तों के भाओं में बहते-बहते!   
कामी बहसियों की दरिंदगी कदम नारियों के रोकते!
    
 प्रदूषित हो  रहा शहर-शहर व्यभिचार से,
डरी है बच्चियाँ माँ बाप देश के माहौल से,
       
काँटों से रूह जख्मी होती मानव पाषाण बनेहंसते!
किसको मन की  व्यथा सुनाऊँ  पाषाण यहाँ बसते! 
-उर्मिला सिंह


Sunday, April 1, 2018

तड़पते दर्द का एहसास....उर्मिला सिंह

सरेआम  कैसे  ज़ख्मों  से पर्दा  हटा दूँ!
ज़िगर है घायल आहों को कैसे सुना दूँ!!

 बारीकियां होती हैं ज़ख्मों की ऐ जाने ज़िगर!
 ‎किस तरह लफ़्ज़ों की माला से ग़जल बना दूँ!!

एक हम ही नही है जख्मी बेमुरव्वत जहाँ में!
हर शख़्स लहूलुहान है कैसे उसे सुकुते दर्द दूँ!!

तपती दुपहरी दर्द की जब अंतड़िया सूखने लगती!
भूख से बिलबिलाते बचपन को कैसे बांहों में भर लूँ!

ईमान, उसूल,विचार,विश्वास घायल तड़प रहें हैं!
तड़पते दर्द का एहसास कैसे सियासत को करा दूँ!!
**
-उर्मिला सिंह