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Wednesday, July 10, 2019

एक चिड़िया मरी पड़ी थी.....एम.वर्मा

बलखाती थी
वह हर सुबह 
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी 
खिल जाती थी
गुनगुनाती थी 
वह षोडसी
अपनी उम्र से बेखबर थी
वह तो अनुनादित स्वर थी 
सहेलियों संग प्रगाढ़ मेल था 
लुका-छिपी उसका प्रिय खेल था
खेल-खेल में एक दिन
छुपी थी इसी खंडहर में
वह घंटों तक 
वापस नहीं आई थी
हर ओर उदासी छाई थी
मसली हुई 
अधखिली वह कली
घंटों बाद 
शान से खड़े 
एक बुर्ज के पास मिली
अपनी उघड़ी हुई देह से भी
वह तो बेखबर थी
अब कहाँ वह भला
अनुनादित स्वर थी 
रंग बिखेरने को आतुर
अब वह मेहन्दी नहीं थी 
अब वह कल-कल करती
पहाड़ी नदी नहीं थी
टूटी हुई चूड़ियाँ 
सारी दास्तान कह रही थीं
ढहते हुए उस खंडहर-सा 
वह खुद ढह रही थी
चश्मदीदों ने बताया
जहाँ वह खड़ी थी 
कुछ ही दूरी पर 
एक चिड़िया मरी पड़ी थी !!

लेखक परिचय - ऍम वर्मा 

Saturday, June 1, 2019

साजिशों से बनी दीवारें.....एम. वर्मा

कभी सर्द हवाओं; 
तो कभी 
गर्म थपेड़ों के बहाने 
उसके इर्द-गिर्द 
खड़ी कर दी गई 
बिना छत की दीवारें । 
वह विभेद करता रहा, 
उन दीवारों से कान सटाकर 
अट्टहास और चीत्कार में । 
अक्सर रात में 
उसे दिखाये गये 
चमकदार तारें; 
आक्सीजन के नाम पर 
उसे दिया गया निरंतर 
आश्वासनों का अफीम । 
वह खुद ही में खोया, 
कभी खुद ही को ढोया 
और फिर 
फूट-फूट कर रोया । 
मुझे पता है अब वह 
खुद को भरमायेगा; 
दीवारों से सर टकरायेगा 
और फिर अंततोगत्वा 
वहीं मर जायेगा । 
शायद वह जानता ही नहीं 
साजिशों से बनी दीवारें 
टूटा नहीं करती हैं !!