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Saturday, February 24, 2018

प्यास......पारुल "पंखुरी"

प्यासी हूँ 
मन के सहरा में
भटकते भटकते
मरूद्यान तक पहुँची
मगर नीर नमकीन हो गया
मेरे आँसुओं ने साझेदारी
कर ली 
उस उदास झील से,
और भटकूँगी
भटकना चाहती हूँ 
तब तक 
जब तक 
तेरे हाथों से वो पानी
झरना बन के 
मुझे भिगो न दे
तभी तृप्त होगी 
तन, मन और आत्मा।
-पारुल "पंखुरी"